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ISSN 2292-9754

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09.06.2014


साँस जाने बोझ कैसे...

साँस जाने बोझ कैसे जीवन का ढोती रही
नयन बिन अश्रु रहे पर ज़िन्दगी रोती रही

एक नाज़ुक ख़्वाब का अंजाम कुछ ऐसा हुआ
मैं तड़पता रहा इधर वो उस तरफ़ रोती रही

भूख, ग़रीबी लाचारी ने उम्र तक पीछा किया
मेहनत के रुख पे ज़र्दियाँ, तन पे फटी धोती रही

उस महल के बिस्तरे पे सोते रहे कुत्ते, बिल्लियाँ
धूप में पिछवाडे एक बच्ची छोटी सोती रही

तंग आकर मुफ़लिसी से ख़ुदक़शी कर ली मगर
दो गज कफ़न को लाश उसकी बाट जोती रही

”दीपक’ बशर की ख़्वाहिशों का कद इतना बढ़ गया
ख्वाहिशों की भीड़ में कहीं ज़िन्दगी खोती रही


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