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04.30.2012
 

अब भी आज भी
भुवनेश्वरी पाण्डे


टोरोंटो के एक प्रसूति गृह में डिम्पल ने अपने पहले पुत्र को जन्म दिया था, अभी दो दिन ही हुए हैं। बच्चे का और उसका पूरा परीक्षण कायेदे के अनुसार हो रहा है, वह नर्स की सहायता से बच्चे को दूध पिलाना सीख रही है। ये सब प्राकृतिक होते हुए भी नवजात शिशु को अमृत पान कराने में कुछ असुविधाएँ लग रही हैं। रात वो सो नहीं पाती, दिन में लोगों का आना जाना लगा रहता है। लेकिन उससे मिलने नहीं आया था तो उसका पति, बच्चे का पिता। आखिर क्यों? यही एक प्रश्न डिम्पल को खाये जा रहा है। वो सोच समझ नहीं पा रही आखिर क्यों? उसके अगले कमरे में एक महिला ने, जो उसी की उम्र की है, एक कन्या को जन्म दिया है, उस बच्ची के पिता व परिवार के लोग, सभी बारी-बारी से वक़्त बेवक़्त देखने चले आते हैं। कभी कुछ खाने की चीजें ले कर कभी फल आदि लेकर। बच्ची कुछ कमज़ोर है लेकिन ठीक हो जायेगी माँ का दूध पीकर। उन लोगों ने तो बच्ची का नाम भी कमल रख लिया है और यहाँ डिम्पल का लाडला अभी तक बेबी डिम्पल ही कहला रहा है।

चौथा दिन लगा और नर्स ने आकर कहा कि सब ठीक चल रहा है। अगर डिम्पल चाहे तो घर जा सकती है।

डिम्पल नर्स के कन्धे पर सर रख कर फफक फफक कर रो पड़ी, सिसकियाँ बँध गयी। वो कुछ रुक-रुक कर बोली-

घर चली जाऊँ, पर घर है कहाँ?” पति तो मिलने तक नहीं आया, उसी की दहशत से घर के बाकी लोगों का भी व्यवहार अनुकूल कहाँ रह गया था। न वो पति, हरपाल की बातों में आती, ना आज ये सब देखना पड़ता। पंजाब के खन्ना शहर की रहने वाली, वो बी.ए. पास कर चुकी थी। हरपाल यहाँ से शादी के इरादे से गया था। अपनी बुआ से कहा एक अच्छी सी लड़की, पढ़ी लिखी देखें। बुआ को क्या खबर किसके मन में क्या है। वो कोई भूत-भविष्य पढ़ने वाली तो थी नहीं। पड़ोस में रहती डिम्पल उन्हें अच्छी लगी सो बात चलाई। हरपाल भी सुन्दरता में इतना रीझा कि चट मंगनी पट ब्याह हो गया। चलो माँ बाप तो गंगा नहाए, पर डिम्पल को भविष्य में क्या है विधाता के सिवा कौन जानता था। परिणय प्रेम सब अच्छा लगता है जब परवान चढ़ता है। वो कनाडा आ गई, चौदह महिनों के अन्दर ही।

हरपाल फ़ैक्ट्री के काम में लगा था, थोड़ी टैक्निकल ट्रेनिंग भी इन चार सालों में ले चुका था, सो सब काम ठीक चल रहा था। कमाई से कोई शिकायत नहीं थी। जब डिम्पल आई तो उसने सोचा पहले परिवार सम्भल जाये बाद में सब देखा जायेगा। पर हरपाल चाहने लगा परिवार तो कभी भी बढ़ा लेंगें, आमदनी बढ़ा लें। वो रोज़ डिम्पल को पढ़ाई करने को कहता। इधर डिम्पल माँ बनने वाली हुई, तो उसकी तबियत काफी खराब रहने लगी। उसे हर वक्त उल्टी, नींद, कमज़ोरी रहती। वो चाहती पति प्यार से चाय पिला दे। कभी प्यार करते करते सुला दे। वो खुद कुछ कर नहीं पाती, किन्तु हरपाल पर तो नशा चढ़ा था कमाई का। उससे ज़बर्दस्ती कालेज जाने को कहने लगा। ना जाने पर पहले ताने बाजी हुई फिर हाथा पाई तक बात आने लगी। उधर पीछे देश में वो माँ बहनों को कुछ ठीक से बता नहीं पाती, क्योंकि फोन हरपाल के सामने ही होता था। एक दिन पड़ोसन ने फोन कार्ड ला कर दिया, और अपने घर चलने को कहा। हरपाल की गैरहाजिरी में उसने सब कुछ कह डाला। उसका मन बड़ा कचोटता अगर वा हरपाल से छुपा कर कुछ भी करती। लेकिन वो क्या करे? माँ को सब बताया, पर इतने हज़ारों मल दूर बैठी साक्षात अन्नपूर्णा माँ भी बेटी की भूख प्यास नहीं मिटा सकी। रो-धो कर दिन आगे चलने लगे। अभी आई है वापस जा नहीं सकती, एक ननद है, वो कभी कभी आ जाती, भाई को समझाती पर क्या पुरुष इतनी जल्दी कोई बात समझते हैं भला?

उन्हें ये कौन समझाये कि एक कोमल तन मन की बेटी ला कर उस पर इतनी कठोरता करना क्या किसी पाप से कम है? वो उस पर इस तरह अधिकार जमाते हैं जैसे कोई ज़मीन का टुकड़ा उन्होंने खरीद लिया हो, और उस पर वो चाहे जैसे बोयें चाहे जब पानीं सींचें, चाहे जब उसे सूखी भूमि की तरह दरकने दें, उनकी मर्जी, उन्हें कौन बताये धरती बनी स्त्री प्रतिक्षण प्रतीक्षा में है उनके स्नेह वर्षा की।

कर्म फल तो भोगना ही होगा, कभी ना कभी सम्बन्ध है पति पत्नी का कभी कोई कभी कोई और इतना पवित्र सम्बन्ध और इतना अत्याचार, जागो हे नर वर्ग जागो!

नर्स ने बताया पास वाले कमरे में जो दूसरी स्त्री ने कन्या को जन्म दिया है उसे जौंडिस हो गया है। पूरे परिवार के लोग चिन्ता कर रहे हैं और उसे दूसरे अस्पताल में ले जाना पड़ेगा। कुछ दिन आई.सी.यू. में रखेंगे। माता-पिता बेहाल हैं। बच्ची का पिता तो माँ का साया भी नहीं छोड़ता। उनकी शादी को दो साल हो चुके थे, उनके बाकी घर के लोग यहाँ पहले से थे। कमल के माता पिता दोनों अपने बड़े भाई के स्पाँसर करन पर यहाँ आये थे। उनका कर्ज़ भी चढ़ा है, किन्तु दोनों के विचारों का ताल मेल बढ़ गया, जीवन की सीढ़ी धीरे धीरे चढ़ना चाहते हैं। उम्र भी कम नहीं तो परिवार में रुचि है वे कन्या पा कर धन्य हैं। समय देख कर गुजारा कर रहे हैं। जब उन्हें मालूम पड़ा कि डिम्पल के पास कोई नहीं तो कमल की माँ वीणा उसे धीरज बँधाने आई। उसने बताया कि यहाँ महिलाओं को सहारा देने के लिए कई योजनायें हैं। तुम अस्पताल में पूछो तो वो तुम्हारी सहायता कर देंगे। तुम हिम्मत से काम लो। क्यों ना तुम अपने बच्चे के साथ ही एक दो बच्चों की भी देखभाल शुरु कर दो। उसने एक दो संस्थाएँ बताईं और कुछ फोन नम्बर दिए और चली गई।

डिम्पल अपने एक माह के बच्चे के साथ अकेली है। उसे चिन्ता है, अपने बच्चे की चिन्ता है। मन में विरोध है, क्रोध है, अक्सर साँस लेती है तो हाय निकल जाती है। उसकी समस्यायें अनेक हैं घर बाहर का कैसे देखे? कब तक ऐसे चलेगा। पैसे है नहीं, पति है नहीं। लम्बा नीरस जीवन और नन्हा बालक। एक तो प्रसव पीड़ा दूसरे पति द्वारा परित्यक्ता। एक अलग समाज का निर्माण होगा ऐसे में। सम्भव है सिंगल मदर बन कर वो अच्छा पालन पोषण करले। हो सकता है किसी गलत काम में फंस जाये। रास्ता लम्बा है।

एक दोपहर यूँ ही बाजार में एक स्त्री से मुलाकात हुई उसने बताया यहाँ एक रेनबो इन्डिया के नाम से सामाजिक संस्था है। वो मदद करते हैं, उनके पास तुम जाओ। डिम्पल पता व टेलीफोन नम्बर लेकर घर आ गई। बच्चा जब अच्छे से सो गया तब फोन किया। फोन की कई घंटियाँ बजीं, किसी ने उठाया नहीं। उसने रसीवर रख दिया, वो सोचने लगी मदद तो मिल जाएगी पर हे परमात्मा क्या पूरा जीवन दूसरों की दया पर बिताना पड़ेगा? यही लिखा है भाग्य में? हिम्मत करके एक बार फिर नम्बर लगाया, उस तरफ से एक महिला बोलीं और सहानुभूति पूर्वक बातें करने लगीं। पता दिया और अगले सप्ताह आने को कहा।

अगला सप्ताह तो पंख लगा कर सामने उतर आया, वो कुछ देर के लिए सुखद कल्पना में चली गई। हर व्यक्ति को अपने रंगीन स्वप्न देखने की स्वतन्त्रता है, वो उन्हीं में डूब गई।

जब दफ़्तर पहुची तो मन में एक आशा के साथ ग्लानि भी थी, पर उसने निश्चय किया वो पीछे नहीं हटेगी। अपनी स्थिति से युद्ध करेगी। उसे विजयी होना है। ईश्वर उसके साथ है, वो एक पवित्र माँ है। प्रश्नों के उत्तर देते देते वो दो बार रो पड़ी. पानी का iगलास पी, बाकी प्रश्नों के उत्तर दिये कि हाँ पति ने शादी तो की है लेकिन बच्चा नहीं चाहिए, तो छोड़ दिया है। इस हाल में पहुँच गई अब सहायता चाहि़ए, एक बार अपने पैरों पर खड़े होने के लिए। कुछ काग़ज़ पढ़े, कुछ हसाक्षर किये, कुछ नियम कानून जानने के बाद ही ऑफ़िस की इंचार्ज जान पायेगी, निश्चय कर पायेगी कि क्या हो पाएगा, और वो फिर घर चली आई।

दफ़्तर में दोपहर के भोजन मध्यान्तर पर बातें छिड़ गयीं, क्या हो रहा है समाज में? कौन जिम्मेदार होगा इस तरह के पीड़ित बालपन के लिए? अफ्रीका जाकर तरह तरह की सहायता कर रहे लोग, अनाथ, बीमार बच्चों की देखभाल का दायित्व उठा रहे लोग, ज़रा यहीं देखो, कितना कुछ पड़ा है करने को। अपने चारों तरफ ही अपनी बहनों को सम्भालो, कैसी मानसिकता में दूध पिलाकर पाल रहीं हैं। रोज़ कुआँ खोदो, पानी निकालो वाली समस्याओं में क्या बच्चों का भविष्य होगा? जब माँ ही अत्याधिक क्षीण है, न धन, न तन, न ही मन- कुछ भी तो पर्याप्त नहीं उसके पास। क्या दे पायेगी बच्चे को?

जागो मानस जागो! मान करने वालो जागो! जहाँ माँ दुखी होगी कौन सुखी होगा? एक दिन जब तुम्हें अपनी करनी पर पछतावा होगा, कौन जाने ये बालक या बालिका मन में कौन सा सन्देश पाल रहा हो, जो विiक्षप्त समाज की रचना में भागीदार हो। सोचो! तुमने एक स्त्री का तिरस्कार नहीं किया पूरे समाज में विषाक्त भाव संचालित कर दिया है।।


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