अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 
ज्योति
भगवत शरण श्रीवास्तव "शरण"

दीप की ज्योति प्रखर हो
आज तम से कह रही है
मैं तुम्हार तिमिर जीवन को
प्रकाशित कर रही हूँ।
हर दिये की ज्योति में
स्नेह मेरा ही जला है।
मैं तिमिर में पथिक की
सहचरी बन चल रही हूँ।
तिमिर न हो, ज्योति का
अस्तित्व कैसा सोच देखो
मैं तुम्हारी हर व्यथा को
हर्ष बन कर जल रही हूँ।
आज दीपावली सुहावन
दे रही अह्वान मधुरिम
हर दिये में प्रेम का
संदेश ले मैं जल रही हूँ।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें