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हो गई सन्ध्या स्व-नीड़ों में सभी खग लौट आये।
जल उठी बाती दिये में याद आई प्रिय ना आये।।
प्राण मन की बात मुख तक आज बरबस आ गई है।
हो रही बरसात है दिन रात लेकिन प्रिय ना आये।।
कण्ठ से स्वर स्वर से सरगम आज रूठे गीत मुझसे।
रूठ कर तुम मीत मेरे एक पल भर को ना आये।।
दुख भरी रतियाँ दुखे अखियाँ न कोई बात पूछे।
आह भर भर भीत आँसू सो गये पर प्रिय ना आये।।
यूँ लगा मुझको कि तुमने द्वार की साँकल बजाई।
किन्तु यह तो वेदना थी कल्पना थी प्रिय ना आये।।
यह विरह की यामिनी भी नागिनी सी डस रही है।
मैंने प्रिय कितना टेरा किन्तु ध्वनि सुन प्रिय न पाये।।
चाँद निकला चाँदनी भी मुस्कुराई है साथ पाकर।
राह में तज साथ मेरा आज तक तुम प्रिय ना आये ।।
यह सलोनी पूर्णिमा भी लग रही मुझको अलोनी।
खो गये हो तुम कहाँ किस राह पर जो प्रिय न आये।।
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