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03.31.2014


देखो जादू हाँड़े का

एक गाँव में राघव नाम का एक मज़दूर रहता था। वह बहुत गरीब था। उसकी एक सुंदर और सुशील पत्नी और एक प्यारा-सा बेटा था। वह अपने परिवार के निर्वाह के लिए इधर-से-उधर काम की तलाश में घूमता रहता। उसे जो भी काम मिलता वह उसे पूरी ईमानदारी से करता। किंतु कभी उसे काम मिलता तो कभी नहीं। वह जो भी काम करता उसके बदले में भी उसे इतना नहीं मिलता था कि वह और उसका परिवार दो वक्त का भरपेट भोजन कर सके।

वह रोज़ सुबह बड़ी उम्मीद से काम की तलाश में निकलता। जिस दिन उसे काम मिल जाता तो बेचारे की ख़ुशी का ठिकाना न रहता। किसी तरह बेचारा अपने दिन काट रहा था। वह अपने परिवार की ओर देखता, तो उसे बहुत दुःख होता कि वह उन्हें कोई सुख-सुविधा तो क्या, उन्हें दो वक़्त का भोजन भी नहीं दे पा रहा था। वह जब किसी परिवार को हँसते-खेलते देखता, तब वह यह देखकर एक गहरी सोच में डूब जाता कि काश! मैं भी अपने परिवार को ख़ूब ख़ुशियाँ दे पाता।

एक सुबह वह फिर बड़ी उम्मीद से काम की तलाश में निकला। तभी उसे एक साहूकार मिला, जिसे अपने खेत में खुदाई का काम कराना था। राघव बहुत ख़ुश हुआ कि कम-से-कम पंद्रह या बीस दिन का काम तो मिल ही गया। अब कम-से-कम कुछ दिन तो मेरा परिवार भूखा नहीं सोएगा। वह जी तोड़कर अपने काम में लग गया। वह रोज़ अपना काम पूरी मेहनत से करता और शाम को उसके बदले में जो कुछ मिलता, बड़ी तेज़ी से दौडता हुआ अपने घर की बढ़ जाता।

देखते ही देखते काम का आखिरी दिन भी आ पहुँचा। जैसे-जैसे दिन ढल रहा था, राघव को कल की चिंता खाए जा रही थी कि कल क्या करेगा और क्या खाएगा? जैसे ही काम ख़त्म होने को जा रहा था राघव ने खेत के अंतिम कोने को बड़ी ही निराशा के साथ खोदना शुरू कर दिया। तभी खुदाई करते समय वहाँ से एक हाँडा निकला। राघव ने उसे संभालते हुए बाहर की ओर निकाला और उसके अंदर झाँकने लगा, पर उसे उसमें कुछ दिखाई नहीं दिया। फिर उसने सोचा क्यों न इसे घर ले जाऊँ कम-से-कम पानी भरने, कपड़े धोने के काम तो आ ही जाएगी।

राघव के हाथ में हाँडा देखकर उसकी पत्नी ने उससे पूछा कि ये तुम क्या लेकर आए हो?
राघव ने कहा, "ये मुझे खुदाई करते हुए मिला, मैंने सोचा ज़्यादा नहीं तो कम-से-कम पानी भरने या किसी काम तो आएगा।"

"चलो ठीक है अब ले ही आए हो तो। हमारे बेटे के कपड़े रखने के काम आ जाएगा।"

अगले दिन सुबह सुनेना ने अपने बेटे प्रकाश के कुछ कपड़े उस हाँड़े में भरकर रख दिए। कुछ देर बाद उसने अपने बेटे को नहलाया और उसके लिए हाँड़े में से कपड़े निकालने लगी। तभी वह क्या देखती है! उसमें से हर रंग के दो जोड़ी कपड़े दिखाई देते हैं। वह कपड़े निकालती रही और हैरानी से उनकी ओर देखती रही।

शाम को जैसे ही राघव आया तो उसने ये बात उसे बताई। राघव ने सुनेना की ये बात सुनकर उससे कहा कि "तुम तो बिल्कुल बावरी हो गयी हो, ऐसा भी कभी होता है क्या?"

सुनेना ने कहा, "नहीं जी, मैं बिल्कुल सच कह रही हूँ। आप देखिए न प्रकाश के ये कपड़े।"

कपड़े देखते ही राघव की आँख भी खुली की खुली रह गयी। राघव कपड़ों को बहुत देर तक देखता रहा, फिर उसे एकदम से कुछ सूझा, उसने अपनी पत्नी से कहा घर में जितना भी राशन है उसे यहाँ लेकर आओ। सुनेना कहने लगी, "जी घर में तो दो मुट्ठी चावल, एक कटोरा आटा और एक मुट्ठी दाल ही है।"

"कोई बात नहीं जितना भी है, ले आओ।"

सुनेना ने पूछा, "पर आप उसका करेंगे क्या?"

राघव ने फिर कहा, "अरे तुम लेकर तो आओ! फिर देखते हैं।"

राघव ने सबसे पहले चावल उठाए और हाँडे में डाल दिए और फिर सुनेना से एक बड़ा-सा बरतन लाने के लिए कहा। और जैसे ही उस हाँड़े को उस बरतन पर उल्टाया तो क्या देखता है दो मुट्ठी चावल अब चार मुट्ठी हो गए हैं। दोनों पति-पत्नी यह देख बहुत खुश हुए, जैसे ईश्वर ने उनकी सुन ली हो। दानों पति-पत्नी ने राशन का ढेर लगा लिया और पहली बार पूरे परिवार ने भरपेट खाना खाया और तीनों ही थककर गहरी नींद में सो गए।

अगले दिन सुबह-सुबह दोनों उठे तो दोनों के चेहरे पर एक अलग-सी ख़ुशी, एक अलग-सा संतोष था। राघव ने अपनी पत्नी से पूछा कि घर में कितने पैसे हैं? सुनेना ने कहा, "जी बस एक रुपया है।"

"तो चलो! इसे हाँडी में डाल दो," राघव ने कहा।

सुनेना ने उसे हाँडी में डाल दिया और राघव ने इस तरह से उस एक रुपये से न जाने कितने रुपये बना लिए और अपनी पत्नी से कहा की में अब परचून की दुकान खोल लेता हूँ। राघव ने एक दुकान खरीदकर वहाँ अपना व्यापार जमाया। और वे बहुत ख़ुशी से दिन व्यतीत करने लगे। अब उन्हें किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी।

फिर एक दिन शाम को काम करते हुए ठोकर खाकर सुनेना हाँडे में जा गिरी। भाग कर राघव ने उसे निकाला, तभी वह क्या देखता है कि हाँडे में से दूसरी औरत निकलने के लिए चिल्ला रही है। सुनेना यह देखकर घबरा गई। हु-ब-हु अपने जैसा चेहरा देख सुनेना हैरान हो गयी। और सिर पर हाथ रखकर सोचने लगी कि ये क्या हुआ अब उसका क्या होगा? दूसरी औरत को बाहर क्यों निकाला कहकर राघव से झगड़ने लगी। उन दोनों की लड़ाई में राघव भी हाँडें में जा गिरा। देखते ही देखते हाँडे में से ज़ोरों की आवाज़ें आनी शुरू हो गयीं। सुनेना ने हाँडे में से दोनों को बाहर निकाला। उन दोनों को देखकर वह हैरान और परेशान हो गयी कि इनमें से आखिर असली राघव कौन है? तभी राघव सुनेना की ओर देखकर मुसकुराते हुए कहने लगा कि मैं ही असली राघव हूँ। चलो, अब इस हाँडे ने ही हम दोनों की समस्या का समाधान कर दिया है। क्यों न हम इन दोनों का भी ब्याह करा दें। सुनेना मुसकुराते हुए कह उठी, "बिलकुल ठीक कहा जी, ऐसा ही करते हैं।"

इस प्रकार राघव और सुनेना ने उन दोनों का ब्याह करा दिया और पास के ही गाँव में दोनों के लिए रहने के लिए घर का बंदोबस्त कर दिया और साथ ही उनका काम-धंधा भी खुलवा दिया। वो दोनों भी उन दोनों की तरह अपने गृहस्थ जीवन का आनंद लेने लगते हैं। लेकिन जब कभी सुनेना और राघव की नज़र उस हाँडे पर जाती, दोनों का हँस-हँस कर बुरा हाल हो जाता।


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