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| 03.13.2009 |
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मौसम बदला सा |
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बदला बदला से ये मौसम क्यूँ है शाख पर सोए परिंदों ने फिर आँखें खोलीं काश होता कभी ऐसा जो दिल ने चाहा है लाख बनाई मगर फिर भी ना बन पाई जो कितना चाहा था कि ख़ुद से भी कभी पूछेंगे यादों की रहगुज़र भी अब मुश्क़िल सी लगे है तकदीर ने ना छाँव दी औऱ सफ़र ही अब कारवां |
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