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03.22.2008
 

सुस्त गधेराम
डॉ० भावना कुँअर


गधेराम थे सुस्त बड़े
सो जाते थे खड़े- खड़े।

भाता नहीं था कोई काम
हर पल करते थे आराम।

मालिक रोज़ उन्हें समझाता
गधे राम को समझ न आता।

मालिक कहते 'काम करोगे'
खूब फलोगे स्वस्थ रहोगे।

सुनते थे वो कान दबाये
बिना आँख से आँख मिलाये।

आज़ पड़े हैं वो बीमार
घुटने हो गये हैं बेकार।

टप-टप आँसू खूब बहाये
पर घुटनों से उठ ना पाये।

रोज़ ही करते गर वो काम
स्वस्थ ही रहते सुबहो शाम।


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