दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'


कविता

शराब चीज ऐसी है
असंतोष के सिंह तुम ...
समाज को काटकर ...
जिन के सिर पर होता कोहिनूर
कभी चले थे साथ-साथ

आलेख

असहजता से मिलती है असफलता
विश्वास के साथ ही जीना