अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
02.09.2008
 
हम खिलौनों की ख़ातिर तरसते रहे
चाँद  शुक्ला ’हदियाबादी’

हम खिलौनों की ख़ातिर तरसते रहे
चुटकिओं से ही अक्सर बहलते रहे

चार सू थी हमारे बस आलूदगी
अपने आँगन में गुन्चे लहकते रहे

कितना खौफ़ आज़मा था ज़माने का डर
उनसे अक्सर ही छुप छुप के मिलते रहे

ख़्वाहीशें थीं अधूरी न पूरी हुईं
चंद अरमां थे दिल मैं मचलते रहे

उनकी जुल्फें परीशां जो देखा किये
कुछ भी कर न सके हाथ मलते रहे

चाँद न जाने कैसे कहाँ खो गया
चाँदनी को ही बस हम तरसते रहे

अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें