भगवत शरण श्रीवास्तव 'शरण'

कविता
अंतर पीड़ा
अर्चना के पुष्प
अनुल्लिखित
अभिवादन
आस्था
एक चिंगारी
एक दीपक
कठिन विदा
कदाचित
काल का विकराल रूप
कुहासा
केवल तुम हो
कौन हो तुम
जो चाहिये
ज्योति
छवि
तुषार
तेरा नाम
नव वर्ष
नवल सृजन
नवल वर्ष
दिव्य मूर्ति
पावन नाम
पिता
पुष्प
प्रवासी
प्रेम का प्रतीक
प्रलय का तांडव
भाग्य चक्र
मन की बात
महारानी दमयंती महाकाव्य...
याद आई पिय न आये
लकीर
लगन
लेखनी में आज
वह सावन
विजय ध्वज
वीणा धारिणी
शरद ऋतु
श्रद्धा की मूर्ति
स्मृति मरीचि
स्वतन्त्रता
स्वप्न का संसार
हास्य
हिन्दी
होली आई
होली में ठिठोली
दीवान
होके अपना कोई क्यूँ छूट..

आलेख

मृग तृष्णा (समीक्षा)