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07.28.2007
 
दीवाली
डॉ. भारतेन्दु श्रीवास्तव

आज दीवाली है,
पर हम प्रयोगशाला में बैठे,
शोध कार्य करते हैं;
जैसी प्रणाली है,
कर श्रम बौद्धिक, हैं ऐंठे,
बोध मार्ग चरते हैं।

घड़ी शुभ, बड़े दिन की,
अद्रभुत रूप, टक टक बनाएगी,
अनुसंधान करना भूल जावेंगे;
जड़ी अपूर्व, संजीवन सी,
अनुमुदित मधु, धक धक चलेगी,
मधुपान तूल पावेंगे।

ताक में बौद्धिक,
तर्क सर्व, चुन चुन, रख कर,
कर से बजावेंगे ताली;
खाक हो अलौकिक,
वर्क गर्व, घुन घुन कर, चूषण,
नर निज अपनत्व खाली।

बदन सदन के
मन दीप में, विद्या ज्योति प्रदीप्त कर,
ज्ञान प्रकाश कर दो;
दमन गहन यह
तन तम को, राज्याभिषेक उद्दीप्त
भान, विकास भर जो।


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