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| 07.28.2007 |
| सहगामी पथिक डॉ. भारतेन्दु श्रीवास्तव |
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सहगामी पथिक! बहुत दूर अभी जीवन पथ मंजिल, प्राची ऊषा की लालिमा तनिक न हुई धूमिल, विराम का समय नहीं प्रिये उठो, जीवन साथी दोनों साथ चलो। जान! जिधर जाए अनजान रास्ता उधर चलेंगे, थकन पैरों, चुभन काँटो की सहन मिल जुल करेंगे, प्राणाधिके अधिक न सोचो, अतीत वियोग अश्रु अब पोंछो। शीघ्र ही या विलम्ब से पुष्प वाटिका आएगी, अलि वृन्द मकरंद पान आनंद कराएगी क्षण दो क्षण हम कामासक्त होंगे दाम्पत्य क्रीड़ में अनुरक्त होंगे। कुसमित उपवन पार विटप बड़े विशाल, स्वादिष्ट फलाहार करेंगे जामुन रसाल, खट्टे मीठे बाँट कर खा लेंगे, फल रस पी प्यास बुझा लेंगे। तपे तर्णि धूप में जब, दोपहरी से क्लान्त, वर वृक्ष साये में शयन कर हो जाएँगे शान्त, सघन नहीं यदि प्राप्त पेड़ झिझरे, घाम परिणाम से अरमान होंगे बिखरे। प्रतीची में सूर्यास्त जब आएगी अन्तत: वेला, निशा निद्रा आने तक लगाएँगे प्रेम का मेला, स्मरण करते हुए चिर निद्रा सोएँगे, मंiज़ल पहुँचने तक साथी साहस न खोएँगे। |
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