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10.06.2007
 

हाथ पकड़कर अनुज को अपने, जो चलना सिखलाते हैं
डॉ. भावना कुँअर


हाथ पकड़कर अनुज को अपने, जो चलना सिखलाते हैं
वही आदमी जग में सच्चे
, दिग्दर्शक कहलातें हैं।  

ठोकर लगने पर भी कोई, हाथ बढ़ाता नहीं यहाँ
सोचा था नन्हें बच्चों के
, पाँव सभी सहलाते हैं।

नन्हें बोल फूटते मुख से, तो अमृत से लगते हैं
मगर तोतली बोली का भी
, लोग मखौल उड़ाते हैं।

खुद तो लेकर भाव और के, बात सदा ही कहते हैं
ऐसा करने से वो खुद को
, भावहीन दर्शाते हैं।

हैं कुछ ऐसे उम्र से ज्यादा, भी अनुभव पा जाते हैं
और हैं कुछ जो उम्र तो पाते
, अनुभव न ला पाते हैं।


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