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10.25.2007
 
वक्‍़त भी कैसी पहेली दे गया
चाँद शेरी

 वक्‍़त भी कैसी पहेली दे गया
उलझने सौ जाँ अकेली दे गया।

ब्याह बेटी का रचना था हमें
कर्ज़ की ख़ातिर हवेली दे गया।

पढ़ के रेखाएँ वो मेरे हाथ की
और भी खाली हथेली दे गया।

चल दिया वो कह के कड़वी बात यूँ
जैसे मुझ को गुड़ की भेली दे गया।

ख़ार क्यूँ बोते हो उसकी राह में
जो तुम्हें बेला चमेली दे गया।

और करता लालची ससुराल क्या
आग में दुल्हन नवेली दे गया।

ग़मग़लत करने को वो ’शेरी’ मुझे
शायरी जैसी सहेली दे गया

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