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05.03.2012
 
अर्चना के पुष्प
भगवत शरण श्रीवास्तव "शरण"

दीप आशा का जलाना चाहता हूँ,
शब्द से मंदिर गूँजाना चाहता हूँ।
माँ तुम्हारे पद कमल की धूल लेकर,
भाल पर अपने लगाना चाहता हूँ।।

अर्चना के पुष्प अर्पित कर तुम्हें,
वन्दना के गीत गाना चाहता हूँ।
ज्ञान का उद्‌गम तुम्हीं से मात है,
ज्ञान की एक बूँद पाना चाहता हूँ।।

मधुर वीणा के स्वरों झंकार में,
गीत सुमनों को सजाना चाहता हूँ।
दो हमें आशीष जग सेवा करूँ,
मैं स्वयं को भूल जाना चाहता हूँ।।

हैं निरर्थक चमकते जग के प्रलोभन,
बस तुम्हारी भक्ति पाना चाहता हूँ।
लेखनी में शक्ति दे दो साधना की,
बस तुम्हारी "शरण" पाना चाहता हूँ।।


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