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04.15.2012
 

शीशों का मसीहा फ़ैज़
चंद्र मौलेश्वर प्रसाद


सियालकोट के खदिर खां नामक एक छोटे से कस्बे में ३ फ़रवरी १९११ को चौधरी सुलतान मोहम्मद खां के घर में एक चिराज रौशन हुआ।  माँ सुलतान फातिमा ने उस बालक का नाम फ़ैज़ अहमद रखा जिसने आगे चल कर फ़ैज़ तक़ल्लुस से काव्य-जगत में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया।

 

बचपन से ही से फ़ैज़ अहमद फ़ैज़एक ऐसे ज़हीन मस्तिष्क के मालिक थे जिन्होंने चार वर्ष की छोटी सी उम्र में कु़रान-ए-शरीफ़ कंठस्थ करना शुरू किया था।

 

फ़ैज़ बचपन से लेकर अपनी तालीम पूरी करने तक हमेशा प्रथम श्रेणी में ही उत्तीर्ण होते रहे।  स्कॉट मिशन हाई स्कूल, लाहौर से सन्‌ १९२१ में मैट्रिक पास किया, फिर सियाल्कोट वापिस आ गए।  मर्रे कालेज से इंटर का कोर्स पूर्ण कर फिर लाहौर लौट आए। १९३३ में गवर्नमेंट कालेज से अंग्रेज़ी में एम.ए. करने के बाद अगले वर्ष ओरिएंटल कालेज से अरबी में भी एम. ए. किया।  इस प्रकार फ़ैज़ने अपनी तालीम पूरी की और अमृतसर पहुँचे।

 

सन्‌ १९३४ से १९४० तक एम.ए.ओ.कालेज, अमृतसर में कार्यरत रहने के बाद फ़ैज़  दो वर्ष तक हैली कालेज, लाहौर में अंग्रेज़ी पढा़ने लगे।  इसी दौरान उनकी भेंट एक अंग्रेज़ी महिला मिस एलिस जार्ज से हुई।  मिस जार्ज के हुस्न को देख शायर का मस्तक झुक गया-

 

बिखर गया जो कभी रंग-पैरहन सरे-बाम

निखर गई है कभी सुबह, दोपहर कभी शाम

चमन में सर्वो-सनोबर संवर गए तमाम

तुम्हारे साया-ए-रुखसारो-लब में साग़रो-जाम

सलाम लिखता है शायर तुम्हारे हुस्न के नाम॥

 

उनका प्रेम परवान चढा़ और सन्‌ १९४१ में शादी की मंज़िल तक जा पहुँचा। शायर गा उठा-

आबसारों के, बहारों के, चमन-ज़ारों के गीत

आमदे-सुबह के, महताब के, सम्यारों के गीत

यूँ ही गाता रहूं,गाता रहूं, तेरी खा़तिर

गीत बुनता रहूं, बैठा रहूं, तेरी खा़तिर॥

 

उनकी दो पुत्रियाँ - सलमा जो १९४२ में और मुनीजा १९५४ में पैदा हुईं।  फ़ैज़को ऐसे लगा जैसे जीवन की आरज़ू पूरी हो गई।

कभी-कभी आरज़ू से सहरा में आ के रुकते हैं काफ़िले से

वो सारी बातें लगाव की सी, वो सारे उन्वां विसाल के से॥

 

१९४२में फ़ौज में भर्ती होकर फ़ैज़ कप्तान की हैसियत से दिल्ली आ गए और १९४७ में कर्नल के पद से इस्तेफ़ा देकर वापिस लाहौर लौट गए।

 

फ़ैज़के साहित्यिक मियार को देखते हुए पंजाब के धनी व प्रसिद्ध नेता मियाँ इफ़्तेखारुद्दीन ने अपने अंग्रेज़ी दैनिक पाकिस्तान टाइम्सऔर उर्दू दैनिक इम्रोज़ तथा साप्ताहिक पत्रिका लैलो-निहारका प्रधान सम्पादक नियुक्त किया।  फ़ैज़एक आला दर्जे के इंसान थे जिनके लेखन में भी नर्म मिजाज़ी और नाज़ुक खयाली देखी जा सकती है।  किसी ने भी उन्हें कभी ऊंची आवाज़ में बात करते हुए नहीं सुना था।

 

ले नासेह! आज तेरा कहा मान जाएं हम

दिल को मनाएं हम कभी आंसू बहाएं हम॥....

तुम नाहक टुकडे़ चुन-चुन कर

दामन में छुपाए बैठे हो

शीशों का मसीहा कोई नहीं

क्या आस लगाए बैठे हो!!

 

फ़ैज़ने भूख, गरीबी, गुलामी और शोषण को करीब से देखा था।  उन्होंने किसान को अपने पसीने से खेत सींचते हुए भी देखा और उस के दर्द व गरीबी को महसूस किया था। तभी तो उन्होंने कहा-

 

ये हसीं खेत, फटा पड़ता है जोबन जिनका

किस लिए इन में फ़कत भूख उगा करती है

अपना मौज़ू-ए-सुखन इनके सिवा और नहीं

तबअ-ए-शायर का वतन इनके सिवा और नहीं॥

 

फ़ैज़ने मज़दूरों को मिलों में अपना लहू टपकाते हुए देखा और यह भी जाना कि गरीबी उनका दामन नहीं छोड़ती!

 

जब भी बिकता है बाज़ार में गरीब का गोश्त

शाह-राहों पे गरीबों का लहू बिकता है

आग ऐसी सीने मे रह-रह के उबलती है न पूछ

अपने दिल पे मुझे काबू ही नहीं रहता है॥

 

गरीबी की चक्की में लोगों को पिसते देखकर फ़ैज़का दिल गम से भर उठता है और भविष्य के वो हसीन सपने जो कभी देखे थे, वो टूट कर चकनाचूर हो जाते हैं- शीशे की तरह!

मोती हो या शीशा, जाम कि दर

जो टूट गया सो टूट गया

कब अश्कों से जुड़ सकता है

जो टूट गया सो छूट गया॥

 

फिर भी, उन्हें हर काले बादल के पीछे तदबीर कि सुनहरी किरण दिखाई देती है।

मेरा दिल गमगीन है तो क्या, गमगीं ये दुनिया है सारी

ये दुख न तेरा है न मेरा, हम सब की जागीर है प्यारी

क्यों न जहां का गम अपना लें बाद में सब तदबीरें सोचें

बाद में सुख के सपने देखें, पहले सपनों की ताबीरें सोचें॥

 

इन्हीं तदबीरों से जब यही मज़लूम बेदार हो जाएंगे, तब उनका हक लेने से उन्हें कोई नहीं रोक सकेगा।

 

ये मज़लूम मखलूक़ गर सर उठाए

तो इंसां सब सरकशी भूल जाए

कोई इनको अहसासे-ज़िल्लत दिला दे

कोई इनकी सोई हुई दुम हिला दे॥

 

शायद यही कारण रहा कि फ़ैज़की रचनाओं मे अधिकतर समाजवादी विचारधारा पाई जाती है।

जब कहीं बैठ के रोते हैं बेकस जिनके

अश्क आंों मे बिखरते हुए सो जाते हैं

नातुवानों के निवालों पे झपटते हैं बाज़

बाज़ू तोले हुए मंडलाते हुए आते हैं........

जिस्म पे कैद हैं, जज़्बात पे ज़ंजीरें है

फ़िक्र महबूस है, गुफ्तार पे ताजीरें है

लेकिन अब ज़ुल्म की मेयाद के दिन थोडे़ हैं

इक ज़रा सब्र, कि फरियाद के दिन थोडे़ हैं॥

 

इन्हीं साम्यवादी विचारों के कारण फ़ैज़को जेल की हवा भी खानी पडी़ थी।  हुआ य़ूं कि १९५१ में, जब चौधरी लियाकत अली खां पाकिस्तान के प्रधान मंत्री थे, तब कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता और साहित्यकार सैय्यद सज्जाद ज़हीर को फ़ैज़के साथ उस समय पाया गया जब ये दोनों अपने दो फ़ौजी मित्रों के साथ देखे गये।  उन पर मुकदमा चलाया गया जो अब रावलपिंडी कांस्पिरेसी केसके नाम से प्रसिद्ध है।  फ़ैज़को चार वर्ष तक कैद में रखा गया था जिसमें तीन माह की कैदे-तन्हाई भी शामिल है। तब उन्होंने कहा था-

मता-ए-लौहो-कलम छिन गई तो क्या गम है

कि खूने-दिल में डुबो ली है उंगलियां मैंने

जबां पे मुहर लगी है तो क्या रख दी है

हर एक हल्का-ए-ज़ंजीर में ज़ुबां मैंने॥..

कोई पुकारो कि उम्र होने आई है

फ़लक को का़फ़िला-ए-रोज़ो शाम ठहराए

सबा ने फिर दरे-ज़िंदां पे आके दी दस्तक

सहर करीब है दिल से कहो न घबराए॥

 

इसी कैद के दौरान फ़ैज़ने कई रचनाएं लिखी जिन्हें दस्ते-सबाके नाम से प्रकाशित किया गया है।  इस दौरान इतनी राजनैतिक उथल-पुथल होती रही कि सरकारें तेज़ी से बदलीं।  नतीजा यह हुआ कि मुकदमा पूरा हुए बगैर ही २० अप्रेल १९५५ के दिन फ़ैज़को रिहाई दे दी गई।

 

अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें, अब ज़िंदानों की खैर नहीं

जो दरिया झूम के उठेंगे, तिनकों से न टाले जाएंगे॥

वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था

वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है

चमन पे गारते-गुलचीं से जाने क्या गुज़री

कफस से आज सबा बेकरार गुज़री है॥

 

अपने साम्यवादी विचारों के कारण फ़ैज़को १९५८ में फिर एक बार सुरक्षा एक्टके तहत गिरफ़्तार किया गया परंतु अप्रैल १९५९ में रिहा कर दिया गया।

 

जंग ठहरी है कोई खेल नहीं है ऐ दिल

दुश्मने-जां है सभी, सारे के सारे कातिल

ये कडी़ रात भी, साये भी, तन्हाई भी

दर्द और जंग में कुछ मेल नहीं है ऐ दिल॥

 

इस राजनैतिक उहापोह से तंग आकर फ़ैज़ लंदन चले गए।

 

दोनों जहां तेरी मुहब्बत में हार के

वो जा रहा है कोई सबे-गम गुज़ार के

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया

तुझसे भी दिलफ़रेब हैं गम रोज़गार के॥

 

दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है

लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

भीगी है रात फ़ैज़ गज़ल इब्तेदा करो

वक़्त सरोद दर्द का हंगाम ही तो है॥

 

जब ग़म की यह शाम गुज़र गई और उम्मीद की सुबह नज़र आई तो फ़ैज़ फिर अपनी मातृभूमि को लौट आए।

दिल में अब यूं तेरे भूले ग़म आते हैं

जैसे बिछडे हुए काबे में सनम आते हैं॥

 

१९६२ में जब फ़ैज़ लौटकर कराची पहुंचे तो उन्हें अब्दुल हारूं कालेज का प्रिंसिपल नियुक्त किया गया।  सय्यद सज्जाद ज़हीर की मृत्यु के बाद रूसी सरकार की एफ़्रो-एशियन राइटर्स फ़ेडरेशन की बागडोर फ़ैज़के हाथों में आई। इसी फ़ेडरेशन की बेरूत से छपने वाली पत्रिका लोटस्‌के वे सम्पादक भी रहे।  उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए रूस सरकार ने उन्हें १९६२ में लेनिन पुरस्कार से सम्मानित किया था।

 

अपने बुढा़पे के दिनों में फ़ैज़को दमे का रोग इस कदर सताने लगा कि वे वापिस लाहौर लौट आए।

देखे है कौन-कौन ज़रूरत नहीं रही

कूए-सितम में सब को खफ़ा कर चुके हैं हम

अब अपना इख्तियार है चाहें जहां चले

रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम।

 

रोग हद से ज़्यादा बढ़ गया और सांस लेने में दिक्कत होने लगी।

 

बोल ये थोडा़ वक्त बहुत है

जिस्मो-ज़ुबां की मौत से पहले

बोल कि सच ज़िंदा है अब तक

बोल, जो कुछ कहना है कह ले॥

 

फ़ैज़को लाहौर के मेयो अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उन्होंने २० नवम्बर १९८५ के दिन इस संसार को अलविदा कहा-

गुलों में रंग भरे बादे-नौबहार चले

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चल

बडा़ है दिर्द का रिश्ता, ये दिल गरीब सही

तुम्हारे नाम पे आयेंगे ग़मगुसार चले।

 

आओगे मेरी गोर पे तुम अश्क बहाने

नौखेज़ बहारों में हंसी फूल चढा़ने

माज़ी पे नदामत हो तुम्हे या कि मसर्रत

खामोश पडा़ सोएगा बामांदा-ए-उल्फ़त॥

 

 


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