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| 10.05.2007 |
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रुलाया था बहुत तुमने,
जो मेरे दिल को तोड़ा था डॉ. भावना कुँअर |
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रुलाया था बहुत तुमने,
जो मेरे दिल को तोड़ा था
बनाया महल सपनों का,
सजाया मन के आँगन को
मेरे होने का दम भरके,
निभाई गैर से उल्फ़त
सजाया था बहारों से,
मेरे दुश्मन के दामन को
बिखरकर सूखती डाली,
नहीं अब कोई भी माली |
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