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ISSN 2292-9754

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02.19.2016


ढाई आखर प्रेम का

एक प्रेमी
प्रेमिका से
करने आया था मुलाक़ात
“वेलेन्टाइन डे” की थी वो रात
प्रेमी ने प्रेमिका को था
कुछ ऐसे पकड़ा
मानो नन्हे शिशु को
माँ ने हो बांहों में जकड़ा

बिन बोले
आँखोँ में आँखें डाल
वो कर रहे थे
सार्थक मुलाक़ात
प्रेमिका बीच बीच में
अपने प्रेमी के
हाव भावों को थी तोलती
अँधेरे में जैसे
किसी वस्तु को टटोलती

तभी प्रेमी ने निकाल
एक काग़ज़ का पुर्जा
हौले से
प्रेमिका की ओर बढ़ाया
अपने मनोभावों को था
वह उसमें उतार लाया
थी चमक
आँखों में ऐसी
जैसे कुछ अनकहा
हो आज कहने आया


प्रेमिका ने
बड़ी ऩज़ाकत से
उस पु्र्जे को
उलट पुलट घुमाया
तेज़ निगाहों को
विषयवस्तु पर दौड़ाया
"दिल" "चाहत" प्यार" का
बस ज़िक्र उसमें पाया
था अफ़सोस
"आज के दिन" भी
वह खाली हाथ ही था आया

निराशा ने
कोमल मन को दुखाया
चंचल नयनों में
स्वतः जल भर आया
अपनी चिर परिचित अदा से
बंद होँठों को
पहली बार उसने हिलाया
और धीरे से
कुछ यूँ बुदबुदाया
"कहती है दुनिया जिसे प्यार
बस एक हवा का
झोंका है
महसूस तो होता है
छूना चाहो तो धोखा है
कहने वाले ने
सच ही कहा है शायद
प्यार वो फूल है
जो हर दिल के
चमन में है खिलता
हैं वो ख़ुशनसीब
जिनके प्यार को प्यार है मिलता

ना जाने कैसे
प्रेमी को
अचानक कुछ याद आया
छुपा कर रखा था
जो रहस्य अब तक
बंद हथेली में
प्रेमिका के पास लाया

खोली हथेली तो
हीरे की चमक से
चमकी प्रेमिका की आँखें
बोली वह कुछ शरमाकर
कितने बुद्धु हो
छुपा कर रखा था
जो यूँ अपना प्यार
अब तक
खाओ कसम कि
फिर ना यूँ
आँख मिचौली खेलोगे
जब भी आएगा
यह मुबारक दिन अबसे
यूँ ही
मनमोहक अदा से
"ढाई आखर प्रेम का" बोलोगे


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