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ISSN 2292-9754

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12.17.2018


मैं क्या हूँ?

मैं क्या हूँ......?
दीपक, लौ, बत्ती या तेल....!

दीपक,
मैं हूँ ही नहीं
मेरे अंदर इतना सामर्थ्य नहीं
अंधकार को नष्ट करने का,
बत्ती, लौ, तेल की व्यवस्था करने का।

दीपक की लौ,
नहीं, मैं नहीं हो सकता
लौ में होती तपन-जलन
जो मेरे अंदर नहीं
किसी का भला न कर सकूँ, न सही
बुरा भी मैं नहीं कर सकता

बत्ती,
शायद, हो सकता था
लेकिन, जब भी मैंने चेष्टा की
किसी को मिलाने की,
प्रगति दिलाने की
सही राह दिखाने की
परिणाम हुआ विपरीत

दीपक का तेल.....
अति उपयोगी,
दीपक के जीवन का सार
इतना महत्वपूर्ण तो मैं नहीं!

मैं क्या हूँ.... मैं क्या हूँ..?
यह है अजब पहेली,
जितना स्वयं को समझूँ,
उलझता जाऊँ
कोई तो मुझे बतलाये....
मैं क्या हूँ ...?


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