अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
02.27.2017


भायली -एक परिभाषा प्यार की

रात का समय था घड़ी में लगभग 9 बज रहे थे। ट्रेन अपनी रफ़्तार से चल रही थी। कोच में काफ़ी हलचल सी थी, कुछ यात्री खाना खा रहे थे, कुछ आपस में बतिया रहे थे। एक चाचा जिनकी उम्र लगभग 65 वर्ष के आसपास थी ख़ुद को काफ़ी गर्व के साथ मोदी जी के भक्त बताते हुए साथ ही साथ अपने शहर की बातो को काफ़ी बढ़ा-चढ़ा के कह रहे थे। वहीं पास में नन्ही सी बच्ची ऊपर वाली सीट पर जाने के लिए बनी हुई सीढ़ी को पकड़ कर ऊपर चढ़ने की नाकाम कोशिश कर रही थी और उसकी माँ बच्ची की ओर से बेफ़िक्र सामने वाली सीट पर बैठी महिला के चूड़ियों की तारीफ़ करते हुए अपना ज्ञान बता रही थी। खिड़की के पास एक युवक अपने फ़ोन में ही मग्न बैठा हुआ था। इस पूरे कौतुहल से दूर कोच के फाटक (गेट) पर बैठा हुआ सुनील खेत-मैदानों, सब को एकटकी से देख रहा था और मन ही मन अपनी एक अलग ही दुनिया में खोया हुआ गुनगुना रहा था "है दिल को तेरी आरज़ू पर मैं तुझे ना पा सकूँ"।

तभी एक आवाज़ से सुनील की तन्द्रा टूटी "जल्दी आ भायली"।

एक लड़की अपनी सहेली को बुला रही थी और फिर वो दोनों लड़कियाँ चली गयीं। पर सुनील इस शब्द "भायली" को सुनकर अपनी अलग ही दुनिया में चला गया था।

सोलह साल का ही तो था जब वो कॉलेज में आ गया था। अभी तक तो गाँव का एक मासूम और भोला सा बच्चा ही था और यहाँ कॉलेज का माहौल थोड़ा शहरीनुमा था, इसलिए वो अधिकतर ख़ामोश ही रहता था। सवेरे जल्दी उठ के तैयार होके नाश्ते वगैरह में ही 9 बज जाते थे और फिर भागते हुए 9:30 की पहली बस पकड़ना ये ही दिनचर्या थी उसकी।

उसके बैठने के लगभग दस मिनट बाद अगला स्टेशन आता था और वहाँ से ही तो "वो" चढ़ती थी। बस में इतनी ज़्यादा भीड़ तो नहीं हुआ करती थी मगर सीटें खाली भी नहीं होती थीं। फिर सुनील का खड़े होके उसे सीट दे देना भी उसके दैनिक क्रियाकलाप का एक हिस्सा सा बन गया था। एक ही बस में जाते थे एक ही कॉलेज में जाते थे मगर दोनों की कभी बात करने की हिम्मत नहीं हुई थी।

इस तरह से पहला साल पूरा हो गया। अब सुनील द्वितीय वर्ष में आ गया था और कॉलेज में कुछ नए दोस्त भी बन गए थे। अब उसका कॉलेज बैग भी मात्र एक रजिस्टर पर आकर रुक गया था।

क्लास के अलावा जो समय बचता उस समय में कॉलेज गार्डन की दूब पर सुनील और उसके दोस्तों की महफ़िल जम जाती थी। लगभग सभी गाँव वाले लड़के ही थे और बातें भी अधिकांशतया क्रिकेट की ही होती थीं।

पढ़ाई और वक़्त दोनों अपनी रफ़्तार से चल रहे थे।

पिछले चार-पाँच दिन से सुनील कुछ बैचेन सा था। कारण था वो लड़की जो चार-पाँच दिन से आ नहीं रही थी। आख़िर क्या हो गया? क्यों नहीं आ रही? उसकी तबियत तो ठीक है? इस तरह के ना जाने कितने ही ख़्याल आने लगे थे उसे।

आज वो आई थी और आज बस में भीड़ भी नहीं थी। सुनील के पास वाली सीट भी खाली थी और वो वहीं आ के बैठ गयी। दोनों एक-दूसरे की तरफ़ देख थोड़े मुस्कुराये। आख़िर सुनील ने हिम्मत करके पूछ ही लिया, "क्या हुआ था तबियत ठीक नहीं थी क्या? आप आ नहीं रहे थे तीन-चार दिनों से।"

"वो – नहीं, वो मैं ननिहाल गयी थी।"

बस इससे आगे सुनील से कुछ पूछा नहीं गया और उसने कुछ बताया नहीं। मगर सुनील आज काफ़ी ख़ुश था। पहली बार बात जो की थी! और फिर उसी दिन वापस आते वक़्त उसने सुनील से कहा, "मुझे अपनी कॉपी दीजिये ना, तीन-चार दिन में जो छूट गया है वो कंप्लीट करना है।"

…और सुनील के हाथ से तो कॉपी (रजिस्टर) छूटते छूटते बचा!

धीरे-धीरे दोस्ती आगे बढ़ने लगी थी। अब लगभग द्वितीय वर्ष समाप्ति की ओर आ गया था। वे दोनों भी अब ग्रामीण परिवेश से बाहर आ के थोड़े फ्रैंक भी हो गए थे। कॉलेज में भी कई बार लेक्चर की बात के साथ-साथ दूसरी बातें भी करना शुरू हो गया था। इसी दरमियां एग्ज़ाम ख़त्म हो गए थे.. तो अब छुट्टियाँ शुरू!

आमतौर पर जब छुट्टियाँ मिलती हैं तो लड़के ख़ुश होते हैं। मगर सुनील थोड़ा उदास सा था। कारण था कि अब वो उस लड़की को हमेशा देख नहीं पाएगा, बाते नहीं कर पाएगा।

लेकिन कहते हैं ना "अगर आपका प्यार सच्चा हो तो भगवान भी आपका साथ ज़रूर देता है"!

आख़िरी दिन उसने सुनील को एक ग्रीटिंग कार्ड दिया था जिसमें बड़े से और स्टाइलिश फ़ाँट्स में लिखा हुआ था "फ्रेंड्स" और नीचे उस लड़की के नम्बर थे।

उस कार्ड पर अँग्रेज़ी में कुछ शब्द भी लिखे हुए थे जो कि सुनील ने पढ़े भी नहीं थे।

बस अब तो सुनील बहुत ख़ुश था! घर आते ही सोचा, कॉल करूँ; पर उसे लगा नहीं इतना जल्दी ठीक नहीं है। फिर धीरे-धीरे मैसेज से चैट होने लगी थी दोनों की। मगर कॉल करने की हिम्मत नहीं हुई।

काफ़ी दिन बीत जाने के बाद उसे लगा कि अब तो कॉल कर ही लेनी चाहिए। तो आख़िर उसने कॉल की और काफ़ी देर बातें कीं। सुनील दुनिया से बेख़बर हुआ बातें कर ही रहा था कि अचानक उसके पापा आ गए। वो ज़ोर से बोला, "और सुना भायला," ताकि पापा को लगे कि किसी दोस्त से बातें कर रहा है। पर उधर सामने से उसकी आवाज़ आयी, "भायली बोल भायली! जेंडर चेंज मत कर म्हारो!"

तो इस तरह से बस इतनी ही बात हुई थी उन दोनों में!

उस दिन के बाद उसके मैसेज भी आने बन्द हो गए थे। सुनील थोड़ा परेशान सा था। उसने कॉल लगाया मगर वो नम्बर भी बन्द आ रहे थे।

अब कॉलेज वापस खुल गए थे। उसने सोचा - उससे मिल के पूछ लूँगा कि क्या हुआ था मगर वो लड़की आयी नहीं थी।

इस तरह से एक हफ़्ता-दस दिन क़रीब हो गए मगर उस लड़की का कोई पता नहीं था।

आख़िर क्या हो गया होगा उसको? नम्बर अभी तक भी बन्द आ रहे हैं। किसी से कुछ पूछूँ… लेकिन किससे? "बस में किसी से पूछ के देखूँगा" – उसने सोचा।

फिर बस में एक दिन कुछ लोगों की बातों से उसे पता चला कि उस लड़की के दादाजी गुज़र गए थे, और उनके समाज में जब कोई बुज़ुर्ग गुज़र जाता है तो उसके साथ एक शादी भी कर दी जाती है। इस तरह से उसकी शादी हो गयी थी।

और फिर धीरे-धीरे थर्ड इयर भी कंप्लीट हो गया था। सुनील ने आगे जा के ख़ुद का बिज़नेस भी स्टार्ट कर लिया था मगर वो लड़की आज तक वापस कभी नहीं दिखी।

तभी पीछे से किसी ने आवाज़ लगायी, "भैया गेट पर से हटिये मुझे नीचे उतरना है।"

सुनील फिर से अपनी वर्तमान दुनिया में लौट आया। प्यार का वह ख़ूबसूरत अहसास सुनील में अभी भी ज़िन्दा था। वह फिर से उसी की सोच में डूब गया।

एक आवाज से सुनील को जिसकी याद आ गयी थी कौन थी वो सुनील की? आख़िर लगती क्या थी? सुनील को तो उसका नाम तक नहीं पता था!

सुनील के लिए वो बस एक याद थी। ये एक अहसास थी… बस एक "भायली" थी!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें