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07.28.2007
 
स्मृति
डॉ. भारतेन्दु श्रीवास्तव

स्मृति साथी बन गई मेरी
जब एकाकी हो हुआ दुखित;
बन गई प्रेरणा उसी समय
था निराश मैं अरु पराजित।

रेशमी सेज बन कर आई
मानसिक हो गई सब क्लांति;
देवी बन कर है दान दिया
असहाय की अपार शक्ति।

कुछ क्षण को भी जब बिछुड़ी
यह, हो गया हमसे कुछ भी विस्मृति;
मन ही मन अति भयभीत हुए
दल दल में धँसे होकर चिन्तित।

विश्वास उठ गया तन मन से
हो गई बड़ी दयनीय स्थिति;
हर्ष पारावार में गोते लगे
लौटी जब हमारी प्रिय स्मृति।

क्रूर जुल्म, अन्याय भूलना है
’भारतेन्दु’ बड़ी भारी भ्रान्ति;
जुल्मों के ढाँचे गिरते हैं
जब स्मृति लाती है क्रान्ति।

’स्मृति’ वरदान न मिलता यदि
नर जाति न हो है पाती विकसित;
इस धरोहर के अभाव में
पशु सी हमारी होती प्रकृति।

स्मृति है वह अमूल्य पूँजी
सपने में भी न खोई जा सकती:
उगता इस उर्वरक शक्ति से ही
वट वृक्ष ज्ञान मानस धरती।


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