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05.03.2012
 

यात्रा - मैं से तुम तक
भुवनेश्वरी पाण्डे


मैं जब जन्मी तो जाना,
सब कुछ मेरा ही तो है।
मेरे माँ पिता, मेरे भाई बहन,
मेरा घर, मेरा स्कूल, मेरी पुस्तकें,
मेरे मित्र, और मेरे सम्बन्धी।
मेरा उत्तीर्ण होना मेरा अनुत्तीर्ण होना,
मुझसे दोस्ती, मुझसे बैर,
मेरा मन, मेरा तन,
मेरा सुख, मेरा दुख।
जो कुछ था बस मेरा था, मेरा ही मेरा,
थे सारे सपने भी मेरे।

युवावस्था आई तो रंग प्रेम का लाई,
वो मेरे, तो पाणिग्रहण भी मेरा,
बस अब हम हो गये हम,
वो मेरे, मैं उनकी, साथ चल पड़े हम।
अब सब कुछ हम था- हमारा था, हम लोग थे,
निमंत्रण हमारा, सत्कार हमारा,
घर था हमारा, सम्बन्धी थे हमारे
और बच्चे हो गये हमारे,
हम इस सारे में इतने डूबे
कि मैं, मैं ना रही।

बच्चों के, साथी के सुख दुख,
सब हमारे थे, एक से दो, दो से चार,
माया का इस तरह हुआ विस्तार,
हमने खिलाया, हमने पिलाया,
हमने पहनाया, हमने ओढ़ाया,
माया से बचा है कौन?
सतरंगी चुनरी ओढ़ ली बड़े प्यार से,
बुनते गये ताने बाने,
हम तो मगन थे हमीं में,
और ये तो होना ही था,
ऐसे सुन्दर स्वप्न में खोना ही था,
अचानक किसी ने कहा-
आपके बच्चों ने ऐसा किया।

तन्द्रा टूटी, एक कोने से ममता छूटी,
गहरे चले गये ये स्वप्न में,
जाग कर होश आने में
कुछ वक्त तो लगना ही था।
अब सब कुछ तेरा है,
तू उठा दे, तू बिठा दे,
घर भी तू रख, जग भी तू रख,
संताने तेरी, वो भी तेरे,
चाहे जैसे रख, अब मैं भी तेरी,
सुख दुख, तुझको दे रही,
शनै: शनै: सब सौंप रही,
तेरा तुझको लौटाऊँ क्या?
माया जाल से बाहर आऊँ क्या?

इस कोठरी के अन्दर
है ये कैसा परिवर्तन,
आँखें वही, पर अब तू ही तू दीखता है
मेरा मुझको कुछ नहीं मिलता है,
भ्रम जाल सब टूटे,
बारी बारी सब नाते छूटे,
मिलती हूँ सबसे, सब हैं जो तेरे,
जब वे मेरे थे, पक्षपाती ही थी मैं,
अब इस क्रिया का सच जाना है
मैं से हम, हम से तू बन जाना है,
एक बूँद थी, सागर से उसे मिलाना है।
एक यात्रा —
मैं से तुम तक -
परवान चढ़ाना है।।


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