सुस्त गधेराम डॉ० भावना कुँअर
गधेराम थे सुस्त बड़े सो जाते थे खड़े- खड़े।
भाता नहीं था कोई काम हर पल करते थे आराम। मालिक रोज़ उन्हें समझाता गधे राम को समझ न आता। मालिक कहते 'काम करोगे' खूब फलोगे स्वस्थ रहोगे। सुनते थे वो कान दबाये बिना आँख से आँख मिलाये। आज़ पड़े हैं वो बीमार घुटने हो गये हैं बेकार। टप-टप आँसू खूब बहाये पर घुटनों से उठ ना पाये। रोज़ ही करते गर वो काम स्वस्थ ही रहते सुबहो शाम।