अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
05.04.2017


हिन्दी साहित्य एवं विकलांग-विमर्श

यह अक्सर देखा गया है कि ईश्वर यदि किसी से कुछ छीनता है तो उसके बदले में कुछ "और" प्रदान कर देता है। जो व्यक्ति उस "और" की पहचान कर लेता है उसका जीवन सहज तथा सुगम हो जाता है। उसकी निःशक्तता सशक्तता में बदल जाती है। विकलांगता के शिकार देश-विदेश में महान दार्शनिकों, साहित्यकारों, कलाकारों, खिलाड़ियों ने ईश्वर प्रदत्त उस "और" के सहारे ही उत्कृष्टता प्राप्त की। इसमें उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति, जिजीविषा, आत्मविश्वास, जीवन-राग और अभ्यास का योगदान तो रहा ही है दूसरों का प्रोत्साहन और परामर्श भी शामिल रहा है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि प्रोत्साहनों और विमर्शों ने भी विकलांगों की दुनिया बदलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कभी लोगों ने निःशक्त जन में सशक्तता का उन्मेष दुलार, प्यार से समझा-बुझाकर किया है तो कभी उनके अंतःस्तल पर मर्मिक प्रहार करके। ज़ाहिर है, जब किसी के मर्म पर प्रहार होता है तब व्यक्ति अपने को सामर्थ्यवान बनाने के लिए हिम्मत जुटाता ही है। कभी-कभी तो वह महान उपलब्धियों का कारक बन जाता है। दिनकर के शब्दों में- "जब कभी अहं पर नियति चोट देती है, तब उससे कोई बड़ी चीज़ जन्म लेती है।" विकलांगों द्वारा किए गए आविष्कारों, महान कार्यों में इसके योगदान को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

दलित एवं स्त्री विमर्शों से दलितों और स्त्रियों की दशा में आमूल चूल परिवर्तन भले न हुआ हो लेकिन इनसे जो वातावरण बना है उससे उनकी स्थिति पहले की अपेक्षा काफ़ी बेहतर हुई है। उनके हित-साधन और हित-चिंतन से जुड़े विभिन्न वाद-विवाद-संवादों ने उनमें जो चेतना और जागरण-भाव भरा है उनसे उन्हें अपने "स्वत्व" को पहचानने में मदद मिली है। स्वाभिमान और अस्मिता के साथ जीने के कारकों के प्रति उनमें जागरूकता और प्रयत्नशीलता आई है। हीनता-बोध के स्थान पर समानता-बोध जागृत हुआ है। उपेक्षा और तिरस्कार से लड़ने की ताक़त पैदा हुई है। दूसरों की दया और परावलंबन में जीने की विवशता से काफ़ी हद तक मुक्ति मिली है। अतः यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि देर से ही सही, इन दोनों विमर्शों ने सदियों से उपेक्षित, तिरस्कृत, प्रताड़ित और अपमानित दलित तथा स्त्री वर्ग के पक्ष में वातावरण बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई है, दलितों और स्त्रियों के अभ्युत्थान में सराहनीय कार्य किया है। अतः समाज का ऐसा वर्ग जो दूसरों की दया पर जीने तथा "बेचारा" कहलाने का दंश झेलने के लिए विवश है, उसे प्रेरित-प्रोत्साहित कर सशक्त बनाने की दिशा में विकलांग-विमर्श एक सार्थक पहल है।

शारीरिक अथवा मानसिक अक्षमता विकलांगता है। यह व्यक्ति के मन में निराशा उत्पन्न करती है, हीनता की भावना भरती है। फलतः व्यक्ति अकर्मण्य एवं आलसी हो जाता है, अपने को धरती का बोझ समझता है। वह ईश्वर एवं स्वयं को कोसता फिरता है, लेकिन यदि उसे उपयुक्त वातावरण एवं सम्यक् प्रेरणा-प्रोत्साहन मिले तो वह उपलब्धियों के शिखर पर आसीन हो सकता है, क्योंकि यह अक्सर देखा गया है कि एक अंग यदि निःशक्त होता है तो दूसरा अधिक सशक्त होता है, ज़रूरत इस बात की होती है कि उस दूसरे अंग को अधिक सचेष्ट, क्रियाशील एवं कार्य-कौशल संपन्न बनाया जाए। दीर्घतमा, अष्टावक्र, शुक्राचार्य, जायसी, सूरदास, राणा सांगा, रणजीतसिंह, विनोद कुमार मिश्र, रवींद्र जैन, सुधाचंद्रन, राजेन्द्र यादव, वल्लतोल, प्रभा साह, अंजली अरोड़ा, रितु रावल, बाबा आम्टे, होमर, मिल्टन, बायरन, वाल्टर, स्काट, मार्सेल प्राउस्ट, हेलेन केलर, थामस अल्वा एडीसन, लुईबेल, स्टीफन हाकिंग्स, लारा ब्रिजमैन, फ्रेंकलीन डिलानों रूज़वेल्ट आदि ने विकलांगता के बावजूद जो उपलब्धियाँ अर्जित कीं हैं, उसकी चकाचौंध से सारा संसार जगमग है। यह इसीलिए संभव हो सका कि उन्होंने अपनी भीतरी शक्ति को पहचाना और उसे सचेष्ट तथा क्रियाशील बनाया। महाकवि सूरदास को यदि वल्लभाचार्य ने यह नहीं कहा होता, "सूर हो के काहे घिघियात हौ, कुछ भगवान भजन कर" तो शायद वे सूरसागर के रचयिता नहीं बने होते। जायसी एक नयन वाले "एक नयन कवि मुहम्मद गुनी" तथा कुरूप थे। उनकी कुरूपता पर जब शेरशाह सूरी हँस पड़ा तब वह भीतरी प्रेरणा ही थी जिसके बल पर मलिक मुहम्मद जायसी ने कहा, "मोहि का हँससि कि कोहरहि?" (तू मेरे ऊपर हँसा था या उस कुम्हार (ईश्वर) पर, तब शेरशाह को लज्जित होकर माफ़ी माँगनी पड़ी। जायसी ने अपनी विकलांगता को कोसने के बजाए उसे महिमा मंडित ही किया है-

 एक नयन कवि मुहम्मद गुनी
सोई बिमोह जेहि कवि सुनी
चाँद जैसे जग विधि औतारा
दीन्ह कलंक कीन्ह उजियारा
जग सूझा एकै नयनाहाँ
उआ सूक जब नखतन्ह माहाँ
जौ लगि अंबहि डाभ न होई
तौ लहि सुगंध बसाइ न सोई
किन्ह समुद्र पानि जो खरा
तौ अति भयउ असूझ अपारा।

जायसी की उपर्युक्त गर्वोक्ति विकलांगता पर पुरुषार्थ की जीत का परिणाम है। ऐसी ही जीत अर्जित की थी प्राचीन काल के हाथ, पैर, कमर, कोहनी, कलाई, उँगली आदि शरीर के अष्ट अंगों से वक्र ऋषि अष्टावक्र ने। उन्होंने नैराश्य एवं हीन भावना को त्यागकर अपने ज्ञान के समक्ष भौतिक देह के सौंदर्य को जिस प्रकार अर्थहीन कर दिया, वह कुरूपता पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है। "आत्मानं विद्धि" की प्रतिष्ठा करने वाले अष्टावक्र की ज्ञान गरिमा के आगे महाज्ञानी, विदेह पुरुष जनक को भी नतमस्तक होना पड़ा था। यह इसलिए संभव हो सका कि अष्टावक्र ने विकलांग को अभिशाप न मानकर अपने "स्व" का अत्यधिक विस्तार किया। आत्मविश्वास से पूर्ण व्यक्ति जब भी अपनी विकलांगता को भूलकर कुछ महान उपलब्धियों की ओर अग्रसर होता है तब उसे सफलता मिलती ही है। कवि गिरीश पंकज यही भाव इन शब्दों में प्रकट करते हैं-

ज़िन्दगी की हर कमी जो भूल जाता है,
बस वही उपलब्धियों के फूल पाता है।
आदमी सच्चा वही जो हर मुसीबत में,
हौसला रखता सदा ही मुस्कुराता है।
क्या हुआ जो आँख से वह देख न पाता,
दिव्य-दृष्टि से नज़र सब उसको आता है।
हाथ से लाचार है जो पैर से कमज़ोर,
दौड़ जीवन की मगर वह जीत जाता है।
बोल न पाए जो सुन भी ना पाए,
ध्यान से सुनना वह अक्सर गुनगुनाता है।

हमारा वर्तमान समय यदि एक और विसंगतियों और विडंबनाओं से भरा है तो दूसरी ओर अनेक वैज्ञानिक आविष्कारों/अनुसंधानों एवं तकनीकी कौशलों तथा महान उपलब्धियों से संपन्न है। यह वह समय है जब विकलांगता को मात देने के लिए हमारे पास अच्छे उपचार, उपकरण एवं संसाधनों की भरमार है। इसके साथ ही रोज़गार के अनेक अवसर है। तब फिर विकलांगों का जीवन एक अभिशाप क्यों हो? क्या हम उनको स्वस्थ एवं आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में निरन्तर आगे नहीं बढ़ सकते? क्या हमारा समय और सरकारें केवल काग़ज़ी योजनाएँ न बनाकर उन्हें एक समुन्नत जीवन जीने के लिए अवसर प्रदान नहीं कर सकतीं? प्रश्न तो अनेक हैं किन्तु केवल प्रश्न करते रहने का समय नहीं है। आज आवश्यकता इस बात की है कि विकलांगों को सम्यक् शिक्षा और रोज़गार की सही दिशा बताई जाए। इस धारणा को पुष्ट किया जाए कि विकलांग वर्ग समाज पर अनावश्यक बोझ नहीं बल्कि समाज का एक कमज़ोर हिस्सा है, जिसे मज़बूत और सशक्त बनाना बहुत ज़रूरी है।

विकलांगों को नव जीवन देने एवं समाज की मुख्यधारा में शामिल कर उन्हें प्रगतिगामी बनाने में विकलांग-विमर्श की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो सकती है। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि भारत में विकलांग-विमर्श की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। ऋग्वेद के एक सूक्त में अपंगों, अंधों, लूले-लंगड़ों, बहरों आदि के साथ दया एवं सहृदयता पूर्व व्यवहार करने, उन्हें शिक्षित एवं पुरुषार्थी बनाने का परामर्श है। विकलांगों को शिक्षित एवं पुरुषार्थी भले नहीं बनाया जा सका किन्तु उन्हें दया या पात्र ज़रूर बना दिया गया उसके और बाद में विकलांग वर्ग धार्मिक एवं समाजसेवी जनता के प्रश्रय में रहने के लिए विवश हुआ। तीर्थों, धार्मिक, मेलों एवं वैवाहिक समारोहों में उसकी उपस्थिति इसलिए बढ़ने लगी क्योंकि वहाँ दया अथवा दुत्कार के साथ भोजन सहज प्राप्त था। ज़ाहिर है "अजगर करै न चाकरी" जैसी मान्यता वाले इस देश में यदि भोजन मिलता रहे तो व्यक्ति सचेष्ट एवं क्रियाशील क्यों होगा? विकलांग बेचारे तो शारीरिक एवं मानसिक रूप में अक्षम ही है, वे भला क्यों आत्मनिर्भर बनने की दिशा में प्रयत्नशील होते? इसका परिणाम यह हुआ कि जहाँ एक ओर उनमें निष्क्रियता जनित हीनता बोध एवं पलायनवादी मनोवृत्ति विकसित हुई, वहीं दूसरी ओर जिन्होंने विकलांगता को पराजित कर कुछ करने का साहस एवं संकल्प दिखाया उनके कार्यों में कालजयता का समावेश हुआ। वे अथर्ववेद के ऋषि अथर्वण के इस कथन- "हे मनुष्य! तू अपनी वर्तमान अवस्था से ही संतुष्ट मत रह। आगे बढ़! शरीर, बुद्धि एवं आत्मबल द्वारा पुरुषार्थ संपन्न कर।" वे सच्चे अनुयायी साबित हुए। दीर्घतमा, अष्टावक्र, जायसी, सूर आदि इसके उदाहरण हैं।

कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धान्त ने दलितों, स्त्रियों और विकलांगों के मन में हीन भावना भरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने अपनी वर्तमान अवस्था को "पूर्वजन्म का कर्म" मानकर अथवा "भाग्य का खेल" समझकर संतोष के घेरे में अपने को क़ैद कर लिया था, किन्तु अब स्थितियाँ बदली हैं। दलितों और स्त्रियों ने अपने-अपने अधिकारों के प्रति आवाज उठाई है। उन्होंने प्राचीन अवधारणाओं का चक्रव्यूह भेद डाला है। जीर्ण-शीर्ण मान्यताओं को विपथगामी करार किया है। आज विकलांग वर्ग भी कसमसा रहा है। वह अपने "स्वत्व" की प्रप्ति के लिए उठने की तैयारी में है। कवि डॉ. इंद्रबहादुर सिंह को यह विश्वास है कि एक न एक दिन ये विकलांग जगेंगे और अपना हक़ प्राप्त करेंगे-

ये कसमसाते जन
एक दिन
अपनी जगह
लेकर रहेंगे
हौसला इनका है बुलंद
रुक नहीं सकता
मात्र डेढ़ गज ज़मीन पर
कभी भी, नहीं रुकेंगे पैर
रोना, गिड़गिड़ना और
आँसू बहाना, बीते दिनों की बात
बढ़ चले इनके क़दम
तोड़कर पुरानी धारणाएँ
नई राह बनाएँगे
रेत के विशाल मरू-भूमि में
प्यार क सागर बहाएँगे
नए वन-उपवन लगाएँगे
विकलांगों की वेदना का
सहज में, ढूँढ लेंगे हल
एक दिन
ये कसमसाते जन।

विकलांगों का हित-चिंतन करने वालों की आज कमी नहीं है। अनेक संस्थाएँ और व्यक्ति इस दिशा में क्रियाशील हैं। रचनाकार भी विकलांगों के कल्याण-महायज्ञ में अपने ढंग से सुविधाएँ देने का कार्य कर रहे हैं। कविता, कहानी, लघुकथा आदि के माध्यम से वे विकलांगों के अभ्युत्थान हेतु सार्थक विमर्श की ओर गतिशील है। इसमें केवल सकलांग ही नहीं, विकलांग भी सक्रिय हैं। लघुकथाएँ केवल स्वाभिमान ही नहीं जगाती बल्कि उत्साह, प्रेरणा तथा जिजीविषा प्रदान करते हुए उन्नति का पथ भी प्रशस्त करती है। इस तरह यह लघु कथा संग्रह विकलांगों के लिए प्रेरणा-स्त्रोत है। इसकी कथाएँ चिंतन का नया आयाम देती हैं। साहसिक कदम शीर्षक लघुकथा में डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्र ने एक योग्य और स्वस्थ लड़की द्वारा एक लेक्चर किन्तु अंधे सदानंद का वरण करवाकर एक नया दृष्टिकोण उपस्थित किया है। शैलेशदत्त मिश्र ने "आरक्षण" शीर्षक लघु कथा में विकलांगों के आरक्षण की पोल खोली है। इस प्रकार यह संग्रह विकलांग-चेतना की कविताएँ अपना दिनमान में संगृहित हैं। यह काव्य संग्रह विकलांगों के मन में निराशा के स्थान पर आशा, वैराग्य के स्थान पर जीवन-राग, परावलंबन के स्थान पर स्वावलंबन का भाव जगाने वाला है। अपनी सारी शक्तियों को समेटकर जीवन के रण-क्षेत्र में सन्नद्ध होने की शिक्षा देने वाला है। सांत्वना शीर्षक कविता में डॉ. सिंह लिखते हैं-

विकलांग
जिनके पास सिर्फ उनकी विकलांगता है
और कुछ नहीं
गरीब
जिनके पास सिर्फ उनकी गरीबी है
और कुछ नहीं
मरने वाले
जो सिर्फ अपने छोर तक गिन सकते हैं
और कुछ नहीं
कमज़ोर
जिनके पास सिर्फ कमजोरी है और कुछ नहीं
वे
शिक्षा, संगठन, संघर्ष और
अपनी जिजीविषा से
समुद्र के पानी पर
चल सकते हैं।

ज़ाहिर है- शिक्षा संगठन, संघर्ष और जिजीविषा केवल विकलांग ही नहीं बल्कि हर हारे-थके हुए मनुष्य को उन्नतिगामी बनाने में मददगार हैं। इस दृष्टि से डॉ. सिंह केवल विकलांग-विमर्श का ही नहीं बल्कि संपूर्ण मानव जाति के हित चिंतक हैं।

आज विकलांग-विमर्श समय की माँग है। कुछ समय पहले तक हिन्दी साहित्य में विकलांग-विमर्श जैसा कोई विमर्श भले ही नहीं था, किन्तु रचनाकारों ने विकलांगों के प्रति दया, सहानुभूति, स्नेह, सद्भाव दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यथा प्रसंग उन्होंने करुणोद्रेक किया था। विकलांगों की विवशता, असमर्थता, समाज में उनकी अवस्था का उल्लेख कर सुधार की आकांक्षा प्रकट की हैं। निराला की रानी और कानी शीर्षक कविता "कानी" की व्यथा-कथा उभारकर करुणाधारा में अववाहन के लिए विवश करती है-

माँ उसको कहती है रानी
आदर से, जैसा है नाम
लेकिन उसका उल्टा रूप
चेचक के दाग, काली, नकचिपटी
गंजा सिर, एक आँख कानी।
औरत की जात रानी, ब्याह भला कैसे हो
कानी जो है वह
सुनकर कानी का दिल हिल गया
काँपे कुछ अंग, दाई आँख से
आँसू भी बह चले माँ के दुख से
लेकिन वह बाँई आँख कानी
ज्यों की त्यों रह गई रखती निगरानी।

अद्यतन रचनाकरों का एक वर्ग ऐसा है जो विकलांगों के प्रति केवल दया और सहानुभूति दिखाने में विश्वास नहीं करता बल्कि उनके दुखद पक्ष को दूर करने के लिए समाज और सरकार से सरोकार की अपेक्षा रखता है- डॉ. जयप्रकाश नारायण सिंह लिखते हैं-

रे! दूर करो संस्कृति
नवीन के दुःखद पक्ष
मानव समाज की छाती पर
जो रेंग रहे बन यक्ष प्रश्न
करो उनके सपने साकार
बनो जीवन-नैया के पतवार ।

डॉ. इंद्रबहादुर सिंह "शब्द" की ताक़त का एहसास कराते हुए लिखते हैं-

शब्द जो अँधेरे का वक्ष चीर सकते थे
शब्द, जो बड़ी से बड़ी लड़ाई जीत सकते थे।
शब्द जो बन सकते थे। एक तेज़ तर्रार कविता
कविता जो दे सकती थी हमें
चट्टान की दृढ़ता
पर यह सब कुछ नहीं हुआ
ज़िन्दगी बनी रही विकलांग।

कवि "शब्दों" में विकलांग-चेतना भरने का संकल्प प्रकट करता है । यह भावना जिस दिन यथार्थ की धरती पर उतरेगी, वह दिन निश्चित रूप से निःशक्त जन की सशक्तता की दिशा में एक सार्थक क़दम होगा।

डॉ. छोटे लाल गुप्ता
भारतीय वायुसेना (कार्यरत तकनिकी विभाग
तेजपुर (असाम),
मो.-9085210732


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें