अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
02.19.2016


मंज़िल

मैं जब भी
तेज़ चलता हूं
मं्ज़िलें
दूर जाती हैं
मैं जब
भी रुक जाता हूँ
रास्ते रुक जाते हैं
मैं अकसर सोचा करता हूँ
कैसे गुज़रूँगा
इन
राहों से

मैं फिर भी
उठ खड़ा होता हूँ
ये सोचकर
कि
कल भी कोई राहगीर गुज़रा था
यहाँ से
कल भी गुज़रेंगे कई लोग यहाँ
इसी उम्मीद में अकसर

मैं देखा करता हूँ
मेरी
कोशिश ज़िन्दगी
को भी
जीत सकती है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें