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05.21.2007
 
तीसरे बन्दर का मतलब
बसंत आर्य

मंत्री बनने के बाद मिले
तो गुलाब की तरह खिले खिले
सोफे में धंसे हुए
एकदम प्रसन्न थे
और हम उनकी मुद्रा देखकर
सन्न थे
आँखें बन्द थी
कान बन्द थे
पर मुँह खुला था
मानो गाँधीजी के तीनों बंदरों का
रूप मिला जुला था
पर दृष्य नायब था
क्योंकि तीसरा बन्दर गायब था
मैंने पूछा-- मंत्रीजी
क्या आपने अन्याय के खिलाफ
आवाज उठाने के लिए
मुँह खुला रखा है?
तो बोले--
हमारी आँखें बन्द हैं
क्योंकि अत्याचार हमें नहीं दिखता है
कान बन्द है
क्योंकि सुनाई नहीं देता
अगर कोई चीखता है
और बचा मुँह
तो आपका मन भी
बड़ा भोला है
अरे मुँह तो हमने
खाने पीने के लिये खोला है


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