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05.03.2012
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कपटी
डॉ. दीप्ति गुप्ता


मकरन्द जोशी - शोध छात्र ने पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त करने के उपलक्ष्य में, विभाग में मौखिक परीक्षा के उपरान्त दिए जाने वाले जलपान के दिन आचार्य जी सहित सभी व्याख्याताओं के हाथ में खूबसूरत सी निमन्त्रण पत्रिका थमा दी। दरअसल मकरन्द जोशी स्थानीय महाविद्यालय में एक वर्ष पूर्व ही प्रवक्ता पद पर नियुक्त हुआ था। अतएव वह एक वर्ष पूर्व की उस खुशी को पी.एच.डी. की उपाधि के साथ, रविवार के दिन अपने सभी गुरुजनों व साथियों को होटल सागर में रात्रिभोज पर बुलाकर बाँटना चाहता था। निमंत्रण-पत्रिका देने के साथ-साथ, उसने सभी से रात्रिभोज पर आने का विशेष आग्रह बार-बार किया तो सभी को उसका प्रेम निमन्त्रण स्वीकार करना पड़ा।

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रविवार को सभी 8.00 बजे तक होटल सागर में पहुँच गए। लेकिन उपस्थित नहीं थे तो सिर्फ आचार्य जी। सभी ने कहा कि थोड़ी देर प्रतीक्षा कर लेनी चाहिए - क्योंकि रात्रि की भीड़ में आने में देर सवेर हो ही जाती है। मि. चैटर्जी चिड़चिड़ा सा मुँह बनाते बोले शहर की भीड़ उन्हीं के लिए है, हम सब कैसे समय पर आ गए? उनके इस तर्क पर अन्य साथी मुस्करा पड़े। क्योंकि सब जानते थे कि आचार्य जी स्वयं पर वी.आई.पी. मुलम्मा चढ़ाने के लिए, जानबूझकर देर से पहुँचते है - ऐसे अवसरों पर। अन्यथा, किसी भी तरह के मानवीय गुण या अन्य किसी तरह की भी प्रतिभा से वे इतने खाली है कि अपने विभागाध्यक्ष के खोखले बोझ को वह विभाग के बाहर भी, सिर पर लेकर फिरते है और ऐसे मौंकों पर सबकों अनावश्यक रूप से प्रतीक्षारत रखकर, अपनी झूठी प्रतिष्ठा का एहसास कराने की ओछी कोशिश करते है। ठीक 8.30 पर आचार्य जी न सिर्फ अपनी पत्नी, बल्कि अपने बहू बेटे, छोटे बेटे व बेटी सहित सपरिवार भोज की गरिमा  बढ़ाने हेतु हाज़िर हो गए। मकरन्द एक बारगी तो भौंचक सा रह गया उस फौज को देखकर, लेकिन अगले ही पल, सहज होता उनकी आवभगत में लग गया। अन्य सभी लोग भोज पर अनिमन्त्रित - उस अतिथि सेना को देखकर, लज्जित से, मुँह और आँखें झुकाए बैठे रहे। किन्तु आचार्य जी को अपनी इस हरकत पर जरा सी भी लज्जा नहीं थी। वे पूरी तत्परता से अपने परिवार के साथ, एक सम्पूर्ण मेज घेर कर बैठ गए थे तथा भोजन में देर कैसी यह भाव उनके चेहरे से टपक रहा था।

अगले दिन चाय की बैठक में सभी साथियों ने आचार्य महाशय की पिछली रात की गरिमाहीन हरकत पर शर्मिन्दगी जाहिर करते हुए - उनके बारे में मशहूर किस्से छेड़ दिए। शान्ति जोशी’ - जो उनके किस्सों से विभाग में, नई होने के कारण  अनभिज्ञ थी, बोली – “जरा हमें भी तो पता चले उनका असली रूप! क्या विस्तार से नहीं बताएँगे? अब मैं स्थायी हो गई हूँ, प्रोबेशन पीरियड समाप्त हो गया है। मैं भी अपने विभागाध्यक्ष के महान करतब जानने का अधिकार रखती हूँ।

उसके इस तरह बोलने के ढंग पर सब खिलखिला पड़े और जोश में भर कर प्रो. खासनवीस ने बताना शुरू किया कि किस पकार आचार्य जी अपने शोध छात्र से झोले भर-भर कर सब्जी मँगवाते थे, रेलवे रिजर्वेशन करवाते थे और रुपये भी बेचारे छात्र की जेब से ही खर्च करवाते थे, पूरे चार साल तक, वह छात्र इनके घरेलू काम रो-रोकर करता रहा। इस तरह जैसे-तैसे उसका शोध कार्य उसका पूरा हुआ। मृणाल ने याद दिलाते हुए कहा कि  - क्या आप लोग भूल गए, उस कमलिनी की क्या हालत की थी - आचार्य जी ने और उनसे अधिक, उनकी पत्नी ने? यह पता चल गया श्रीमती आचार्य को कि उसे कढ़ाई-सिलाई बहुत अच्छी आती है। बस फिर क्या था, बेचारी कमलिनी का शोध कार्य दूसरे अध्याय से तब तक आगे नहीं बढ़ा, जब तक उसने बेडकवर, मेजपोश काढ़-काढ़कर, मैडम के ब्लाउज, बेटी के सलवार सूट सिल-सिलकर उनका पेट नहीं भर दिया। कमलिनी के माँ-बाप तो मुँह भर-भर कर आचार्य जी और उनकी पत्नी को कोसते थे। उसका भाई तो एक दिन तैश में आकर आचार्य जी का दिमाग ठिकाने लगाने, उनके घर जाने वाला था कि कमलिनी ने ही उसका हाथ पकड़ लिया और विनती की, कि उसका शोध बीच में ही रह जायेगा - अब तक की सारी मेहनत पानी पर फिर जायेगा। इस बात को सुनकर वह रुक गया। नई प्रवक्ता शान्ति जोशी  तो यह सब सुनकर सकते में आ गई। क्या उच्च शिक्षा प्राप्त, उच्च पद पर आसीन, वह भी आदर्श माने जाने वाले, शिक्षण व्यवसाय में रत होकर, कोई इंसान, इस तरह की हल्की और घटिया हरकतों से अपने व्यवसाय, पद और स्वयं को इतना गरिमाहीन बना सकता है? क्या उसे ये सब बातें अपने व्यवसाय और स्वयं के सम्मान से अधिक महत्वपूर्ण लगती है? शान्ति के अचरज का ठिकाना न था। शिक्षक का कार्य तो अपने छात्रों को उदात्त मूल्यों और संस्कारों की सीख देना, उनमें मूल्यों की नींव डालना होता है। तभी तो कबीर ने गुरु को गोविन्द से बढ़कर माना है। पर यहाँ तो आचार्य जी गुरु की गरिमा को ठेस लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। शान्ति को सोच में डूबा देख मृणाल ने टोका

 अरे मैडम जोशी, कहाँ है आप? किस दुनियाँ में खो गई? अभी नई है आप और आदर्शों से सम्पन्न भी है, तभी इतनी तनावग्रस्त सी दिख रही है - ये सब महान किस्से सुन-सुन कर। हम भी जब नए-नए आए थे, तो विभागीय राजनीति के शिकार होकर, बड़े तमतमाए और छटपटाए थे। लेकिन धीरे-धीरे हमने, सही रास्ते पर चलते हुए, आचार्य जी की चालबाज़ियों और चंगुल से अपने को बचाने के गुर सीख लिए।

शान्ति को मृणाल की सारी बातें सुनाई भी दे रही थी और समझ भी आ रही थीं, फिर भी वह अन्तरतम में कहीं खोई हुई थी। जैसे वह अपने मूल्यों और उन पर टिकी अपनी आस्था को अन्दर कहीं सहेज कर रख लेने को व्याकुल थी कि कहीं उस पर बाहरी धूल, कूड़ा कचरा न बैठ जाए शान्ति अपने कमरे में अलमारी खोलकर रजिस्टर व किताबें निकल रही थी, तभी लक्ष्मण ने आकर कहा - मैडम, आचार्य जी ने आपको बुलाया है।

शान्ति का दिल एक अंजानी आशंका से जोर-जोर से धड़कने लगा। अगले ही क्षण स्वयं को व्यवस्थित करना चाहा भी तो उसे लगा कि दिल गले में आकर अटक गया है। ऐसी घबराहट क्यों?

 उसे हिम्मत जुटानी पड़ेगी। बुलाया ही तो है! यह सब सोचती-सोचती वह अध्यक्ष के कक्ष में पहुँच तो गई - पर दिल की ब्ढ़ती धडकनों ने उसे परेशान कर डाला। अचकचाती सी  वह बोली -   जी सर” ,  उसके  मुँह  से निकला ही था कि  आचार्य जी  बोले -  बैठिए

फिर अपनी आँखें कुछ कागजों में गड़ाए हुए बोले – “ कैसा लग रहा है यहाँ। विभाग के साथी, छात्रगण, प्रवक्तागण, पाठ्यक्रम, अब तो सभी से अच्छी तरह परच गई होंगी आप?”

जी हाँ” - शान्ति हौले से बोली। आचार्य जी ने उसकी घबराहट और उतरे-उतरे चेहरे को देखकर आगे कुछ कहना ठीक न समझा। कुछ देर बाद बोले - कल छुट्टी है। हो सके तो किसी समय घर आइए। थोड़ा सा आपका मार्गदर्शन कर देंगे तो अच्छा रहेगा।

 जी” - शान्ति के मुँह से सहसा ही नहीं के बदले निकल गया। घर बुलाकर कैसा मार्गदर्शन करेंगे आचार्य जी - वह तो गहरे सोच में पड़ गई। जाए या न जाए? या मृणाल की तरह बचाव के उपाय खोजे? नहीं जायेगी वह। कह देगी - तबियत खराब हो गई अचानक! किन्तु वह बिना बात झूठ क्यों बोले? डरने की क्या बात है! वह अनुभवहीन है और आचार्य जी अध्यक्ष ही नहीं अपितु बुजुर्ग भी हैं, अनुभवी हैं। उनके बारे में जितनी बाते सुनी है, वे सच ही हों - यह भी तो नहीं कहा जा सकता। इस तर्क -वितर्क  में उलझी शान्ति ने, शाम तक क्लासेस वगैरा लेकर, खाली पीरियड में बैठै-बैठे शान्ति ने अगले दिन अध्यक्ष के घर जाने का मन बना ही लिया। वैसे भी छोटी होकर सम्माननीय अध्यक्ष का कहना न मानना उसकी सभ्यता के खिलाफ था। सो सभ्यता के विपरीत आचरण करके वह और भी मन ही मन परेशान व असहज रहेगी - इससे तो जाना ही ठीक रहेगा। यह सब सोचकर शान्ति रविवार को दोपहर में, खाने के बाद सब कामों से फारिग होकर 2.00 बजे के लगभग आचार्य जी के घर पहुँची। कॉल बैल का बटन दबाया तो अच्छा खासा समय लगाकर बड़े इत्मीनान से किसी ने दरवाजा खोला। शान्ति उसे जानती तो नहीं थी किन्तु पहनावे व हाव-भाव से वह महिला सुशिक्षित और काफी व्यवहार कुशल लग रही थी। उसने एक मुस्कान के साथ शान्ति का स्वागत किया। उसे ड्राइंगरूम में बैठाया, फिर रसोईघर से एक गिलास पानी ले आई और विनम्रता से शान्ति का नाम पूछकर - शायद अन्दर आचार्य जी को बताने चली गई। शान्ति इस बीच, कमरे की सजावट, कोने में सजे आर्टीफैक्ट्स, दीवार पर लगी पेन्टिग्स आदि देखती रही। प्यास न होने पर भी, वह पानी के एक दो घूँट बीच-बीच में पी लेती थी। एक मिनट, दो मिनट, तीन मिनट। अन्दर से कोई नहीं आया तो उसे बुरा सा महसूस होने लगा। चौथा मिनट भी बीत गया। थोड़ी देर में 5 मिनट पूरे हो गए। धीरे-धीरे उसके अन्दर खीझ उभरने लगी। उसे  लगने लगा कि वह व्यर्थ ही आज्ञाकारी की तरह, आचार्य जी के कहने पर यहाँ चली आई। यहाँ किसी को उसके आने की परवाह ही नहीं है। या यह  इस घर की रीति है कि  कोई आए तो उसे उपेक्षित सा महसूस कराया जाए। खासतौर से जब वह विभागीय व्यक्ति हो तो - यह बात याद रहे कि वह अतिथि देव नहीं बल्कि, अध्यक्ष आचार्य जी का मातहत है और उनकी बाट जोहना उसका फर्ज है। नियति है! ईश्वर की कृपा से तभी छठा मिनट पूरा होने से पूर्व ही श्रीमती आचार्य अपनी साड़ी कंधो पर लपेटती आई। शन्ति ने खड़े होकर पूरे आदर के साथ उनका अभिवादन किया। दोनों बैठकर बाते करने लगीं।  इतने में आचार्य जी भी बासी चेहरे के साथ आ खड़े हुए। शान्ति पुनः उनके अभिवादन में खड़ी हो गई। अपने बासी मुँह से उबासी लेते हुए आचार्य जी बोले - बैठिए, बैठिए, घर खोजने में परेशानी तो नहीं हुई?”

 जी नहीं” - शान्ति संक्षिप्त सा उत्तर देकर 5 मि. पूर्व की प्रतीक्षा के कारण मन में भरी खीज से जूझती बैठी रही। कुछ सैकेन्ड इधर-उधर की फालतू बातों के उपरान्त आचार्य जी  पुनः  बोले

एक-एक कप मसाले वाली चाय पिलायेंगी क्या श्रीमती जी! यह सुनकर मैडम मुस्कुराती ऐसे उठीं जैसे आचार्य जी और उनके साथ-साथ शान्ति पर एहसान कर रही हो। आचार्य जी धीरे -धीरे शन्ति को विभाग की बातों पर ले आए। पैनेपन से घुमा फिरा कर, अन्य प्रवक्ताओं के बारे में, शान्ति की राय, उसके विचार मापने की नाकामयाब कोशिश में लग गए। श्रीमती आचार्य छोटी से ट्रे में चार अंगुल के तीन मगों में बेरौनक सी चाय लेकर हाज़िर हो गई। साथ में एक छोटी प्लेट में चार-पाँच मोनाको बिस्किट भी थे। शान्ति ने जैसे ही चाय का पहला घूँट भरा, उसके मुँह से चाय बाहर निकलते-निकलते रह गई। क्योंकि चाय का स्वाद उसकी शक्ल से भी अधिक गया गुजरा था। चीनी या तो वे डालना भूल गई थीं या उन्होंने चाय में चीनी की चुटकी ही डाली थी। शान्ति ने किसी तरह उस बेस्वाद चाय को अन्दर धकेलने की इच्छा से, आचार्य जी के आग्रह करने पर, जब एक बिस्किट लिया तो, उसे मुँह में डालने पर पता चला कि सीलन उसके कुरकुरेपन को सोख चुकी थी, इसलिए वह मुँह में रखते ही लुग्दी सा हो गया। उसे किसी तरह उस विशिष्ट चाय से गले के नीचे उतार कर - शान्ति ने उस छँटाक भर चाय को किस तरह झेला - बस वहीं जानती थी। श्रीमती आचारय तभी नाक भौं सिकोड़ती बोली -

 शान्ति जी, अभी आपको कुछ नहीं पता। विभाग में एक से एक छँटे हुए लोग भरे पड़े हैं।

और उन्होंने जो सबका गुणगान करना शुरू किया तो मि. चैटर्जी पर ही आकर साँस ली। तदनन्तर खुसपुसाती सी बोली - पता है शान्ति जी, चैटर्जी अपनी शोध छात्रा का कैसा दीवाना हो गया था! बड़े-बड़े बच्चों का बाप, इस अधेड उम्र में इश्क के फेर में पड़ गया। 

चैटर्जी पर यह आरोप, शान्ति को बहुत बुरा लगा। क्योंकि एक वर्ष से वह भी उन्हें देख रही है। उस शोध छात्रा को भी एक दो बार लाइब्रेरी में कभी-कभी देखा है - जो अब किसी स्थानीय कॉलिज मे कार्यरत भी है। उसे दोनों ही बड़े सीधे व सरल लगे। उसने तो दोनों का कभी भी एक दूसरे के प्रति कोई गलत लगाव या आपत्तिजनक व्यवहार नहीं देखा। तभी श्रीमती आचार्य की आवाज फिर उभरी - देखिए शान्ति जी आप अभी भोली है, विभागीय राजनीति क्या होती है - ये आपको नहीं पता। मृणाल और बेला से भी जरा दूर ही रहना। वरना ये दोनों तो आपको कच्चा निगल जायेंगी। 

शान्ति को लगा कि वह कालापानी की सजा पर इस शहर में आई है। किसी से बातें मत करना, निकट मत होना, यहाँ आना, वहाँ मत जाना - ये कैसे अध्यक्ष है और कितनी कपटता से भरा इनका मार्गदर्शन है? वह सोच मे पड़ गई। शान्ति तमाम उलझनों से भरे दिमाग और दिल में एक कसमसाहट के साथ आचार्य जी व उनकी पत्नी से विदा लेकर घर पहुँची। रात तक उसकी बेचैनी, सोच-सोच कर इतनी बढ़ गई कि उसने मन ही मन निर्णय लिया कि अगर आचार्य जी ने अपनी पत्नी सहित उस पर परोक्ष रूप से इतनी तानाशाही चलाई तो, या तो वह नौकरी छोड़ देगी या फिर मामला डीन और कुलपति तक ले जायेगी। ऐसे घुट-घुट कर नौकरी नहीं होगी उससे। विश्वविद्यालय में प्रवक्ता पद पर नियुक्त व्यक्ति को यदि उसका अध्यक्ष इस तरह की चेतावनियाँ दे - मार्गदर्शन के नाम पर, तो इसका मतलब यह हुआ कि उसकी तो अपनी कोई बुद्धि नहीं है; उसे किसी तरह की समझ ही नहीं है। बचपन से लेकर इस स्तर तक पहुँचने वाले इंसान के कुछ अपने भी अनुभव, घरवालों द्वारा दी गई शिक्षा, मूल्य एवं संस्कार, मित्रों व अन्य मिलने वालों के सम्पर्क से अर्जित व्यावहारिक ज्ञान, कुछ दूसरों के अनुभवों से सीखा-गुना पाठ; कुछ तो आखिर उसे भी अक्ल और समझ होगी! अगर वह एक-एक कदम, एक-एक साँस, आचार्य जी और उनकी पत्नी के संकेतानुसार लेगी, तो वह प्रवक्ता थोड़े ही रहेगी - एक बन्धक, एक कठपुतली बन कर रह जायेगी। रात भर सोच-सोच कर उसका दिमाग भन्ना गया। स्थायी होने की उसकी सारी खुशी, उसे कड़वी लगने लगी। आचार्य जी और उनसे अधिक उनकी पत्नी के प्रति वह वितृष्णा से भर उठी।

सवेरा होने पर, उत्साहविहीन सी वह उठी और 11.00 बजते-बजते विभाग में पहुँच गई। उसके उखड़े-उखड़े और तनावग्रस्त चेहरे ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। सबके द्वारा उसकी खैरियत पूछे जाने पर - वह सिर भारी होने का मामूली सा कारण बता कर सबको टालती रही। दो दिन बाद आचार्य जी के कक्ष में पाठ्यक्रम से संबंधित बैठक होनी थी। बैठक शुरू होने से पहले उन्होंने सबसे पूछा कि पाठ्यक्रम कितना हो गया है और कितना शेष है। सभी का कार्य  ठीक था, यदि पाठ्यक्रम पिछड़ा हुआ था, तो सिर्फ स्वयं अध्यक्ष महोदय का। फिर न जाने एकाएक आचार्य जी को क्या सूझा, बोले -

शान्ति जी, कुछ छात्र हमसे कह रहे थे कि आप ठीक से नहीं पढ़ाती, उन्हें आपका पढ़ाया समझ नहीं आता।

यह सुनते ही शान्ति बौखला सी गई। उसका चेहरा तमतमा गया। तुनक कर वह बोली - सर, जिसने यह आक्षेप लगाया है, आप उन छात्रों को हम सबके सामने बुलाइए और मं- उनसे पूछूँगी कि कब, क्या उन्हें समझ में नहीं आया? एक वर्ष से आज तक तो किसी ने शिकायत नहीं की - आज यह शिकायत किन छात्रों ने मेरे खिलाफ की है? ठीक है मेरे पढ़ाने के ढंग में कहीं कोई कमी हो सकती है - पर उन्हीं से जानन चाहूँगी। मुझसे अपनी समस्या न कह कर, आपसे कहने क्यों आए? पहले तो यही पूछूँगी। मैं उनके कहने पर मना कर देती यदि, उन्हें न समझाती, उनकी समस्याओं का समाधान न करती - तब आपसे शिकायत करते, तो बात कुछ समझ में आती है। पर सीधे आपके पास चले आए - ऐसे कौन से विद्यार्थी हैं?”

शान्ति की ऐसी हिम्मत भरी, खरी प्रतिक्रिया और चेहरे पर झलकते सच्चाई के तेज को देखकर आचार्य जी ऐसे निष्प्रभ हो गए कि उनसे कुछ प्रत्युत्तर देते न बन पड़ा। हकलाते हुए बले - अरे छोड़िए, मैंने उनकी शिकायत थोड़े ही स्वीकार की। वो तो उन लोगों ने कहा तो - मैंने सोचा आप तक यह बात पहुँचा दूँ।

शान्ति फिर भी अपनी बात पर अड़ी हुई बोली - नहीं आप अभी बुलवा लीजिए उन छात्रों को - दूध का दूध और पानी का पानी हो जाना चाहिए।

साथ बैठे सभी प्रवक्ता साथी समझ रहे थे कि यह कुछ और नहीं, शान्ति को रौब में लेने की, आचार्य जी की एक घटिया नाकामयाब कोशिश है। बहरहाल सभी को शान्ति का बिना घबराए हुए, सटीक व सधा हुआ जवाब देना बेहद अच्छा लगा, जिसने आचार्य जी की सिट्टी पिट्टी गुम कर दी थी। बैठक के उपरान्त, उस हरकत से आचार्य जी ने अपने खिलाफ खेमे में शान्ति के रूप में एक और सदस्य भर्ती कर लिया। उस दिन शान्ति को अच्छी तरह समझ आ गया था कि विभागीय  साथियों  ने जो आचार्य जी के किस्से उसे सुनाए थे - वे सच थे। ऐसा कपटी घाघ उसने जीवन में पहले  कभी  नहीं  देखा था। आज  उसमें  जीवन की  आपदाओं से संघर्ष करने की एक नई शक्ति क्रान्तिकारी रूप से जाग उठी थी। विभाग के अपने कक्ष में, कुर्सी पर बैठे-बैठे, बड़े ही आत्मविश्वास के साथ उसने जंग से भागने का नहीं, पलायन करने का नहीं, वरन् डट कर उसका सामना करने का सकारात्मक निर्णय ले लिया था। वह आचार्य जी जैसे नकारात्मक व्यक्ति के कारण अपनी इतनी अच्छी नौकरी  क्यों छोड़े! बल्कि अपने मूल्यों, संस्कारों व आत्मसम्मान की रक्षा, हर छोटे से छोटे और बड़े से बड़े संकट का सामना, वह डट कर करेगी! अपने कार्य को परिश्रम, लगन व निष्ठा से करती रहेगी।

प्रवक्ता जीवन के इस छोटे से प्रसंग से शान्ति में जो आत्मबल जागा था तथा उससे उसके अन्तर्मन में जिस तेजस्विता और जीवट ने करवट ली थी, उससे वह एक नवस्फूर्ति से भर उठी।

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