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| 10.13.2007 |
| अम्बर धरती उपर नीचे आग बरसती तकता हूँ चाँद शुक्ला ’हदियाबादी’ |
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अम्बर धरती उपर नीचे आग बरसती तकता हूँ
सोच रहें हैं दुनिया वाले फिर भी कैसे जिंदा हूँ मैंने खुशियाँ बेच के सारी दर्द ख़रीदे हैं यारो अपनी इस दौलत के सदके मैं पहचाना जाता हूँ मेरे जैसा जिंदादिल भी होगा कौन ज़माने में ख़ुद को दिल का रोग लगा के हरदम हँसता रहता हूँ जिन से मट्टी का रिश्ता है क्यो वोह धूल उड़ाते हैं जो हैं मेरी जान के दुश्मन में तो उनका अपना हूँ जब से मौत करीब से देखी है मैंने इन आँखों से चाप किसी के क़दमों की मैं हर दम सुनता रहता हूँ एक बुलबुला हूँ पानी का और मेरी औकात है क्या जानता हूँ मैं वक्त के हाथों एक बेजान खिलौना हूँ जिसने गहरे अंधिआरे के आगे सीना ताना है मैं अँधेरी रात मैं रोशान तन्हा "चाँद" का टुकड़ा हूँ |
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