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ISSN 2292-9754

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04.02.2017


मंच से झरता इंक़लाब

शहर के सबसे बड़े उद्योगपति के उद्योग समूह की सबसे मोटी कमाई करने वाली फैक्ट्री की स्थापना की पच्चीसवीं वर्षगाँठ मनाई जा रही है। बहुत से उत्सवों का आयोजन किया गया है। एक भव्य कवि-सम्मेलन भी आयोजित किया गया है। देश के बड़े-बड़े नामी कवि बुलाए गये हैं। सुना है उनमें से कई ने तो एक रात के लिए एक-एक लाख रुपये लिये हैं। सभी के रुकने का इन्तज़ाम मंहगे शानदार होटलों में किया गया है। आयोजन-स्थल भी एक बड़े होटल के वातानुकूलित हाल में है।

शहर के तमाम नेताओं, प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों, बड़े-बड़े व्यवसायियों को कार्यक्रम के पास जारी किए गये हैं। सार्वजनिक प्रवेश की अनुमति नहीं है। बड़े-बड़े अख़बारों के पत्रकार आये हुए हैं। एक स्थानीय समाचार-पत्र का सम्पादक होने के नाते मुझे भी निमन्त्रण मिला है।

आयोजन-स्थल पर पहुँचा तो पता चला सभी कवि किसी विशिष्ट कार्य हेतु एक कमरे में एकत्रित हैं। मुझे कई स्वनामधन्य कवियों से दुआ-सलाम की अभिलाषा है, सो वहीं पहुँच गया हूँ। शैम्पेन की बोतलें खुली हुई हैं, तले हुए काजू की प्लेटें सजी हुई हैं। कविगण काव्य-पाठ के लिये आवश्यक ऊर्जा का संचय करने में व्यस्त हैं। वातावरण अपने अनुकूल न पाकर बाहर आ गया हूँ।

कवि-सम्मेलन में सभी कवियों ने एक से बढ़कर एक क्रान्तिकारी कवितायें प्रस्तुत की हैं। ग़रीबी पर, भुखमरी पर, बेरोज़गारी पर, भ्रष्टाचार पर, व्यभिचार पर, किसानों की दुर्दशा पर रची गई इंक़लाबी कविताओं से हाल रह रहकर तालियों से गूँज रहा है। वाह-वाह, फिर से पढ़िये की आवाज़ें गूँज रही हैं। इंक़लाब मंच से झर-झर झर रहा है। नौ बजे शुरू हुआ कवि-सम्मेलन रात एक बजे तक चला। तत्पश्चात सभी कवियों और मेहमानों ने छककर नान-वेज का लुत्फ़ उठाया।

सुबह के सभी अख़बार कवि-सम्मेलन की भूरि-भूरि प्रशंसा से भरे पड़े हैं। साथ ही आयोजनकर्ता उद्योगपति की भी, जिनकी ओर से सभी अख़बारों को पूरे पृष्ठ का विज्ञापन देकर उपकृत किया गया है... ग़रीबों के लिए उनकी फ़ैक्ट्री में बनने वाले गुटखे का विज्ञापन। फ़ैक्ट्री में मेरे सूत्रों ने मुझे बताया है कि इस आयोजन का ख़र्च 'कारपोरेट सामाजिक दायित्व' की मद में किया गया है।


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