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01.16.2009
 

एक भ्रमर की यात्रा 
चतुरानन झा ’मनोज’


श्रावण का महीना चल रहा था
पर,
पेड़ ठूँठ से खड़े थे
कुछ नव किसलय जो
उगे थे चंद पेड़ों पर
शुककीट उन किसलयों को
चट करने में रत थे
उदित हुआ था सूर्य अभी-अभी।

एक भ्रमर जगा नींद से
काला...
कोयले से भी ज्यादा
उड़ा, पहुँचा एक बगीचे में
तितलियों औ' मधुमक्खियों ने
पहले ही से
डाल रखा था डेरा उस बगीचे में
पर...
..................
यह क्या ????

हर पौधा तो हरा- भरा था
किंतु मधुविहीन हो चले थे पुष्प।
न मिल पा रहा था
एक भी सुमन
कि वे अपनी तृषा मिटा सकें।
प्रतिद्वंद्विता मची थी फिर भी
तितलियों औ' मधुमक्खियों में
लेह रहे थे ओस.......
देखकर मन क्षुब्ध हो गया भ्रमर का
उड़ चला वह
इस बाग़ से उस बाग़
हर बाग़ की थी यही कहानी
न था कहीं मधु उच्छवसित
थक गया वह उड़ते उड़ते
पर रुका नहीं वह
रुकता तो शायद मर जाता
अपनी ही भूख चबाकर खाता।

सोचा, मिलता चलूँ कमलिनी से
वह तो ज़रूर बाँटेगी उसका दुःख।
गया कमलिनी के पास
पर...
कमलिनी ने उसकी और देखा तक नहीं।
उसने देखा
शतदलों में उसकी कोई और ही
पनाह पा रहा था
उन दलपुंजों के बीच स्थित
अंडकोष पर अपना मधु लुटा रहा था।

खिन्न हो गया जी उसका
हो गया निराश
कुछ न बोला, कुछ न बोला
कुछ न बोला अपनी धुन में बस यही गाता रहा
ये कौन सा रिश्ता है?

उड़ चला वह वहाँ से भी
मधु की तलाश में
उड़ता ही रहा
सचमुच जवाब दे दिया था
उसके पंखों ने
तलमलाकर गिर पड़ा
एक सड़क के किनारे-
दम घुट रहा था उसका
धुएँ से, शोर से, प्रदूषण से।

वह षट्पद अपने नन्हें पैरों से
रेंगने लगा
जा पहुँचा पास ही बहती नाली के समीप
नाली के ही नर्दम जल से पोषण पा
जी रहा था एक पौधा भी वहीं
एक पुष्प भी खिला हुआ था
उस पौधे पर
पौधे की कमज़ोर तने से ऊपर वह लगा रेंगने
जा पहुँचा उस पुष्प तक
उस अधोमुखी मृतप्राय फूल
को लगा चूसने वह भ्रमर
कि शायद मधु मिल जाए

मैंने देखा-
पास ही पत्थर तोड़ती मजदूरनी
के झूले हुए स्तन से
कुपोषण का शिकार एक शिशु
चूस रहा था प्राण।
मैंने देखा-
पश्चिम दिशा में सूर्य ने
मूँद ली अपनी आँखें
और अस्त हुआ

छाने लगा अँधेरा।


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