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10.13.2007
 
महादेवी वर्मा और रेखाचित्र - गौरा और सोना के संदर्भ मे
सी.आर. राजश्री

भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, शुक्ल युग, और आधुनिक युग की सीमाओं को पार कर गतिशीलता की ओर अग्रसर होता हुआ आज भी प्रवाहमान है। विषय की अनेकरूपता, न्यूनता के साथ विभिन्न शैलियों को अपनाता हुआ हिन्दी निबंध निरंतर लोकप्रियता पाता जा रहा है। निबंध लेखन में कई संभावनाएँ और दिशाएँ विद्यमान हैं।

निबंध कई प्रकार के हैं जैसे :

Ø  विषयनिष्ठ

Ø  व्यक्तिव्यंजक

Ø  विचारात्मक

Ø  भावात्मक

Ø  साहित्यिक

Ø  सामाजिक

Ø  समीक्षात्मक

Ø  हास्यव्यंग्यात्मक

आज सामान्य जन की रुचि भी निबंध के प्रति बढ़ रही है क्यों कि जीवन के विविध आयामों को प्रकट करने में निबंध पूरी तरह सक्षम है।

नई विधा के रूप में रेखाचित्रः

निबंध के कई विधाओं में रेखाचित्र एक नवीन विधा है। अपनी व्यापक संवेदनशीलता और सुन्दर कलात्मक शैली के कारण आज हिन्दी की समस्त आधुनिक गद्य विधाओं में रेखा चित्र ने अपना एक निश्चित स्थान बना लिया है।गद्य रचना के एक आधुनिकतम रूप में प्रतिष्ठित होने के बावजूद प्रचीन ग्रंथों में जो शब्द चित्र प्रयुक्त हुए हैं, उनमें रेखा चित्र के तत्व कई बार साफ-साफ दिखाई पड़ते हैं।

रेखाचित्र क्या है :

रेखाचित्र शब्द चित्रकला के क्षेत्र से आया है। चित्रकला के क्षेत्र में रेखाओं का बड़ा महत्व होता है। कलाकार के भावों की अभिव्यक्ति रेखाओं के माध्यम से ही होती है। इस प्रकार विभिन्न रेखाओं के माध्यम से बनाया गया चित्र ही रेखाचित्र है। साहित्य के क्षेत्र में चित्र के स्थान पर शब्द चित्र होते हैं और ये शब्द चित्रों का निर्माण कर उन्हें रेखाचित्र का स्वरूप देने वाले तत्व के रूप में रेखाओं के स्थान पर शब्द होते हैं। शब्दों की रेखाओं द्वारा किसी भी व्यक्ति, व्यक्तित्व, वस्तु, घटना, तत्व या अनुभूति का जो चित्रण होता है वही रेखाचित्र है। यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि शब्द रेखाओं की अपेक्षा कहीं ज्यादा सामर्थ्यवान होता है। रेखाचित्र कभी काल्पनिक नहीं हो सकता।

रेखाचित्र के विषय में विभिन्न परिभाषा :

रेखाचित्र के विषय में विभिन्न साहित्यकारों ने अपने-अपने अंदाज में परिभाषाएँ दी है :

v  महादेवी वर्मा ने रेखाचित्र के विषय में लिखा है- चित्रकार अपने सामने रखी वस्तु या व्यक्ति या रंगीन चित्र जब कुछ रेखाओं के इस प्रकार आंक देता है कि उसकी मुद्रा पहचानी जा सके तब उसे हम रेखाचित्र की संज्ञा देते है। साहित्य में भी साहित्यकार कुछ शब्दों में ऐसा चित्र अंकित कर देता है जो उस व्यक्ति या वस्तु का परिचय दे सके, परन्तु दानों में अन्तर होता है।

v  डॉ. हरबंश लाल का विचार है कि रेखाचित्र किसी एक व्यक्ति, स्थान, घटना, दृश्य, या उपादान का ऐसा वस्तुगत वर्णन होता है, जो संक्षेप में उसकी बाह्य विशेषताओं को प्रस्तुत करता है। बाह्य विशेषताओं के भीतर ही उसकी आंतरिक विशेषताओं का समाहार होता है।

v  डॉ. नागेन्द्र का विचार है कि रेखाचित्र ऐसी रचना के लिए प्रयुक्त होने लगा जिसमें रेखाएँ हों, पर मूर्त रूप अर्थात् उतार-चढ़ाव दूसरे शब्दों में, कथानक का उतार-चढ़ाव आदि न हो, तथ्य का उद्‍घाटन मात्र हो।

v  डॉ. गोविन्द त्रिगुणायत का विचार है कि रेखाचित्र चित्रकला और साहित्य के सुन्दर सुहाग से उद्‍भूत एक अभिनव कला रूप है। रेखाचित्रकार साहित्यकार के साथ ही साथ चित्रकार भी होता है। रेखाचित्रकार मनः पटल पर विश्रृंखल रूप में बिखरी हुई शत्-शत् स्मृति रेखाओं में अपनी अंकित कला की तूलिका से सहानुभूति के रंग में रंजित कर जीते जागते शब्द चित्र में परिणित कर देता है।

रेखाचित्र के तत्व :

रेखाचित्र के छः तत्व होते हैं -

Ø  व्यक्ति चित्रण

Ø  संवेदनशीलता

Ø  संतुलन एवं तटस्थता

Ø  सूक्ष्म निरीक्षण

Ø  यर्थात की अनुभूति

Ø  उद्देश्य

रेखाचित्र के वर्ग :

विषय के आधार पर रेखाचित्र के निम्न वर्ग होते है -

Ø  मनोवैज्ञानिक रेखाचित्र

Ø  ऐतिहासिक रेखाचित्र

Ø  तथ्य एवं घटना प्रधान रेखाचित्र

Ø  वातावरण प्रधान रेखाचित्र

Ø  प्रभाववादी रेखाचित्र

Ø  व्यंग्य प्रधान रेखाचित्र

Ø  व्यक्ति प्रधान रेखाचित्र

Ø  आत्मपरक रेखाचित्र

हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध रेखाचित्रकार :

हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध रेखाचित्रकारों में महादेवी वर्मा, श्रीराम शर्मा, बनारसीदास चतुर्वेदी, सामवृक्ष बेनीपुरी, वृंदावनलाल वर्मा, प्रकाशचंद्र गुप्त, कन्हैयालाल मिश्र, नारायण टंडन, जयनाथ नलिन, बेढब बनारसी, अमृतलाल नागर, देवराज दिनेश, मोहनलाल गुप्ता, सत्यवती मलिक, जगदीशचंद्र माथुर, भगवतीचरण वर्मा आदि नाम उल्लेखनीय है।

महादेवी वर्मा एक सफल रेखाचित्रकार, कवयित्री, और विचारक है। उन्होंने कई रेखाचित्र लिखें हैं जिनमें नीलकंठ मोर, घीसा, सोना, गौरा आदि काफी प्रसिद्ध है। मानव एक श्रेष्ठ प्राणी होने पर भी पशुओं के प्रति उसका व्यवहार सराहनीय नहीं हैं। उनके द्वारा रचित सोना और गौरा नामक रेखाचित्र में मानव के निष्ठुर व्यवहार पर उन्होंने प्रकाश डाला हैं। पशु-पक्षी भी प्रेम के लिए लालियत रहते हैं और प्रेम दिखाने पर आनंदविभोर हो उठते हैं। बेजुबान होने पर भी स्नेह के कई मूक प्रर्दशन होते है। अपने अीम आनंद की अभिव्यक्ति सुंदर आँखों के भाव से प्रकट करते हैं। परन्तु मानव अपने स्वार्थ के कारण इन बेजुबान जानवरों पर इतना अत्याचार और निर्दय व्यवहार करता है और उनपर कितना जुल्म करता है इसका कोई अंत नहीं। मानव द्वारा इतनी यातना सह कर भी पशु मानव के स्वभाव से अब तक अनजाना है। मानव का यह स्वार्थ अंत में वेदना का कार्य और कारण बन जाता है, इसी बात पर प्रकाश डालना ही महादेवी वर्मी का मुख्य ध्येय है। आइए अब गौरा और सोना का अलग-अलगरूप से इस संदर्भ में विशेष अध्ययन करें।

गौरा

गाय खरीदने का निर्णय : पहले से ही महादेवी जी को पशु-पक्षी प्रिय थे। फिर अपनी बहन श्यामा की बातों से वशीभूत होकर महादेवी जी गाय पालने का निर्णय लेती है। गौरा को ध्यानपूर्वक देखने पर उसके सौन्दर्य से वे बहुत प्रभावित हुई।

गाय का सौन्दर्य : गाय मानो इटालियन मार्बिल से तराशा हुआ-सा और उसका हर अंग मानो साँचें में ढला हुआ लग रहा था।

गाय का स्वागत एवं नामकरण : गाय को लाल सफेद गुलाबों की माला पहनाकर, केसर रोली का टीका लगाकर, घी के चौमुखी दिये से आरती उतारकर, दही व पेडे खिलाकर उसका धूम-धाम से स्वागत किया गया, फिर उसका नामकरण हुआ- गौरागिंनी और गौरा कह कर पुकारने का निश्चय हुआ। उसके आँखों में एक विशेष चमक थी जिसमें आत्मीय विश्वास छलकती थी।

गौरा का स्वभाव : कुछ ही दिनों में वह सबसे हिल-मिल गई। अन्य जानवर अपनी लघुता और उसकी विशालता का अंतर भूल गए थे। वह सबको अपनी आवाज से पहचान लेती थी। महादेवी जी के कंधे पर वह अपना सिर बड़े ही प्यार से रखती थी और उनके दूर जाने पर गौरा अपना गर्दन घुमा-घुमा कर देखती रहती थी।

लालमणि का जन्म और दुग्ध महोत्सव : थोड़े ही दिनों में गौरा ने सुन्दर पुष्ट वत्स को जन्म दिया। लाल रंग के गेरु का पुतला लगने के कारण उसका नाम लालमणि रखा गया। लालमणि के जन्म के बाद मानो दुग्ध महोत्सव आरंभ हो गया। गौरा प्रतिदिन बारह सेर दूध देने लगी और लालमणि, अन्य जानवरों को बहुत सारा दूध छोड़कर आस-पास के बाल गोपालों को भी पर्याप्त दूध नसीब हुआ।

दूध दुहने की समस्या : दूध दुहने की प्रधान समस्या सामने आई क्यों कि शहर में नौकरी की वजह से लोग दूध दुहना नहीं जानते और जो गाँव से आए थे, वे अनाभ्यास की वजह से देर लगा देते थे। अतः गौरा के आने से पहले जो ग्वाला उन्हें दूध देता था उसने दूध दुहने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली।

ग्वाले का कुकर्म : कुछ दिनों के बाद गौरा प्रायः अस्वस्थ रहने लगी। चिकित्सकों ने गौरा की जाँच करके वह बात बताई जिसको सहन करना बिल्कुल असंभव था। कुछ ग्वाले अपने स्वार्थ केलिए गाय को गुड़ में सुई रखकर खिला देते है, फिर जब उस गाय कि असामयिक मृत्यु हो जाती है, वे पुनः उन घरों में फिर से दूध देने लगते हैं। जब ग्वाले ने सुई की बात सुनी तो वह जैसे अंतर्धान हो गया जिससे यह स्पष्ट और विश्वास हो गया कि उसी ने गौरा को सुई खिलाई है। 

गौरा का मुत्यु से संघर्ष : अब गौरा का मुत्यु से संघर्ष शुरु हो गया। उस पर सारे इलाज बेअसर रहे। वह तो जैसे मानो खड़े भी नहीं हो पाती थी। दूध देना उसने बिलकुल बंद कर दिया। लालमणि को किसी दूसरे गाय का दूध दिया जाता था, पर उसे वह दूध रुचता नहीं था और वह अपने माँ के पास जाकर दूध के लिए खड़े हो जाता था। वह बेचारा तो अपनी माँ की बीमारी से अनजान था। गौरा की हालत अब दिन-ब-दिन बिगड़ती गई और महादेवी जी का मन भारी रहने लगता। अब वे गौरा के अंतिम समय में उसके पास ही रहना चाहती थी। एक दिन जब सुबह के चार बजे महादेवी जी गौरा से मिलने आई तो हमेशा की तरह उसने अपना सिर स्नेह से महादेवी जी के कंधा पर रखा  और निश्चेष्ट हो गई। संभवतः सुई हृदय में चुब गई होगी। उन्होंने व्यथित मन से गौरा के पार्थिव शरीर को गंगा में प्रवाहित किया और मानव के क्रूर व्यवहार से कुंठित होकर दिल में सोचा - आह मेरे गोपालक देश।

सोना

हिरण शावक का मानवीय परिवेश में प्रवेश : महादेवी जी कि किसी परिचिता ने जब हिरण पालने का अनुरोध किया तो वे टाल नहीं सकी। सोना की स्मृति उन्हें अचानक आ गया क्यों कि वह भी इसी तरह शैशावस्था में आयी थी। मानव की मनोरंजक प्रवृत्ति के कारण वह बेजुबान जानवरों का शिकार करता है। मनुष्य के इस विचित्र व्यवहार पर महादेवी जी अपना आश्चर्य प्रकट करती है। ऐसे ही किसी शिकारी के कारण सोना महादेवी जी के पास आई।

हिरण शावक को बचाने का अनुष्टान : सद्य प्रसूता हिरण को मारकर उसके शावक को उठा कर लाया गया। पर यह बात स्पष्ट नहीं है कि वह दया का भाव था या कौतुकप्रियता। दो-तीन दिन तो उनमें से किसी सहृदय गृहणी और बच्चों ने उसे पानी मिला दूध पिला कर जीवित रखा। फिर बाद में किसी बालिका को महादेवी जी का स्मरण आया और वह उस शावक को मुमूर्षु अवस्था में दे गई। शावक अवांछित होने और उसके बचने कि कम उम्मीद हाने के बावजूद उसे पालने का कठिन प्रयास शुरू हुआ। महादेवी जी की कुशलता, विशेष सावधानी और सब के सहयोग के कारण उसे बचाया गया।

हिरण शावक का सौन्दर्य और नामकरण : उसका मुँह बहुत ही छोटा था। उसकी पानीदार आँखें में विचित्र सुंदरता थी। लंबे कान, पतली सुडौल टाँगों से युक्त उसका सरल शिशु रूप से सब प्रभावित हुए। सुनहरे रंग के रेशमी लच्छों की गाँठ के सामान उसका लघु शरीर था और इसी कारण उसका नाम सोना रखा गया।

सोना की दिनचर्या : सोना की दिनचर्या बिलकुल निश्चित था। लेखिका के पलंग के पाए से सटकर सो जाना और सुबह होते ही वहाँ से चले जाने के बाद वह दूध के साथ भीगे चने खाकर छात्रावास, मेस, विद्यालय जाती थी । उसे बच्चों के साथ खेलना, हरी सब्जियाँ खाना और खुले मैदान में दूब चरना अच्छा लगता था।

सोना का स्वभाव : सोना का स्वभाव बहुत ही स्नेहिल था। महादेवी जी पशुओं की महानता पर प्रकाश डालती हुई कहती है कि पशु केवल मानव से स्नेह से परिचित होता है उनके ऊँची-नीची सामाजिक परिस्थियों से नहीं। महादेवी जी के प्रति उसके स्नेह जताने के कई मूक तरीके थे। वह उनके सिर के ऊपर से छलाँग लगाती, चोटी चबाती या साड़ी के पल्ले का चोर चबाती। महादेवी जी आगे कुत्ता और हिरण में अंतर बताती हुई कहती है कि कुत्ता अपने मालिक के स्नेह एवं क्रोध से परिचित होता है पर हिरण इस अंतर को नहीं जानता। सोना के अहिंसक प्रवृत्ति और स्नेहमयी स्वभाव के कारण अन्य पालित पशु भी उसे बहुत प्यार करने लगे।

सोना का अकेलापन : अब सोना हिरणी में परिवर्तित हुई और अधिक आकर्षक लगने लगी। उसमें वन तथा स्वजाति के संस्कार जाग उठे। प्रायः एकान्त में रहना उसे अच्छा लगता था। फिर महादेवी जी गर्मियों में बद्रीनाथ की यात्रा करने गई। उनका अभाव सोना को सताने लगता है। जब वे वापस आती है तो सोना को न पाकर विचलित हो जाती है। बाद में माली से उन्हें पता चलता है कि सोना ज्यादा उदास और अस्थिर रहने लगी और प्रायः कंपाउड के बाहर चली जाती थी। सोना की सुरक्षा का ख्याल रखते हुए माली उसे एक लंबी रस्सी से बाँध दिया करता था। एक दिन वह अपने बंधने की सीमा को भूल गई और बहुत ऊँचाई तक उछली और रस्सी के कारण मुँह के बल धरती पर आ गिरी। सोना के मृत शरीर को गंगा में प्रवाहित किया गया। फिर एक बार महादेवी जी मानव के क्रूर व्यवहार से कुंठित हुई।

इस प्रकार हम देख सकतें है किस भाँति इन बेजुबान जानवर के जीवन का अंत हुआ और इसके जिम्मेदार कौन है। क्या यह सही है? इसका उत्तर आप बेहत्तर जानते हैं। दोनों जानवरों की मृत्यु के पीछे मानव की निष्ठुरता भिन्न-भिन्न रूप में दिखाई देती है। यदि गौरा के मृत्यु के पीछे स्वार्थ है, तो सोना के मृत्यु के पीछे मानव का हिसंक व्यवहार ही मुख्य कारण है। क्यों न हम मिलकर यह प्रण ले और पशु-पक्षियों के साथ इस सुंदर प्रकृति को भी बचाने का संकल्प करें?


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