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| 05.21.2007 |
| अर्चना के पुष्प भगवत शरण श्रीवास्तव "शरण" |
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दीप आशा का जलाना चाहता हूँ, अर्चना के पुष्प अर्पित कर तुम्हें, मधुर वीणा के स्वरों
झंकार में, हैं निरर्थक चमकते जग के प्रलोभन, |
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