सूना जीवन दीपा जोशी
खो गए ओ घन कहाँ तुम हो कहाँ, किस देश में पथरा गई कोमल धरा चिर-विरह की सेज में।
थी महक जिसमें समाई तुम्हारे अचल प्रेम की हुई तृषित वही वसुधा विरहिणी के भेस में।
हो गए जो विरल घन तुम सुधा निस्पंद हो गई बसा पुलक-धन उर में चिर-नींद में है सो गई।
लौट आओ तुम नीरधर बन लघु-प्राण विशेष कह रहीं सूनी आँखें बेसुध सुधा का संदेश।