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04.15.2012
 

जनता का शायर - नज़ीर
चंद्र मौलेश्वर प्रसाद


पिछले पहर से उठके नहाने की धूम है

शीरो-शकर सिवय्याँ पकाने की धूम है

पीरो-जवां के नेअमतें खाने की धूम है

लड़कों को ईदगाह के जाने की धूम है ...

ऐसे न शब-बरात न बकरीद की खुशी

जैसी हर इक दिल में है इस ईद की खुशी॥

भारत एक विशाल देश है जहाँ ईद की खुशी और होली की रंगीनी सब लोग मिल-जुल कर मनाते हैं।

तुम रंग इधर लाओ और हम भी उधर आवें

कर ऐश की तैयारी धुन होली कि बर लावें

और रंग के छींटों की आपस में जो ठहरावें

जब खेल चुके होली फिर सीने से लग जावें॥

इस यकजहदी का सुंदर वर्णन करनेवाले शतपति शायर हैं नज़ीर अकबराबादी। लगभग सौ वर्ष की आयु पाने पर भी इस शायर को जीते जी उतनी ख्याति नहीं प्राप्त हुई जितनी की उन्हें आज मिल रही है।

जिस दिन से नज़ीर अपने तो दिलशाद यही है

जाते हैं जिधर को उधर इरशाद यही है

सब कहते हैं, वह साहबे-ईजाद यही है

क्या देखते हो तुम खडे़? उस्ताद यही है॥

दिल्ली के मुहम्मद फारुक के घर में बारह बच्चे पैदा हुए पर एक भी जीवित नहीं रहा। जब १७३५ई. में तेरहवें बच्चे के जन्म का समय आया तो पिता ने पीरों और फकीरों से तावीज़ लाकर अपने नवजात शिशु के जीवन की दुआ माँगी। बुरी नज़र से बचाने के लिए इस बालक के नाक और कान छिदवाए गए और इसे वली मुहम्म्द नाम दिया गया। आगे चलकर वली मुहम्मद ने नज़ीर तख़ल्लुस से शायरी की और अकबराबाद में रहने के कारण नज़ीर अकबराबादी के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त की।

१७३९ई. में दिल्ली पर नादिरशाह का हमला हुआ पर नज़ीरके बचपन को इससे क्या लेना-देना था!

दिल में किसी के हरगिज़ नै शर्म नै हया है

आगा भी खुल रहा है पीछा भी खुल रहा है

पहने फिरे तो क्या है नंगे फिरे तो क्या है

यां यूं भी वाहवा है और वूं भी वाह वा है ...

कुछ खा ले इस तरह से कुछ उस तरह से खा ले

क्या ऐश लूटते हैं मासूम भोले-भाले॥

दिल्ली पर जैसे मुसीबतों के पहाड़ एक के बाद एक टूट पडे़। १७४८, १७५१ और १७५६ में अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण लगातार होते रहे। दिल्ली वासियों पर मौत का साया मंडरा रहा था। चारों ओर डर और खौ़फ़ का माहौल था।

नज़ीर के नाना नवाब सुलतान खां आगरा के किलेदार थे। दिल्ली के बुरे हालात देखकर नज़ीर दिल्ली से अपनी ननिहाल आगरा [अकबराबाद] चले गए। उस समय उनकी आयु २२-२३ वर्ष की थी। उन्होंने नूरी दरवाज़े पर एक मकान लिया और फिर वहीं के होकर रह गए।

आगरे में ही तहवरुनिस्सा बेगम से नज़ीरने शादी की, जिनसे उनकी दो संताने हुई। ए ड़का - गुलज़ार अली और एक लड़की- इमामी बेगम। यह उर्दू साहित्य का सौभाग्य ही है कि इमामी बेगम की लड़की विलायती बेगम सन १९००ई. में ज़िंदा थी, जब औरंगाबाद कालेज के प्रोफ़ेसर मौलवी सैय्यद मुहम्मद अब्दुल गफ़ूर शहबाज़’ ‘नज़ीरकी लेखनी पर खोज कर रहे थे। विलायती बेगम ही की मदद से प्रो. शहबाज़ ने नज़ीरके कलामों को संजोया और इसे दुनिया के सामने बतौर ज़िन्दगानी-ए-बेनज़ीर पेश किया वरना नज़ीरके साथ ही उनके कलाम भी शायद दफ़न हो जाते!

दुनिया में अपना जी कोई बहला के मर गया

दिल तंगियों से और कोई उक्ता के मर गया

आकि़ल था वह तो आप को समझा के मर गया

बे-अक्ल छाती पीट के घबरा के मर गया

दुख पा के मर गया कोई सुख पा के मर गया

जीता रहा न कोई हर इक आ के मर गया॥

 नज़ीरकी शायरी को रोशनी में लाने का दूसरा स्त्रोत थे उनके शागिर्द - लाला बिलासराय के लड़के- हरबख्शराय, मूलचंदराय, मनसुखराय, वंसीधर और शंकरदास। नज़ीर इन लड़कों को १७ रुपये मासिक के वेतन पर पढ़ाया करने थे। इस छोटी सी आय ने उन्हें मुफ़लिसी का अहसास भी दिलाया था।

जब आदमी के हाल पे आती है मुफ़लिसी

किस-किस तरह से उसको सताती है मुफ़लिसी

प्यासा तमाम रोज बिठाती है मुफ़लिसी

भूखा तमाम रात सुलाती है मुफ़लिसी

यह दुख वो जाने जिस पे कि आती है मुफ़लिसी॥

जब भी नज़ीर कोई शर या कलाम कहते, ये लड़के कापी में लिख लेते। इन्हीं कापियों से नज़ीरके कलामों की जानकारी मिली। छोटी सी आमदनी में भी अपनी ज़िन्दगी इज्ज़त से गुज़रें, यही उनकी तमन्ना रहती।

यह चाहता हूँ अब मैं सौ दिल की आरज़ू से

रखियो नज़ीर को तुम दो जग में आबरू से॥

मिर्ज़ा फ़रहतुल्लाह बेग का कथन है कि नज़ीरआठ भाषाएँ जानते थे - अरबी, फ़ारसी, उर्दू, पंजाबी, ब्रजभाषा, मारवाड़ी, पूरबी और हिन्दी। नज़ीर ने अपनी शायरी सीधी-सादी उर्दू में आम जनता के लिए की। उस ज़माने में इल्मो-अदब शाही दरबारों में पलती-पनपती थी, पर नज़ीर ही एक ऐसे शायर हैं जिन्होंने अपने आप को दरबारों से दूर रखा। नवाब सादत अली खां ने उन्हें लखनऊ बुलवाया और भरतपुर के नवाब ने उन्हें न्यौता भेजा, पर न उन्हें अकबराबाद छोड़ना था न उन्होंने आगरा छोडा़।

एक बार जब वाजिद अली शाह ने उन्हें लखनऊ आने का निमंत्रण दिया तो नज़ीर अपने घोडे़ पर सवार वहाँ जाने को निकल पडे़। जैसे-जैसे ताज महल आँखों से दूर हुआ वैसे-वैसे उनका दिल बैठने लगा। आखिरकार घोडे़ को पलटाया और फिर कभी आगरा छोड़ने का खयाल भी मन में नहीं लाया।

नज़ीर एक धर्मनिर्पेक्ष शायर थे। उन्हें कुरआन और पोथी में एक ही मालिक नज़र आया-

जाता है हरम में कोई कुरआन बगल मार

कहता है कोई दैर में पोथी के समाचार

पहुंचा है कोई पार भटकता है कोई ख्वार

बैठा है कोई ऐश में फिरता है कोई जार

हर आन में, हर बात में, हर ढंग में पहचान

आशिक है तो दिलबर को हर इक रंग में पहचान॥

उन्होंने नानक के सामने भी माथा टेका-

कहते हैं जिन्हें नानक शाह पूरे हैं आगाह गुरु

वह कामिल रहबर जग में हैं यूं रौशन जैसे माह गुरु..

मकसूद मुराद उम्मीद सभी बर लाते हैं दिलख्वाह गुरु

नित लुत्फ़ो-करम से करते हैं हम लोगों का निर्वाह गुरु

इस बख्शिस के इस अज़मत के हैं बाबा नानक शाह गुरु

सब सीस झुका अरदस करो और हरदम बोलो वाह गुरु

तो कृष्ण के गुण भी गाए--

तारीफ़ करूँ अब मैं क्या उस मुरली बजैय्या की

नित सेवा कुंज फिरैया की और बन बन गऊ-चरैया की

गोपाल, बिहारी, बनवारी, दुखहरना, मेल करैया की

गिरधारी, सुंदर, श्याम बरन और हलधर जू के भैया की

यह लीला है उस नंद-ललन, मनमोहन, जसुमति-छैया की

रख ध्यान सुनो दंडौत करो, जय बोलो किशन कन्हैया की॥

नज़ीर ने अपनी जवानी में खूब रंगरलियाँ मनाई। जवानी के अहसासात उन्होंने इस तरह बयान किए-

क्या तुझसे नज़ीर अब मैं जवानी की कहूँ बात

इस सिन में गुज़रती है अजब फेश से औकात

महबूब परीज़ाद चले आते हैं दिन-रात

सैरें हैं, बहारें हैं, तवाजें है, मुदारात...

इस ढब के मज़े रखती है और ढंग जवानी

आशिक को दिखाती है अजब रंग जवानी ॥

एक वेश्या मोतीबाई पर नज़ीरकी नज़र पडी़ और वे इतने फ़िदा हुए कि उसकी खुबसूरती का बयान इस खूबसूरती से किया-

दूरेज़ करिश्मा, नाज़ सितम

धमज़ों की झुकावट वैसी है

मिज़गां की सिनन नज़रों की अनी

अबरू की खिचावट वैसी है

पलकों की झपक, पुतली की फिरट

सुरमों की घुलावत वैसी है.....

 नज़ीरने जीवन का अध्ययन बडी़ सूक्ष्मता से किया था। साधारण सी घटना को भी वे असाधारण तरीके से बयान करते थे। वे ऐसे विषय पर भी शायरी कर देते थे जिस पर किसी अन्य शायर का ध्यान भी न जाता हो।

जाड़ों में फिर खुदा ने खिलवाए तिल के लड्डू

हर इक ख्वांचे में दिखलाए तिल के लड्डू

कूचे गली में हर जा बिकवाए तिल के लड्डू

हमको भी दिल से हैंगे खुश आए तिल के लड्डू!

नज़ीर प्रकृति के बहुत करीब थे। उन्हें पक्षी-पालन का भी शौक था। उन्होंने इतने पक्षियों के नाम गिनवाए है कि आज की पीढ़ी इन्हे जानती भी नहीं होगी।

चंडूल, अगन, अबलके, छप्पां, बने, दैयर

मैना व बैये, किलकिले, बगुले भी समन-बर

तोते भी कई तौर के टुइय्यां कोई लहवर

रहते थे बहुत जानवर उस पेड़ के ऊपर..

शायरी की दृष्टि से भले ही नज़ीरने रदीफ़, काफ़िया, उच्चारण और ध्वनि सौंदर्य का खयाल न रखा हो पर उनकी रचनाओं की सरलता में सरसता है। उन्होंने मौत को भी एक कविता के रूप में देखा था।

मरने में आदमी ही कफ़न करते हैं तैयार

नहला-धुला उठाते हैं कांधों पे कर सवार

कलमा भी पढ़ते जाते हैं रोते हैं ज़ार-ज़ार

सब आदमी ही करते हैं मुरदे के कारबार

और वह जो मर गया है सो है वो भी आदमी।

नज़ीर ने अपनी शायरी में अलंकारों का सहारा नहीं लिया पर रूपकों का अत्याधिक प्रयोग किया जिसकी झलक हंसनामा’, ‘बंजारानामा’, ‘रीछ का बच्चा जैसी रचनाओं में मिलती है।

जब चलते चलते रस्ते में यह गौन तेरी रह जाएगी

इक बघिया तेरी मिट्टी पर फिर घास न चरने पावेगी

यह खेप जो तूने लादी है सब हिस्सों में बंट जाएगी

धी, पूत, जमाई, बेटा क्या, बंजारिन पास न आवेगी

सब ठाठ पडा़ रह जाएगा जब लाद चलेगा बंजारा ॥

फ़्रांसिसी शोधकर्ता गार्सिन द तेस्सी का कथन है कि नज़ीरका पहला दीवान १८२० में देवनागरी लिपि में लिखा गया था। मिर्ज़ा फ़रहतुल्ला बेग ने जून १९४२ में हैदराबाद के आगा हैदर हसन के माध्यम से दो दीवान छपाए थे। अभी भी नज़ीरकी फ़ारसी में लिखी कृतियाँ नज़्मे-गज़ीं, कद्रे-मतीन, बज़्मे-ऐश, राना-ए-ज़ेबा आदि दिल्ली विश्वविद्यालय के ग्रंथालय में सुरक्षित है।

नज़ीर ने बुढ़ापे में भी अपनी ज़िंदादिली नहीं छोड़ी थी। वे जानते थे कि बुढ़ापा कितना तकलीफदेह होता है पर सच्चाई को भी उन्होंने हँसते-हँसते बयान किया।

अब आके बुढा़पे ने किए ऐसे अधूरे

पर झड़ गए, दुम झड़ गई, फिरते है लंडूरे...

सब चीज़ का होता है बुरा हाय बुढा़पा

आशिक को तो अल्लाह न दिखलाए बुढा़पा

 नज़ीरने अपना लम्बा जीवन-सफ़र स्वतन्त्रता और स्वच्छंदता से गुज़ारा पर अंत में तीन वर्ष वे पक्षाघात से पीड़ित रहे और अपने घर के आँगन के दो पेड़ों के बीच अपने प्राण तज दिए। यहाँ आज भी हर बरस बसंत के त्यौहार पर ताजगंज मोहल्ले में लोग जमा होते हैं और इस जनता के शायर को ढोल-ताशों, नाच-गानों के बीच श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। ऐसा समा बँध जाता है मानो नज़ीरकी रूह कह रही हो:

यां लुत्फ़ो-करम तुमने किए हम पे हैं जो जो

तुम सबं की ए खूबी है कहाँ हम से बयां हो

तकसीर कोई हम से हुई होते तो बख्शो

लो यारो हम अब जावेंगे कल अपने वतन को

अब तुमको मुबारक रहे यह पेड़ तुम्हारो।

(नज़ीर अकबराबादी के कलाम के लिए क्लिक करें)

 


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