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ISSN 2292-9754

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10.02.2016


महाभारत: एक सर्जनात्मक महाकाव्य

महाभारत को ‘महाकाव्यों का महाकाव्य’ कहना समीचीन होगा क्योंकि वह ऐसी आधारभूत कृति है जिसने कई महाकाव्यों, आख्यानों आदि को जन्म दिया है। इसका प्रमाण भारतीय भाषाओं के साथ ही विश्व की ऐसी अनेकानेक कृतियाँ हैं जिनका उपजीव्य महाभारत रहा है। यदि हम केवल भारतीय साहित्य की बात करें तो देखेंगे कि संस्कृत से लेकर आज तक लगभग सभी भारतीय भाषाओं में महाभारत से गृहीत, अनुकृत या प्रेरित अनेक रचनाओं ने जन्म लिया है। इतना ही नहीं लोक-साहित्य ने भी इसे उपजीव्य बनाया है; और ऐसी तो असंख्य रचनाएँ होंगी जिन्होंने महाभारत से सकारात्मक या नकारात्मक प्रेरणा पाई हो।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने लिखा है कि "रामायण और महाभारत ये दो महाकाव्य पिछले दो हज़ार वर्षों से समस्त भारतीय काव्यों के उपजीव्य रहे हैं, बल्कि यह कहना चाहिए कि महाभारत से प्रेरणा लेकर लिखे गए नाटकों और काव्यों की संख्या संस्कृत में भी बड़ी थी और यह संख्या भारत की अर्वाचीन भाषाओं में भी विशाल है। महाभारत चरित्रों की नवीन व्याख्याएँ की जाती हैं और उनके द्वारा संस्कृति के परिवर्तनों पर प्रकाश डाला जाता है।"

"उसके पात्र और घटनाएँ, स्थितियाँ इतनी विलक्षण और गतिशीत हैं, उनमें शाश्वत तत्त्वों का समावेश है कि किसी भी युग में महाभारत युगानुरूप सृजन ही नहीं, सृजन और विचार-दृष्टि भी देता है।" अन्यत्र वे एक महत्त्वपूर्ण बात कहते हैं- "जब हमारी संस्कृति में परिवर्तन आते हैं, महाभारतीय चरित्रों की नवीन व्याख्याएँ की जाती हैं और उनके द्वारा संस्कृति के परिवर्तनों पर प्रकाश डाला जाता है।"

संस्कृत के बाद प्राकृत और अपभ्रंश में भी महाभारत को उपजीव्य बनाकर अनेक रचनाएँ लिखी गईं। विभिन्न मतों और धर्मों के रचनाकारों ने महाभारत की कथा को अपने अनुसार ढालकर उसका अलग पाठ रचा है। उदाहरणार्थ- जैनाचार्य जिनसेन (प्रथम) और जैनाचार्य ब्रह्मजिनदास द्वारा लिखित ‘हरिवंश पुराण’ में वस्तु और चरित्रगत अन्तर स्पष्ट लक्षित किया जा सकता है।

हिन्दी में मैथिलीशरण गुप्त का ‘जय भारत’ और ‘जयद्रथ वध’, दिनकर का ‘रश्मिरथी’ और ‘कुरुक्षेत्र’, नरेश मेहता का ‘महाप्रस्थान’ धर्मवीर भारती का ‘अंधायुग’ काव्य नाटक, माखनलाल चतुर्वेदी का नाटक ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ जयशंकर प्रसाद का ‘जनमेजय का नाग यज्ञ’, रामकुमार वर्मा का ‘एकलव्य’, शंकर शेष का ‘एक और द्रोणाचार्य’, नरेन्द्र कोहली का ‘महासागर’ सीतेश आलोक का ‘महागाथा’, चित्रा चतुर्वेदी कार्तिका का ‘महाभारती’ और ‘अम्बा नहीं मैं भीष्मा’ उपन्यास जैसी अनेकानेक कृतियाँ रची गई।

उर्दू में महाभारत पर आधारित कोई 36 ग्रंथ हैं। इनमें सी.पी. खटाऊ का ‘महाभारत’ नाटक, बाबूराम वर्मा का ‘द्रौपदी लीला’ दीवान साहिब चंद्र का ‘भीमसेन’, ख्वाजा हसन निज़ामी का ‘कृष्णबीती र्स्वम्’ मुंशी रियाज़ुद्दीन का ‘अर्जुन प्रतिज्ञा’ और ‘वीर अभिमन्यु’, जसवंत सिंह वर्मा का ‘आर्य संगीत महाभारत’ (नाटक) आदि का उल्लेख किया जा सकता है।

मराठी में 13वीं शती से ही महाभारत के अनुकरण और प्रेरणा से लिखी रचनाएँ उपलब्ध होती रही हैं। चिन्तामणि शास्त्री थट्टे का ‘विराट पर्व याचीं बाखर’, एस.एन. जोशी का ‘पतिव्रता सावित्री’, साने गुरूजी का ‘आस्तिक’, वि.स. खांडेकर का उपन्यास ‘ययाति’, शिवाजी सांवत का उपन्यास ‘मृत्युंजय’ और ‘युगंधर’, जी.एन. खांडेकर का ‘कर्णायन’, रणजीत देसाई का ‘राधेय’ आदि प्रसिद्ध हैं। संत ध्यानेश्वर की ‘भारत दीपिका’ में गीता का और दुर्गा भगवत के ‘व्यास पर्व’ में महाभारत का सुंदर विवेचन है। इसी तरह बांग्ला में बुद्धदेव बसु का ‘महाभारत की कथा’ और तमिल में चक्रवर्ती राजगोपालचारी की ‘महाभारत कथा’ महत्त्वपूर्ण विवेचनाएँ हैं।

ओड़िया में महाभारत अनेक रचनाओं का उपजीव्य रहा है। सारलादास का महाभारत तो सिरमौर है ही; आधुनिक युग में कई कृतियों के बीच प्रतिभा राय का द्रौपदी के चरित्र को लेकर लिखा ‘याज्ञ सेनी’ चर्चा में है। कन्नड़ में भैरप्पा का उपन्यास ‘पर्व’ प्रसिद्ध है।

पंजाबी में कृष्ण और भगवत् गीता गीतों में प्रस्तुत की गई है। अजायब कमल की लंबी कविता ‘इंकोत्तर सौ अक्खाँ वाला महाभारत’ उल्लेखनीय है। इसमें आधुनिक अभिमन्यु का ज़िक्र है: "अभी यहाँ कौन कह रहा था/कि रण क्षेत्र में जयद्रथ के कुटिल तीर के हाथों/अभिमन्यु मारा गया/नहीं वह तो आज के हर प्राणी में जीवित है/हाँ एक बात है/महँगाई तथा बेकारी का युग होने के कारण/रोज़गार ढूँढने के लिए बेचारे को/महीने में एकाध बार/अफ्रीका, अमेरिका तथा यूरोप का चक्कर लगाना पड़ता है।" महाभारत की सांकेतिक पृष्ठभूमि में आज के मनुष्य द्वारा लड़े जाने वाले महाभारत यानी दो परिवारों के बीच बँटवारे को चित्रित करने वाला मित्तर सेन मीत का ‘कौरव सभा’ उपन्यास महाभारत की प्रेरक शक्ति प्रकट करता है। इसी प्रकार वनीता की कविता ‘मैं शकुंतला नहीं’ में महाभारत की कथा तो नहीं है परन्तु उससे उत्पन्न नकारात्मक प्रेरणा सक्रिय है और यह कविता नारीवादी आख्यान बन जाती है। बी.एस. बीर का ‘महाभारत जारी है’ में महाभारत के चरित्रों की नए सन्दर्भ में प्रस्तुति है।

दुनियाभर की भाषाओं में महाभारत का अनुवाद हुआ है। थाईलैंड, जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया आदि की अनेक रचनाओं और कलाकृतिकयों में इसका प्रभाव देखा जा सकता है। जावा और थाईलैंड में तो महाभारत ‘महाभारत युद्ध’ के नाम से जाना जाता है। थाई में श्रीकृष्ण पर लिखी कविता, सावित्री पर लिखे नाट्यगान, ‘नलचंड’ आदि प्रसिद्ध है। जावा में अर्जुन की बड़ी मान्यता है। अर्जुन विवाह और कर्ण पर काव्य है। प्रसंगवश यह सूचना महत्त्वपूर्ण है कि ‘मध्येशिया से हिन्देशिया द्वीप समूह तक’ मरने से पहले कब्र पर लिखने के लिए महाभारत के श्लोक चुने जाते हैं। इसे समस्या समाधान के लिए भी पढ़ा जाता है।

प्रश्न यह है कि कृति में अनंत सर्जनात्मक संभावना क्यों होती है? क्योंकि किसी सपाट, एक पक्षीय, जड़ और ज़िद्दी रचना से इतनी रचनाएँ और विचार-वैभव का निकल पड़ना संभव नहीं है। आखिर ये कौन से गुण सूत्र हैं, वे कौन संभावनाएँ और तत्त्व हैं जो अन्य रचनाओं के जन्म की प्रेरणा बनते हैं- यहाँ तक कि पाठक के भीतर भी रचनाशीलता के गुण और छिपे अभ्यंतर को खोलते और बहुमुखी बनाते हैं? यह एक गंभीर चिन्तन और अन्वेषण का विषय है। इसके कुछ प्रारंभिक पहलुओं पर हम विचार करें तो संभवतः महाभारत के सर्जना-उत्सों का उल्लेख न हो सके।

महाभारत द्वारा अनेक रचनाओं को जन्म देने का पहला बड़ा कारण तो यह प्रतीत होता है कि यह एक उदार रचना है जो अपने स्त्रोत से जन्म लेने वाली किसी रचना की स्वायत्तता का हरण नहीं करती, किसी को ‘अनुकरण’ की लज्जा में नहीं बाँधती, उलटे सर्जक को देश-काल की भिन्नता के बावजूद सृजन की मौलिकता के लिए मुक्त करती है। संक्षेप में वह लोकतांत्रिक अवकाश (स्पेस) देती है, जो किसी भी स्तर पर ‘धर्मशास्त्र’ कही जाने वाली दुनिया की कोई रचना नहीं देती। यह धार्मिकता के बहाने लोक-चेतना, संवेदना और जीवन की समग्रता के काव्य है।

दूसरा और महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि यह एकायामी काव्य नहीं है। सभी प्रकार के ज्ञान, धारणाओं और भावों के लिए यहाँ अवकाश है और सब अपनी-अपनी दृष्टि से इसमें आश्रय पा लेते हैं। महाभारत की इस विशेषता की ओर बहुत पहले, 11वीं शती के आदि तेलुगु कवि नन्वय भट्ट ने ध्यान आकर्षित किया। वे लिखते हैं- "धार्मिक विचारक महाभारत को धर्मशास्त्र मानते हैं, आध्यात्मिक महापुरुष इसे वेदांत कहते हैं, नैतिकतावादी इस ग्रंथ को नीतिशास्त्र और कवि पंडित इसे रस सिद्धक महाकाव्य मानते हैं, इतिहासकार तो इसे भारतीय इतिहास सिद्ध करते हैं, परम पुराण पंडित इसे अनेक पुराण ग्रंथों का संग्रह मानते हैं।"

महाभारत में से असंख्य कृष्ण, सैकड़ों-हज़ारों कर्ण, अर्जुन, भीम, एकलव्य, द्रोणाचार्य, द्रौपदी, गांधारी, धृतराष्ट्र, दुर्योधन, संजय, भीष्म, ययाति निकले हैं और अत्यंत विविध और कहीं-कहीं मूल से इतने अलग कि विरोधी स्वरूप में भी दिखाई देते हैं। इसका एक बड़ा कारण यह प्रतीत होता है कि महाभारत का कोई चरित्र न संपूर्ण रूप से उजला है न काला। दुर्योधन खलनायक होते हुए भी सर्वथा खल नहीं है। इसी तरह युधिष्ठिर परम सत्यवादी होते हुए भी किसी अवसर पर असत्य का आश्रय लेते हैं। व्यास मानते हैं कि कोई व्यक्ति पूर्ण नहीं है, यहाँ तक की पूर्ण पुरुष कृष्ण भी। कृष्ण भले ईश्वर हों उनकी मृत्यु होती है। अपूर्ण को ही तो बार-बार रचा जा सकता है। ‘पूर्ण’ तो सृजन की संभावना ही नष्ट कर देता है। संभवतः इसलिए आज भी महाभारत का स्त्रोत सूखा नहीं है, बल्कि कई अर्थों में अधिक प्रासंगिक ही है। महाभारत की कथावस्तु, घटनाचक्र और प्रमुख पात्र ही नहीं गौण कथा और नगण्य पात्र भी काव्य में प्रतिष्ठित हैं। युधिष्ठिर के यज्ञ की राख में लोटने वाला नेवला कितने महान सत्य को व्यक्त करते हुए असाधरण हो गया है। उसी तरह दुर्योधन का वह अदना-सा भाई विकर्ण बड़े-बड़े दिग्गजों से बड़ा है जो द्रौपदी को भरी सभा में नग्न करते समय समस्त वीरों, नीतिज्ञों से प्रश्न करता है कि ‘क्या यही धर्म है? क्या यही न्याय है? क्या स्त्री दाव पर लगाने की वस्तु है? इस कौरव के इन प्रश्नों से, मिश्र जी के शब्दों में ‘महाभारत कीलित’ है। साधारण के भीतर असाधारण की सर्जनात्मक प्रतिष्ठा के और भी अनेक आयाम और अन्तर्कारण होते हैं।

इन तमाम बातों का यह अर्थ नहीं कि महाभारत कच्चे माल का जखीरा है। वस्तुतः यह कृष्ण द्वैपायन व्यास की मेधा और परिपक्व प्रतिभा का विस्फोट है, जो किनारों में बँधी नदी की तरह नहीं, बल्कि एक विराट समुद्र की तरह तलातोम है- अपार, अदम्य, अगाध-हर पल गर्जना करता। यह शक्ति और वेग का काव्य है। इसमें अग्रसर होती सभ्यता के तमाम मिश्रण, तनाव, आपाधापी, अशांति, ईर्ष्या, मद, मोह और अंधमूढ़ता के साथ ही सधापन, दृष्टिसंपन्नता, विवेक, दर्शन, उदात्तता और जीवन की जटिल समस्याएँ और अनेक उत्तर भी हैं, और है एक सर्वनाशी युद्धः जो मनुष्य से लगाकर पशु, कीट, उदभिज आदि की सनातन वृत्ति हैः और विनाश की वह सीमा है जहाँ से पुनर्सृजन अनिवार्य होता है। वह नीति और अनीति; सच और झूठ, भौतिकता और आध्यात्मिक; स्वार्थ और परमार्थ को विस्मित कर देने वाला ताना-बाना बार-बार उधेड़ने, बार-बार उसकी सर्जनात्मक व्याख्या करने की लालसा जगाता है।

स्वयं महाभारतकार द्वारा उसे धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, मोक्षशास्त्र, इतिहास, नीतिशास्त्र कहकर उस

धर्मशास्त्रमिदंपुण्यमर्थशास्त्रमिदं परम्।
मोक्षशास्त्रमिदं प्रोक्त व्यासेन मित बुद्धिन।।

के विविधोन्मुख रचाव का संकेत किया गया है-

‘आदि पर्व’ में इसे इतिहास कहा गया- ‘जयो नामेतिहासोऽयं’ (20) ‘भारतानां यतशचायमितिहोसो महाद्भुतम्।’ परन्तु यदि यह भ्रम है तो दूर हो जाना चाहिए कि महाभारत का शास्त्र या इतिहास होना उसके काव्य से अलग है। क्योंकि भारत में महाकाव्य की अवधारणा कभी इकहरी नहीं रही है, उसमें इतिहास, शास्त्र, कलाएँ, वृत्तांत, रस, पुरुषार्थ, मानव-व्यवहार, प्रकृति, समाज-यानी पूरी सृष्टि शामिल होती है- यहाँ तक की अन्तर्विरोध भी। इसी से उसका महाकाव्य-रूप बनता है। यदि महाभारत के लिए ‘यन्न भारते तन्न भारते’ कहा जाता है तो उसमें ऐसा कुछ भी वर्जित नहीं हो सकता जो भारत में हो या जो एक महासंस्कृति की संपूर्णता का बिम्ब हो। युद्ध संसार के सभी आदिकाव्यों की मूल विषयवस्तु रही है। महाभारत ने इसे भाई-भाई के युद्ध के माध्यम से उठाकर अपूर्ण सूझ-बूझ का परिचय दिया है। आशय यह है कि जहाँ युद्ध प्रायः अस्वाभाविक और असंभव माना जाता है, वहाँ भी युद्ध है, जहाँ भी युद्ध है वहाँ असत्य, क्रूरता और हीन वृत्तियाँ अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचती हैं। सत्य के भीतर असत्य, उदात्त के भीतर अनुदात्त, पुण्य के भीतर पाप, न्याय के भीतर अन्याय, सहृदय के भीतर क्रूर का प्रवेश हो जाता है और ऐसी चरमताएँ टकराती हैं जहाँ अन्ततः मूल्यध्वंस होता है। महाभारत इसी दुर्दम्य काल के बीचों-बीच ‘गीता’ की रागिनी छेड़ता है जहाँ कर्म, दर्शन, विश्व-व्याख्या आदि का विचित्र सम्मिश्र होता है। गीता भी महाभारत को विश्वकाव्यों में अद्वितीय, विलक्षण और विस्मायक बनाती है। केवल गीता की ही नहीं, गीता के महाभारत के बीचों-बीच होने की भी जितनी व्याख्या की जाए वे अपर्याप्त प्रतीत होती है।

अगर हम महाभारत के रचना-शिल्प पर विचार करें तो वह कथाओं, दंतकथाओं, काल्पनिक स्वरूपों और विरूपीकरण से भरा है जो एक सर्जनात्मक कृति की कलात्मक माँग होती है। इसकी कथाओं और पात्रों में अनेक प्रकार के संकेत और गूढ़ार्थ हैं। उदाहरण के लिए, राजा अंधा है। और अंधे राजा के राज्य में सारे मूल्य और विधिसम्मत तत्त्व कैसी अंधता को प्राप्त होते हैं- इसकी ओर महाभारत से अधिक सटीक संकेत कौन कर सकता है? इसका एक पक्ष और है कि विचारशील रानी जो राजा की आँख हो सकती थी, उसने भी आँख पर पटटी चढ़ा ली। यानी पुर और अन्तःपुर दोनों जगह अंधेरा! अब इसके कितने नए अर्थ, कितनी व्यंजनाएँ संभव हैं, इसका कोई एक उदाहरण लें तो वह धर्मवीर भारती का ‘अंधायुग’ हो सकता है।

महाभारत की ऐतिहासिकता पर एक अलग कोण से विचार करना चाहिए। यानी प्रतीकात्मक इतिहास-बोध से, क्योंकि वह मिथकीयता से संपन्न एक महाकाव्य भी है। इसके सभी पात्र एक और चरित्र हैं तो दूसरी ओर प्रतीक। मानो सृष्टि-मंच पर एक विराट नाटक खेला जा रहा है जिसमें अनेक घात-प्रतिघात हैं। खुद काव्य भी नाटक खेल रहा है, अनेक रूप बदलकर । ऐसी स्थिति में हमें इसके भीतर अनेक पाठों की संभावना देखनी होगी। काव्य के साथ कथा, नाटय, इतिहास, संस्कृति, मानव-व्यवहार, कल्पना ओर फेंटैसी के ऐसे संयोजनों को स्थिति और मानव नियति की अन्तर्धारा के साथ पढ़ना होगा। यदि महाभारत में इतनी संभावनाएँ न होतीं तो वह स्रोत ग्रंथ नहीं हो सकता था, क्योंकि हर पहलू में अनेक स्तरः आयाम और पर्याप्त अवकाश नहीं होता-तब तक वह युग-युग से, अनेक मत-मतांतर के, मनःस्थिति और अभिरुचि के सर्जकों का उपजीव्य नहीं बनता। क्या यह विचित्र नहीं कि एक ऐसी कृति जो युद्ध का आख्यान है उसे अपना उपजीव्य एक जैन मुनि बनाता है और उसमें अपने मत के लिए अवकाश होते हुए भी अन्ततः युद्ध-विरोधी काव्य है।

महाभारत के पात्र जो भोग-भोग रहे हैं, उसके भीतर कथा से अधिक विचार और कर्म के भोग की विचित्र भागीदारी है। उदाहरण के लिए, भीष्म जैसे दृढ़ प्रतिज्ञ, आजीवन ब्रह्मचारी, महावीर को विडंबना यह है कि उसकी मृत्यु का कारण ‘शिखंडी’ -एक क्लीव-है। लेकिन आप उस अन्तःसूत्र को देखें जिसमें पिता के भोग के लिए भीष्म एक सुंदरी युवती उसे दे देता है। भोगने के लिए किसी को स्त्री अर्पित कर स्वंय भोग को त्यागना अपने-आप में एक विसंगति है। फिर यह ब्रह्मचारी अपने सौतेले भाइयों के लिए, स्वयंवर को आतुर कन्याओं का हरण करता है। पात्र के त्याग और वीरत्व को गरिमा प्रदान करते हुए भी कवि उसके इन कृत्यों को अक्षम्य मानता है, फलस्वरूप एक बहुत ही दारुण, विडंबनापूर्ण अन्त रचता है। अपहृत कन्याओं में से ही एक ‘शिखंडी’ के रूप में पुनर्जन्म लेती है। अपने कर्मों के लिए भीष्म को उसी से दंडित होना होता है। यह नियति और कर्म का एक अन्तःसूत्र है। अब कोई महाभारत-काल में ‘पुनर्जन्म’ की काल-गणना का विषय बना ले- तो कोई क्या करता है। सच तो यह है कि काव्य का प्रतीकात्मक और मिथकीकरण इतनी छूट की इज़ाज़त तो देता ही है।

महाभारत में अनेक पात्र और ढेरों कथाएँ हैं जो कर्मं और कर्मदंड, कर्म और नियति, कर्म और विवेक-अविवेक वगैरह से जुड़ी हैं। परन्तु एक काव्य-न्याय भी होता है: जो संसार के न्याय से अलग, रचनाकार के विवेक से संबोधित होता हैः जिसे वह कथा-रूप देता है। यही बात हम वासुदेव की व्याध के हाथों हत्या में देखते हैं। इसके सूत्र पूर्वजन्म और पूर्व कल्प तक जाते हैं। त्रेता में राम ने छिपकर बाली का वध किया था, जिसके लिए तुलसीदास का बाली कहता है- ’धर्म हेतु अवतेरहुं गुसाईं, मारेहु मोहि व्याध के नाईं।’ कदाचित यही बाली व्याध बनकर द्वापर में विष्णु (राम) के पुर्नअवतार वासुदेव की हत्या करता है। ज़ाहिर है ईश्वर भी कर्म-दंड से बच नहीं सकता। यह भारतीय कर्म-सिद्धार्थ है, परन्तु काव्य-न्याय भी है। यदि महाभारत का रचियता व्यास जैसा निस्पृह, साहसी, तपस्वी नहीं होता तो परात्पर वासुदेव के इस ‘अन्त’ को टाल देता, भले ही इससे एक सार्थक कथ्य की हत्या हो जाती। इस काव्य-न्याय और काव्यान्त ने न जाने कितने सर्जकों को उत्प्रेरित किया होगा।

महाभारत की उक्तियों, संवादों, घटनाओं, और लयात्मक अन्विति के भीतर कविता के उत्स देखे जा सकते हैं; परन्तु उसमें निहित फैंटेसी, मिथकीय-तत्व, युगंधरी रूपकात्मक विन्यास और जैसा ऊपर भी कहा गया है गीता की प्रस्तुत अत्यंत नाटकीय और काव्यात्मक है। कौरव-पांडवों की विशाल सेना के बीच रथ ले जाने का अर्जुन का आग्रह- "सेनायोरूभयोर्मध्ये रथ स्थापय मेच्युतं।" और कृष्ण का दोनों के बीच रथ ले जाकर अर्जुन के प्रश्नों के लंबा समाधान एक तरह से व्यापक संबोधन तो है ही- अत्यंत रोमांचक, भी है। उद्वेलित सेनाओं के बीच-जैसे दो उत्ताल समुद्रों के बीच-कोई दुःसाहसी रेखा खींचकर ज्ञान-चर्चा करें अथवा दो शत्रु सेनाओं के बीच ‘नोमेंसलैंड’ पर कर्म, ज्ञान, संन्यास जैसे निगूढ़ तत्त्वों की व्याख्या करें, यह अपने-आप मे एक फंतासी है, एक विचित्र और अद्वितीय करिश्मा, जो चमत्कृत, आकर्षित और स्तब्ध करता है।

महाभारत में विलक्षण बहुकोणीय पात्र-सृष्टि, रोचक आख्यानकता, नाटकीय स्थितियाँ, वृत्तकथन, मिथकीयता, फैंटेसी, अलंकृति और कहीं-कहीं सहज कला-यानी कुल मिलाकर विराट, बहुस्तरीय और चमत्कारी स्थापत्य हैः धर्म, नैतिकता, तत्त्व मीमांसा, लौकिक अनुशासनों की अभिव्यक्ति और व्यंजना हैः विरोध, विसंगति और विद्रूप के प्रति सहिष्णुता हैः ये चीजें सृजन को वस्तु और प्रेरणा देती हैं।

सन्दर्भ ग्रन्थ:-

  • ऽ महाभारत के महापुरुष: भरत सम्सकुर्ति

  •  महाभारत में विज्ञान दर्शन और समाज: राजकुमारी त्रिकहा

  • महाभारत: डॉ. बी. आर. किशोर

  • महाभारत: सुर्यकान्त त्रिपाठी निराला

  • महाभारत एवं श्रीमद् भगवत पुराण में श्री कृष्णा: सुमित्रा फोगट

’छोटे लाल गुप्ता,
शोध छात्र, हिंदी विभाग, जयप्रकाश विश्वविद्यालय,
छपरा (बिहार)
मो.नं.- 9085210732


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