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03.28.2008
 

निराला एवं उनकी परवर्ती कविता में मुक्तिगान
डॉ. दौलत राव वाढेकर
वरिष्ठ व्याख्याता, हिन्दी केन्द्रीय विद्यालय, देहू रोड, पुणे


 निराला अपने साहित्य कर्म में इतने निराले रहे कि उन्होंने साहित्य में एक अत्यंत निराली परंपरा का ही निर्माण कर डाला। वे मानव, समाज, राजनीति, साहित्य आदि को बंधन मुक्त करने हेतु आजीवन संघर्ष करते रहे। समस्त प्रकार के अवांछनीय बंधनों को तोड़ने का श्रीगणेश सन 1932 में तोड़ती पत्थरसे हुआ था। इससे पूर्व लोकप्रसिद्ध नायक-नायिकाओं, राजा-महाराजाओं, वीर पुरुषों अथवा श्रेष्ठ पात्रों पर ही काव्य सृजन किया जाता था। हाँ, गद्य में प्रेमचंद जी ने अपने उपन्यासों तथा कहानियों में ग्रामीण पात्रों, शोषित, पीड़ित, दलित, दैन्य से प्रताड़ित, अन्याय से कुचले हुए लोगों को अपने सृजन का केंद्र बिंदु बनाकर विगत परंपरा को तोड़ा था, किंतु काव्य सृजन तो परंपरा का ही अनुसरण कर रहा था। निराला जी की तोड़ती पत्थरने ही काव्य में इस परंपरा को तोड़़ा है।

काव्य को छंदों के शिकंजे से मुक्त कराने का श्रेय भी निराला जी को ही जाता है। उन्होंने ही छंदमुक्त कविता का सूत्रपात किया है। परिमलकी भूमिका में वे कहते हैं मुक्त काव्य से साहित्य में एक प्रकार की स्वाधीन चेतना फैलती है।इस साहसिक कृत्य हेतु उन्हें तत्कालीन बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों एवं संपादकों द्वारा बार-बार मानसिक यातनाएँ दी गई, उनकी उपेक्षा की गई। सरोज स्मृति में वे स्वयं लिखते हैं -

तब भी मैं इसी तरह समस्त

कवि जीवन में व्यर्थ ही व्यस्त

लिखता अबाध गति मुक्त छंद

पर संपादक गण निरानंद

नंददुलारे वाजपेयी लिखते हैं – “निराला अंत:पुर के समस्त वैभव और उसकी सारी परतंत्रता से मुक्त कर कविता देवी को खुली हवा में ले आए” - वे आगे लिखते हैं – “स्वच्छंदता का अबाध स्वरूप निराला जी की रचनाओं में देखा जाता है, उनकी तुलना इस युग के किसी दूसरे कवि से नहीं की जा सकती।

    तोड़ती पत्थरने न केवल विषयवस्तु या छंद के बंधन को तोड़ा है, वरन उसने जन मानस में दीनों के प्रति करुणा का भाव जागृत कर उन्हें दैन्य-मुक्त कराने हेतु प्रेरित भी किया है। चाहे वह इलाहाबाद के पथ पर चिलचिलाती धूप में पत्थर तोड़ने वाली श्रमिक महिला हो अथवा भिक्षुक। उनके चित्रांकन की विशेषता यह है कि रसज्ञ भाव-विगलित हुए बिना नहीं रह पाता। प्रमाण स्वरूप भिक्षुक कविता का एक अंश दृष्टव्य है -

 वह आता

पछताता पथ पर

पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक

चल रहा लकुटिया ­­टेक

मुट्ठी भर दाने को, भूख मिटाने को

मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता

दो टूक कलेजे के करता

पछताता पथ पर आता

निराला क्रांतिकारी कवि थे, जिसके लक्षण उनके साहित्य, विचार और आचरण -तीनों में स्पष्ट दिखाई देते हैं। महादेवी वर्मा के अनुसार निराला जी विचार से क्रांतिदर्शी और आचरण से क्रांतिकारी हैं। वे भारतीय कृषक के शोषण से न केवल क्षुब्ध दिखाई देते हैं वरन उसे शोषणमुक्त करने हेतु क्रांति का आह्वान करने हुए बादल-राग में लिखते हैं -

 जीर्ण बाहु, है शीर्ण शरीर

मुझे बुलाता कृषक अधीर

ऐ विप्लव के वीर !

चूस लिया है उसका सार

हाड़ मात्र ही है आधार

ऐ जीवन के पारावार

भारतीय विधवा नारी का जीवन दु:ख के अथाह सागर में डूबा हुआ होता है। पुरुष-प्रधान, समाज-व्यवस्था में उसकी पीड़ा का कोई अंत नहीं है। निराला जी का परदुख:कातर, संवेदनशील हृदय उसे पीड़ा-मुक्त कराने हेतु छटपटाने लगता है। विधवा की पीड़ा का कारुणिक चित्रण करते हुए वे लिखते हैं -

 अति छिन्न हुए भीगे अंचल में मन को

दुख रूखे-सूखे अधर त्रस्त चितवन को

वह दुनिया की नजरों से दूर बचाकर

रोती है अस्फुट स्वर में

दुख सुनता है आकाश धीर

निश्चल समीर

सरिता की वे लहरें भी ठहर-ठहरकर 

कबीर के पश्चात शोषण, अन्याय, अत्याचार से जुड़े लोगों को दबंग एवं निर्भीक तरीके से चुनौती देकर ललकारने का जो साहस निराला जी में दिखाई देता है, वैसा साहस अन्य कवियों में दिखाई नहीं देता। कुकुरमुत्ता में अँग्रेजों को ललकार कर वे कहते हैं ...

 अबे, सुन बे गुलाब

भूल मत जो पाई ख़ुशबू, रंगो आब   

खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट

डाल पर इतरा रहा है कैपिटिलिस्ट

वे समाज को रूढ़ियों एवं सड़ी-गली मान्यताओं के बंधन से मुक्त करना चाहते थे। स्वयं अपनी पुत्री सरोज का भी विवाह उन्होंने बिना दहेज, बिना बारात तथा बिना किसी को आमंत्रित किए ही पुरानी सारी परंपराओं को तोड़कर एकदम नए ढंग से संपन्न कर डाला। वे स्वयं लिखते हैं ...

 ..... पर नहीं चाह

मेरी ऐसी, दहेज देकर

मैं मूर्ख बनूँ, यह नहीं सुघर

बारात बुलाकर मिथ्या-व्यय

मैं करुँ नहीं ऐसा सुसमय

हो गया ब्याह आत्मीय स्वजन

कोई थे नहीं, न आमंत्रण

था भेजा ....

प्रस्तुत काव्यांश इस बात का प्रमाण है कि वे कोरे उपदेशक नहीं थे, अपितु वे जैसा सोचते थे, लिखते थे, उसी के अनुरूप आचरण भी करते थे। कथनी और करनी में अद्‌भुत एकरूपता के कारण ही वे अन्य कवियों से सर्वथा निराले थे। उन्होंने वैवाहिक परंपराएँ तो तोड़ी ही, सरोज की मृत्यु पर उसका तर्पण भी वे अनोखे ढंग से करते हैं -

कन्ये, गत कर्मों का अर्पण

कर करता मैं तेरा तर्पण

निष्कर्षत: निराला जी को मुक्ति का कवि कहा जा सकता है। मुक्ति विषमता से, मुक्ति भेदभाव से, मुक्ति विपन्नता से, शोषण से, अन्याय से, कुरीतियों से। वे समानता पर आधारित एक स्वस्थ समाज का निर्माण करना चाहते थे, जिसके लिए वे आजीवन विरोधी शक्तियों से संघर्ष करते रहे।

निराला जी के इस मुक्ति-संघर्ष में प्रयोगवादी कवियों ने भी सुर में सुर मिलाया है। द्वितीय महायुद्ध के भीषण दुष्परिणामों के फलस्वरूप अब मध्यवर्गीय समाज भूख और अनैतिकता के बीच पिसने लगा तो मध्यवर्गीय शिक्षित नवयुवक-कवियों के हृदय में व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह की आग भड़क उठी और इसी के परिणाम स्वरूप अन्याय, अत्याचार, उत्पीड़न एवं शोषण से मध्यवर्गीय समाज को मुक्त कराने हेतु प्रयोगवादी काव्य का सृजन प्रारंभ हुआ। प्रयोगवादी रचनाओं का सूत्रपात 1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित तार-सप्तकके प्रकाशन से माना जा सकता है। प्रयोगवादी कवियों ने जहाँ एक ओर अव्यवस्था के प्रति विद्रोह किया वहीं दूसरी ओर साहित्य की प्रचलित परंपराओं को भी बदलकर उनके स्थान पर नए शब्द, नए छंद, नए उपमान, नए प्रतीक आदि का प्रयोग प्रारंभ किया। विभिन्न नए प्रयोगों से युक्त होने के कारण ही इन कविताओं की प्रवृत्ति को प्रयोगवादके नाम से अभिहित किया गया। प्रयोगवाद के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए डॉ लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय लिखते हैं - यह एक ऐसा व्यक्ति चाहता है जो समाज की कुरूपताओं, कलुषताओं, रूढ़ियों और खोखली परंपराओं के प्रति विद्रोह करता है।’ ‘अज्ञेय’, नेमीचंद जैन, रघुवीर सहाय, जगदीख गुप्त, धर्मवीर भारती, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, सुदामा पाण्डेय धूमिल’, केदारनाथ सिंह आदि उल्लेखनीय प्रयोगवादी कवि हैं।

बहुचर्चित प्रयोगवादी कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना नए-नए प्रतीकों के लिए सुविख्यात हैं किंतु उनकी रचनाओं में कतिपय ऐसे अंश भी विद्यमान हैं जिनमें सर्वहारा वर्ग को मुक्ति के क्रांतिकारी मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी गई है, यथा ...

 बढ़ो बेशुमार

गंदी बस्तियों, झोपड़ों, गटरों से निकल

बनाकर कतार

चढ़ो इस जंगल पर

बनाकर विराट आरे की धार

साधिकार

सुदामा पाँडेय धूमिलकी कविताओं में भी अनेक नए प्रतीक तथा नए प्रयोग देखने को मिलते हैं। निराला-प्रसूत मुक्ति-यात्रा को आगे बढ़ाते हुए दैन्य से पीड़ित एक अत्यंत कारुणिक चित्र प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं -

 मेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैं

माँ की आँखें पड़ाव से पहले ही

तीर्थयात्रा की बस के

दो पंचर पहिये हैं।

पिता की आँखें -

लोह साँय की ठंडी शलाखें हैं

बेटी की आँखें मंदिर के दीवट पर

- - - - - - - -

क्योंकि हम पेशेवर गरीब हैं

कवि केदार नाथ सिंह को मुक्ति के अन्य मार्गों की अपेक्षा उन्हें कविता का मार्ग अधिक भाता है। उन्होंने कहा भी है - मुक्ति का रास्ता होती है कविता। उनका काव्य-संकलन उत्तर कबीरऔर अन्य कविताएँ इस बात की साक्षी हैं। ग्रामीणों के प्रति उनकी छटपटाहट प्रस्तुत काव्यांश में दृष्टव्य हैं ....

 क्या करूँ मैं

क्या करूँ, क्या करूँ कि लगे

कि मैं इन्हीं में से हूँ

इन्हीं का हूँ

कि यही है मेरे लोग

जिनका मैं दम भरता हूँ कविता में

 अज्ञेय प्रसूत प्रयोगवाद से लगभग 1950 में कवियों का एक समूह धर्मवीर भारती के साथ परिमल ग्रुपके नाम से अलग हो गया। इस ग्रुप के कवियों की रचनाओं को नई कविताकी संज्ञा दी गई। इन कविताओं पर यूरोपीय साहित्यिक प्रवृत्तियों का प्रभाव है। डॉ लक्ष्मीनारायण वार्ष्णेय लिखते हैं - 1950 ई. से कहा जाता है कि नई कविता में प्रयोगवादी कविता की अपेक्षा अधिक संतुलन आने लगा और वह जीवन की नैकट्‌य प्राप्त करने लगी, मध्यवर्गीय कवियों द्वारा जीवन की विद्रूपता और विसंगति के तनाव-प्राप्त अनुभव की यथार्थता और तीव्रता उसमें आ गई, नकली मुखौटों और खोखली परंपराओं का भंडाफोड़ होने लगा।

निराला जी के इस मुक्ति-संघर्ष को पुष्पित, पल्लवित करने में प्रगतिवादी कवियों की अहम भूमिका रही है, जिनमें रामेश्वर प्रसाद शुक्ल अंचल’, भगवती चरण वर्मा, माखन लाल चतुर्वेदी, सुमित्रानंदन पंत, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन शास्त्री, शिवमंगल सिंह सुमन, शमशेर बहादुर सिंह, शील, विजेन्द्र, ऋतुराज, राजेश जोशी, उदयप्रकाश, अरुण कमल, दिनेश शुक्ल आदि अनेक कवियों के नाम लिए जा सकते हैं। प्रगतिवादी कवि मार्क्सवाद से प्रभावित हैं। वे मानव-मानव एक समानकी विचारधारा को पुष्ट करने वाले तथा शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति रखने वाले कवि हैं। उनके काव्य में कल्पना की कोरी उड़ान न होकर यथार्थ का सहज, सरल चित्रण होता है। प्रगतिवादी कवि साहित्य को जीवन से अलग नहीं मानते पूँजीवाद का विरोध तथा सर्वहारा वर्ग को दैन्य-मुक्त कर उन्हें समानता का अधिकार दिलाना ही उनके काव्य का मूल उद्देश्य है, और इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु ही वे निर्धन कृषक, शोषित, श्रमिक, दलित, पीड़ित, घृणित एवं उपेक्षित पात्रों को अपने काव्य की विषयवस्तु बनाकर उन पर काव्य-सृजन करते हैं।

मुक्ति के प्रबल समर्थक मुक्तिबोध पर टिप्पणी करते हुए डॉ.पद्मा पाटिल लिखती हैं -मुक्तिबोध मानव की मुक्ति चाहते हैं, उन्हें पूँजीवादियों द्वारा होने वाले शोषण से अत्यंत चिढ़ है। उनका यह दृढ़ विश्वास है कि संगठित होकर संघर्ष करने से ही पीड़ितावस्था से व्यक्ति की मुक्ति संभव है। चाँद का मुँह टेढ़ा है में वह लिखते हैं ...

 अपनी मुक्ति के रास्ते अकेले नहीं मिलते

    अँधेरे में कविता में मुक्तिबोध एक अत्यंत मर्मस्पर्श चित्र उकेरते हुए लिखते हैं ...

गरीबों का वहीं घर, वही छत

उसके ही तल-खोह अँधेरे में सो रहे

गृह हीन कई प्राण

अँधेरे में डूब गए

डालों में लटके जो मटमैले चिथड़े

किसी एक अति दीन

पागल के धन वे

हाँ, वहाँ रहता है सिरफिरा कोई

मुक्तिबोध की कविताओं से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने अपनी कविताओं द्वारा सर्वहारा वर्ग में प्रतिरोधी शक्तियों से टकराने का साहस जागृत कर उनके आत्मबल को बढ़ाया है।

केदारनाथ अग्रवाल की कविता पैतृक संपत्ति में भारतीय किसान को ऋणमुक्त तथा क्षुधा-मुक्त कराने का मर्मस्पर्शी आग्रह किसी भी सहृदय व्यक्ति को सोचने पर विवश कर देता है —

बनिया के रुपयों का कर्जा

जो नहीं चुकाने पर चुकता

बस यही नहीं जो भूख मिली

सौ गुनी बाप से अधिक मिली

अब पेट खलाए फिरता है

चौड़ा मुँह बाए फिरता है

वह क्या जाने आजादी क्या ?

आजाद देख की बातें क्या ?’

प्रस्तुत काव्यांश पाठक के हृदय में मात्र करुणा का भाव जागृत करने का ही कार्य नहीं करता वरन शोषक वर्ग के प्रति आक्रोश पैदा कर उनसे संघर्ष करने का साहस भी पैदा करता है।

बचपन से ही अभाव का कड़वा आसव पीते आ रहे बाबा नागार्जुन के मन में अमानवीय शक्तियों के विरुद्ध विद्रोही भावना का जागृत होना स्वाभाविक ही है। फलस्वरूप उनका संपूर्ण काव्य क्रांति से ओत-प्रोत है। उन्हें दृढ़ विश्वास है कि एक-न-एक दिन सर्वहारा वर्ग अपने हक के लिए अवश्य उठ खड़ा होगा और कुबेरों से पंजा लड़ाकर अपने अधिकार छीन लाएगा। वह कौन था?’ में वे स्पष्ट घोषणा करते हुए लिखते हैं ...

 आज बंधन-मोक्ष के त्योहार का आरंभ होता है

उपद्रव, उत्पात कहकर कुबेरों का वर्ग रोता है

मशीनों पर और श्रम पर, उपज के सब साधनों पर

सर्वहारा स्वयं अपना करेगा अधिकार स्थापित

    ऐसी निर्भीक एवं दबंग घोषणा पीड़ा का भुक्तभोगी बाबा नागार्जुन जैसा सर्वहारा वर्ग का हितचिंतक ही कर सकता है। श्रम-जीवियों की ऐसी सबल एवं निष्ठावान पक्ष धरता बहुत कम कवियों में देखने को मिलती है। बाबा शोषित वर्ग में धधकती मुक्ति की ज्वाला को देखकर मुग्ध हो उठते हैं और कहते हैं ...

 लहरा उट्ठी है

कदम-कदम पर, इस माटी पर !

महामुक्ति की अग्नि-गंध

ठहरो-ठहरो इन नयनों में इसको भर लूँ

अपना जनम सकारथ कर लूँ !

आज तक न जाने कितने नारी-मुक्ति-आँदोलन चलाए गए, कितने विधान तैयार किए गए, कितनी समाजसेवी संस्थाओं ने एतदर्थ वाहवाही लूटी किंतु नारी की स्थिति में, उसकी दासता में कोई विशेष सकारात्मक परिवर्तन नहीं आया। नारी की इस दयनीय स्थिति से क्षुब्ध होकर प्रगतिवादी कवि शील जी उस पर प्रश्नों की झड़ी-सी लगाते हुए, उसे झकझोर कर दासता के विरुद्ध विद्रोह करने की प्रेरणा देते हुए लिखते हैं --

 आज भी तुम

दान दी जाती हो कन्यादान में

यह नहीं दासत्व तो फिर और क्या

आज भी तुम बिक रही बाजार में

यह नहीं दासत्व तो फिर और क्या

लगभग अर्धशताब्दी की लंबी यात्रा तय कर निराला जी द्वारा प्रारंभ की गई मुक्ति-यात्रा बीसवीं शती के नवें दशक तक आ पहुँचती है। इन पचास वर्षों के काव्य में व्यक्त मुक्ति की भावना को स्पष्ट करते हुए डॉ मुक्तेश्वर नाथ तिवारी लिखते हैं -मुक्ति कविता की ही नहीं, व्यापक और आवश्यक अर्थ में समकालीन जड़ताओं, दोषों, कुरीतियों, अंधविश्वासों से भी मुक्ति। विषमता से मुक्ति, शोषण और उत्पीड़न से मुक्ति, छल-प्रपंच और अँधेरों से मुक्ति। प्रश्न यह उठता है कि आखिर यह मुक्ति का संघर्ष कब तक? इसका उत्तर देते हुए डॉ तिवारी आगे लिखते हैं - शती के अंत की हिंदी कविता को आदर्श स्थिति बहाल करने की फिक्र है और जब तक यह स्थिति बहाल नहीं होती, कविता का तद्विषयक संघर्ष जारी रहेगा, ऐसा कहा जाता है। इसीलिए विगत कुछ दशकों से व्यवस्था विरोध का मुहावरा कविता में अक्षुण्ण, स्थिर होकर रह सका है क्योंकि आदर्श का कायम होना अभी वांछित ही है।

प्रगतिवादी कवियों के साहित्य पर अनिल सिन्हा ने बड़ी ही सार्थक टिप्पणी करते हुए लिखा है -हिंदी कविता में भूख, गरीबी, शोषण, शोषण का प्रतिरोध, भूख और गरीबी से निजात पाने की कोशिश, श्रम के महत्व को सामने लाना, एक सुंदर बराबरी वाली दुनिया के निर्माण की आकांक्षा, सामंती समाज के स्वरूप तथा नागरिक अधिकारों के हनन और इसके विरुद्ध चेतना का विकास - ऐसी तमाम स्थितियों का बड़ी शिद्दत से और कई बार बड़ी कलात्मकता के साथ प्रवेश हुआ। यदि हम मानव मुक्ति के उद्देश्य से सृजित संपूर्ण साहित्य पर दृष्टिपात करें तो अनिल सिन्हा जी के कथन का सत्यापन एवं सार्थकता स्वत: ही सिद्ध हो जाती है।


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