| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 10.06.2007 |
|
|
|
हाथ पकड़कर अनुज को अपने,
जो चलना सिखलाते हैं
ठोकर लगने पर भी कोई,
हाथ बढ़ाता नहीं यहाँ
नन्हें बोल फूटते मुख से,
तो अमृत से लगते हैं
खुद तो लेकर भाव और के,
बात सदा ही कहते हैं
हैं कुछ ऐसे उम्र से ज्यादा,
भी अनुभव पा जाते हैं |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|