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05.03.2012
 

श्मशान और गिद्ध
भुवनेश्वरी पाण्डे


दोस्त कैसे होते है दोस्ती कौन निभाता है, कुछ पता नहीं, यहाँ इस परदेस में जिनसे भी दोस्ती करनी चाही, ऊपर-ऊपर लगा सब दोस्त हो गये। पर कभी-कभी लगता है जैसे इतना बड़ा देश एक श्मशान है; जहाँ हालात हमें लेकर चले आए और उन्हीं हालात ने ये गिद्ध जैसे दोस्त लाकर बैठा दिए आस पास, कुछ दूर - कुछ पास; जो नज़र तो हम पर रखे हैं कि अब साँस जाए इसका अर्थ हो गया कि हम हालात के हाथों टूट जायें, बिखरना हो हमारा... हम बिखर जायें और वो आयें। पर पास कोई नहीं आएगा सबको एक डर सा है कि कहीं हममें कुछ मजबूत साँसें बची होगीं तो उनको खतरा है; पर नज़र भी रखे हैं कि हम क्षण प्रति क्षण क्षीण हो रहे हैं या नहीं। कौन सा दूसरा गिद्ध हमारे ज्यादा पास है, श्मशान में गिद्ध उड़ते नहीं, धीरे-धीरे सरकते है उसकी ओर जो निरन्तर निर्बल हो रहा होता है। मरे हुए को खाना भी कुछ खाना है!

कितने शर्म की बात है मनुष्य को गिद्ध कहना। पर कुछ तो कडुवाहट आ गई होगी जो ये बात मन में आई। यह कभी किसी को फोन करो तो वो जाने क्यों ऊपर से तो कहेगा कि तुम्हें याद कर रहे थे कैसे हो? पर आवाज व वाक्य ये प्रदर्शित कर ही देते हैं कि (क्या बात है, क्या काम है क्यों फोन किया है) जितने भी मिले जाने क्यों यही लगा। हममें कोई ख़ामी है तुम कह सकते हो, पर हमने तो किसी काम से फोन नहीं किया। अगर किया भी तो तुम पहले  से बसे हो कुछ, काम किसी के आ गये तो क्या हर्ज़ है उसमें इतने बड़े शहर में तुम नितान्त अकेले हो, कोई भी तो तुम्हारा नहीं, घनी बस्ती वाले शहरों में जाने क्यों लोग चलते चले जाते है बसने को। जबकि उतने ही असहाय व अकेले रह जाते है। जब कि ये तो सामज है यहाँ कब किस की जरूरत किसी को नहीं पड़ी । कभी किसी के दुःख में सुखी होने की व सुख में दुःखी होने की। बहुत कम लोग बचे हैं जिन्हें आज की हवा-पानी ने बदल ना दिया हो और वो सुख में सुखी दुःख में दुःखी हो गये हों। कभी अनुकूल व्यवहार करो तो आस पास के लोग अचरज करने लगते है, उनकी भंवे वक्र हो जाती हैं, आपस में फुसफुसाहट होती है। किसी के सुख को देख कर अपने दुःख का बखान कर उसमें सुख की ठंडक को कम करने का प्रयास रहता है। कभी-कभी तो स्थिति इस तरह की बना दी जाती है कि सुखी, सुखी नहीं रह पाता। कोई दुखी हो तो उसे ज्ञानी बन कर दुःखी नहीं रहने देते, पर मन ही मन सुखी हो जाते है कि ठीक हुआ उसके साथ, क्यों मन में सबके पाप जागता है इस प्रकार का, क्यों भगवान का अंश मनुष्य के भीतर दानव का रूप धर लेता है। कभी ध्यान से सोचो तो देवी-देवता की तस्वीरे या मूर्तियाँ दोनों चीजों से विभूषित रहती है एक ओर कमल होगा कोमलता प्रदर्शित करता और दूसरी ओर कोई उनका प्रिय शस्त्र होगा; क्या यहीं तो नहीं हम सभी में। अपने लिए कोमल दूसरे के लिए कठोर।

समय परिवर्तन शील हो तो समाज भी अति तीव्र गति से परिवर्तित हो रहा है ये तो सभी प्रत्यक्ष दर्शन कर रहे हैं पर इस सब प्रक्रिया में मनुष्य क्या हो गया गिद्ध या दूसरा जीव जो अपने प्राकृतिक गुणों से वंचित होता जा रहा। उसमें से कोई भी चीज कम नहीं पर वो दो तरह के व्यक्तित्व के बीच की (पाटी) में पिसता जा रहा। क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता जैसे विभिन्न जानवरों-पक्षियों ने जंगल में मनुष्य का बाना पहन लिया हैं और वो उसी की भाँति व्यवहार कर रहे हैं। तो उसकी भाँति व्यवहार करने में और वास्तव में होने में अन्तर है वही परेशान।

जिन लोगों को मित्र समझते हैं, वो, वो नहीं जैसा हमारी कल्पना ने सोचा होता है। हम उनसे उम्मीद कर लेते हैं। और उन्हें तो गिद्ध कह दिया क्या उनके लिए हम भी गिद्ध साबित हुए हैं? जरूर, क्या पता? क्योंकि ये इस तरह के पाप जाने-अनजाने हो जाते हैं, हम भी तो वही हैं जो वो हैं। लेकिन इन सब पापों के बीच इतना पता है कि हम क्या किसी के काम आएगें, काम आता है आदमी का खुद का वक्त, पर हमने उन गिद्धों का भी बुरा नहीं चाहा, क्षण दो क्षण क्षुब्ध ज़रूर हो गये पर बाद में क्षमा करते चले गये, ये सोचकर कि वे लाचार थे उन पर गिद्ध की वर्दी चढ़ी थी वो क्या करते बेचारे, हालात से लाचार, स्मृति विस्मृति में बधें। अपना समय भूल चुका होता है मनुष्य। यदि सही वक्त तक वो उस वक्त को याद रख सके तो कितनी सुविधा हो जाए सबको।

एक लम्बा अरसा हो गया कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिसे हम अपना मित्र कह पाते। हर बार उसको, इसको मित्र बनाने की नाकाम चेष्टा की। कुछ ही वक्त बाद बेकार समय नष्ट किया ऐसी अनुभूति हुई। ये कह लो कि हम उन जैसे नहीं बन सके और वो हमें समझ नहीं सके। हमारे सादेपन को कभी किसी ने मूर्खता समझी, कभी किसी ने गरीबी जानी। सच दोनों बातों से दूर ही था, अब आज उन्हें विद्वान या धनवान तो हम नहीं कह सकते जिन्हें धन पर मान था, वे भी परेशान है जिन्हें ज़िन्दगी की अपनी शान से गर्वित होने की आदत थी, वो उसी शान को बनाने में माइग्रेन का दर्द पाल बैठे हैं। फायदा हमें ही हुआ, इन सबसे अपने को अलग रखने की कोशिश में प्रभु के चरणों में आकर बैठ गये। जहाँ शीतल शान्त मन रहने लगा अब ना आशा करती हूँ, ना किसी को निराश करने का पाप उठाना चाहती हूँ। देर ध्यान से तो इसमें भी अपना कुछ नहीं, ऐसे मोड़ आने थे, सो आए वरना सब तुम्हारे अनुभव तो ऐसे नहीं जैसे हमारे हैं।


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