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ISSN 2292-9754

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10.26.2016


औरत, घोड़ा और तलवार

मालवा में स्थित उतरी भारत की रियासत राजगढ़ को महाराजा उदयराज सिंह के पूर्वज महाराजा राज सिंह ने बसाया था। इसकी राजधानी उस समय चश्मा हुआ करती थी। परंतु महाराजा उदयराज सिंह के पिता महाराजा रणराज सिंह ने अपने शासनकाल के दौरान संगरूर को राजधानी बना लिया। उसने राजधानी से दस किलोमीटर की दूरी पर अपने रहने के लिए "राजगाह" नामक एक आलीशान महल भी निर्मित करवाया। राजधानी बदलने का मुख्य कारण रियासत पटियाला से पुश्तों से चलती आ रही अनबन थी। वैसे तो रियासत पटियाला के शासक और महाराजा उदयराज सिंह का कुल, 1168 ई. में जैसलमेर को बसाने वाले यादववंशी रावल जैसल भट्टी की सातवीं पीढ़ी में 1314 ई. में पैदा हुए महान योद्धा सिद्धू राव (जिससे सिद्धू-बराड़ों का वंश चला) से मिलता था। रियासत पटियाला और रियासत राजगढ़ के शासकों का बुज़ुर्ग हालाँकि एक ही था, पर कुछ राजनीतिक कारणों से दोनों रियासतों में दुश्मनी पड़ गई थी, जो लम्बे समय तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती गई। यह बैर पटियाला रियासत के संस्थापक बाबा आला सिंह और महाराजा उदयराज सिंह के बुज़ुर्ग महाराजा युवराज सिंह की मित्रता के उपरांत ख़त्म हुआ। दोनों रियासतों के सिद्धू सरदारों ने एक-दूसरे की रियासत में दख़लअंदाज़ी न करने की लिखित रूप में विशेष संधि भी की थी। महाराजा युवराज सिंह ने बाबा आला सिंह को बरनाला रियासत के नाम न केवल तीस गाँवों और चौरासिये (चौरासी गाँवों वाली रियासत मौजूदा संगरूर) पर कब्ज़ा करने में मदद की थी, बल्कि 1731 ई. में रायकोट के राय किला के साथ हुए युद्ध में भी भारी जंगी मदद दी थी।

महाराजा उदयराज सिंह अब काफ़ी वृद्ध हो चुका था। राजभाग का अधिक काम महामंत्री असलम बेग ही सँभालता था। वैसे भी अँग्रेज़ हुकूमत आने के कारण राजा-महाराजा केवल नाम के ही रह गए थे। रियासतों का सारा प्रशासनिक कार्य प्रधानमंत्री ही करते थे, जो कि अँग्रेज़ सरकार के विश्वासपात्र और पिट्ठू होते थे।

हाँ, महाराजा उदयराज का इकलौता पुत्र कुँवर हसरत राज सिंह भी प्रशासिनक और राजसी कार्यों में असलम बेग का पूरा हाथ बँटाता था। कुँवर हसरतराज सिंह अपने पिता की तरह था तो मध्यम क़द और गेहुँए रंग का, पर अँग्रेज़ माँ के पेट से पैदा होने के कारण नयन-नक़्श से बहुत आकर्षक व्यक्तित्व वाला था। राजकुमार हसरतराज सिंह युद्ध कला में निपुण और तीक्ष्ण बुद्धि का मालिक था। शिकार, शराब और शबाब का शौक़ उसको जुनून की हद तक था। उतनी स्त्रियों का संग तो हसरतराज सिंह के पिता, दादा ने अपनी पूरी ज़िन्दगी में भी नहीं किया होगा, जितनी स्त्रियों के हुस्न का हसरतराज सिंह अब तक अपनी तेईस-चैबीस साल की आयु में आनन्द ले चुका था।

हसरतराज सिंह की विलासी रुचियों को भाँपते हुए महाराजा उदयराज सिंह कई बार उसको विवाह कर लेने के लिए ज़ोर डाल चुके थे। पड़ोसी रियासत पटियाला से तो उसको रिश्ते का प्रस्ताव भी आया था। यद्यपि गोत्र एक होने के कारण यह रिश्ता संभव नहीं था। वैसे भी, हसरतराज सिंह ने हठ पकड़ रखी थी कि यदि वह विवाह करवायेगा तो कपूरथला की शहज़ादी गोबिंद कौर को भोगने के बाद ही करवायेगा।

शहज़ादी गोबिंद कौर दुआबा की सबसे शक्तिशाली और फौजी नुक़्ते से अहम मानी जाती रियासत कपूरथला के महाराजा निहाल सिंह की पुत्री थी। रियासत कपूरथला को भी रावल जैसल भट्टी की संतान यानी भट्टी राजपूत राणा कपूर ने बसाया था। पर इस रियासत का वर्तमान राज घराना सुल्तान-उल-क़ौम नवाब जस्सा सिंह आहलुवालिए के वंश में से था।

सरदार जस्सा सिंह आहलुवालिए ने अहमद शाह अब्दाली से मैदान-ए-जंग में दो हाथ करके मुग़लों के पतन के समय यह रियासत अब्दाली से जीती थी। इस वंश का बड़ा बुज़ुर्ग साधू सिंह (सदा सिंह) था। उसके पोते देवा सिंह के तीन पुत्र हुए। गुरबख़्श सिंह, सदर सिंह और बदर सिंह। जस्सा सिंह, बदर सिंह का पुत्र था जिसने आहलुवालिया मिसल चलाई। महाराजा निहाल सिंह गुरबख़्श सिंह के लकड़पोते फतह सिंह की औलाद थे।

शहज़ादी गोबिंद कौर को उसके माता-पिता ने बड़े लाड़-प्यार से पाला था। सुन्दर भी बहुत थी। शहज़ादी के हुस्न का डंका पूरे भारतवर्ष में ही नहीं, बल्कि इंग्लिस्तान तक भी बजा हुआ था।

शहज़ादी गोबिंद कौर के सगे भाई हिज़ हाईनेस, फरजंद-ए-दिलबंद, रसिक-उल-इतकाद-त-इंग्लिशिया, राजा-ए-राजगान रणधीर सिंह की ओर से आयोजित एक समारोह में शिरकत करने गए हसरतराज सिंह ने पहली बार शहज़ादी को देखा था। यह समारोह नहीं बल्कि एक खेल प्रतियोगिता थी। इसमें कुँवर हसरतराज सिंह ने महाराजा रणधीर सिंह की टीम को पोलो के मैच में क़रारी मात दी थी। इस सारे खेल को शहज़ादी ने बालकनी में बैठकर देखा था। खेलते हुए कुँवर हसरतराज सिंह का फ़ुर्तीलापन देखकर शहज़ादी भी उस पर मोहित होने से न बच सकी। हसरतराज सिंह को इनाम के तौर पर महाराजा निहाल सिंह द्वारा वायसराय की ओर से तोहफ़े में दी हुई सुनहरी मूठ वाली अंग्रेज़ी तलवार भेंट करनी थी। शहज़ादी ने अपने पिता से इसरार करके ख़ुद यह इनाम हसरतराज सिंह को अपने हाथों दिया था। तलवार पकड़ते हुए सहज ही हसरतराज सिंह के हाथों का शहज़ादी के हाथों से स्पर्श हो गया था। दोनों के अंदर उस पल एक अजीब सी झनझनाहट दौड़ गई थी।

कपूरथला से आकर कई दिन हसरतराज सिंह गोबिंद कौर के ख़्यालों में डूबा रहा था और पूरे दस दिन उसने न शराब को मुँह लगाया और न ही किसी स्त्री को। युवराज ने गोबिंद कौर से विवाह करवाने का पूर्ण निश्चय कर लिया था।

इस कार्य को पूरा करने का उदारदायित्व उसने महामंत्री असलम बेग को सौंप दिया था। असलम बेग की कपूरथला के प्रधानमंत्री ग़ुलाम गिलानी के साथ काफ़ी उठना-बैठना था। ग़ुलाम गिलानी पटियाला रियासत के प्रधानमंत्री नवाब सर लियाक़त खान का क़रीबी रिश्तेदार और नवाब सर सिकंदर हयात खान (जो बाद में पंजाब का प्रधानमंत्री बना) का भाई था।

यद्यपि मुगलों का राज कभी का ख़त्म हो चुका था, पर उसका प्रभाव अभी भी क़ायम था। सरकारी कामों और दस्तावेज़ों में उर्दू और फ़ारसी का प्रयोग किया जाता था। इस कारण बहुत सी हिंदू, राजपूत और सिक्ख रियासतों के अहलकार अधिकांशतः मुसलमान ही होते थे।

ग़ुलाम गिलानी से शहज़ादी के चरित्रहीनता के क़िस्से सुनकर कर असलम बेग ने जब मसाला लगाकर हसरतराज सिंह को सुनाये थे तो एक बार तो उसका दिल ही टूट गया था। उसके ज़ेहन में भूकम्प-सा झटका लगा था। हसरतराज सिंह को विश्वास ही नहीं हुआ था और उसने अपने कुछ विश्वासपात्रों से इसकी पड़ताल भी करवाई थी। लेकिन उन्होंने ने भी असलम बेग द्वारा दी गई जानकारी को ही सही ठहराया था।

दरअसल, शहज़ादी के कामुक स्वभाव के लिए कुछ हद तक उसका पिता महाराजा निहाल सिंह और उसका सगा भाई राजा-ए-राजगान रणधीर सिंह भी ज़िम्मेदार थे। वे आए दिन रास-रंग की महफ़िलें सजाते रहते थे और जवान हो रही शहज़ादी को उन्होंने प्रारंभ से ही सख़्त पहरे के अधीन रखा था। जनानखाने में महाराजा निहाल सिंह की रखैलों और दासियों के साथ शहज़ादी की अक्सर मुलाक़ात और बातचीत होती रहती थी। वह महाराजा के साथ बिताई रातों और संभोग क्रियाओं के क़िस्से चटखारे लेकर शहज़ादी को सुनाती रहती थीं। शहज़ादी द्वारा सब बातें स्वाद लेकर सुनने के कारण उसकी अपनी कामइच्छा भी भड़क उठती थी।

शहज़ादी के महल के दरवाज़े पर आम तौर पर बुज़ुर्ग पहरेदारों को ही लगाया जाता था। दाँव लगने पर शहज़ादी किसी भी पहरेदार को अंदर बुलाकर अपनी वासनापूर्ति कर लिया करती थी। अगर पहरेदार बुज़ुर्ग उसको पूरी तरह संतुष्ट करने में नाकाम हो जाए तो वह चमड़े के बने हंटर से पीट-पीटकर उसके बदन पर नील डाल दिया करती थी। शहज़ादी के आगे कोई भी बोलने का साहस नहीं करता। अगले दिन उस पहरेदार को बदल दिया जाता था और नये पहरेदार को लगा दिया जाता था। यदि कोई पहरेदार हाथ न आए तो शहज़ादी भोजन में नुक़्स निकालकर शाही बावर्ची को अपने महल में बुला लेती थी। यदि बावर्ची उसको जच जाए तो शहज़ादी उसको बिस्तर पर दबोचने में ढील नहीं करती। यदि बावर्ची अच्छा न लगे तो भोजन से भरे हुए थाल बावर्ची के मुँह पर आ बजते थे। कई बार तो हालात ऐसे बन जाते थे कि शहज़ादी के लिए किसी भी मर्द को हाथ डालना असंभव हो जाता था। उस स्थिति में शहज़ादी अपनी तीन चार चहेती दासियों को बुलाती थी और कपड़े उतारकर अपने साथ लेटने का हुक़्म देती थी। निर्वस्त्र होकर दासियाँ अलफ़ नग्न शहज़ादी के साथ लेट जाती थीं। कोई उसकी जांघों को सहलाती थी। कोई उसकी पीठ चूमती थी। कोई उसके होंठों से अपने होंठ लगाकर चूमने लग जाती थी। कोई उसके गुप्त अंगों के साथ छेड़छाड़ करके उसकी लिंगक भूख को अपने-अपने तरीक़े और अप्राकृतिक ढंग से मारने का यत्न करती थी। फ़ुरसत के समय अक्सर शहज़ादी दासियों से अपने स्तनों पर बादामरोगन की मालिश करवाती रहती थी।

एक दिन एक दासी ने शहज़ादी से पूछ लिया, "राजकुमारी जी, हर रोज़ छातियों पर मालिश करवाने की क्या ज़रूरत है? आपकी छाती तो ईश्वर की दया से पहले ही बहुत उभरी हुई है।"

"मेरे अंदर एक लावा खोल रहा है, जिसको मैं ठंडा करने की कोशिश करती हूँ। मैं अपने अंदर की जिस्मानी हवस की आग पर जितना पानी डालती हूँ, यह उतना ही अधिक भड़कती थी। मैं चाहती हूँ, जब भी कोई मर्द मुझे देखे तो बस मेरे संग सोने के लिए तड़प उठे। जब दुनिया का कोई भी मर्द पराई स्त्री को देखता था तो सबसे पहले उसकी निगाह औरत की छाती पर ही पड़ती थी। चेहरे को तो बाद में देखता था। मर्द को काम के लिए उकसाने का सबसे बड़ा हथियार और साधन स्त्री के पास छाती ही होता था। यह वह अंग है जिससे दुनिया में आने वाले हर मर्द का किसी औरत से पहला स्पर्श होता था। हालाँकि दूध चुंघाने वाली वह औरत उसकी माँ ही होती थी। सो, इसलिए मैं अपने स्तनों को सुडौल और प्रसिद्ध अलफांसों आमों जैसे बने देखने की इच्छुक हूँ," शहज़ादी की अंतरात्मा से जैसे आवाज़ निकली।

इस प्रकार राजकुमारी अस्थायी तरीक़ों से अपनी काम वासना को पूरा करने का यत्न तो करती, पर उसकी पूर्ण तृप्ति न होती। उसको कोई स्थायी पुरुष चाहिए था जो उसकी लिंगक भूख को दिन रात बिना किसी रोकटोक के मिटा सके। इसलिए जब शाही परिवार ने शहज़ादी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा तो शहज़ादी ने फौरन हाँ कर दी।

नौकरों के साथ संबंधों की अफ़वाहों के कारण शहज़ादी काफ़ी बदनाम हो चुकी थी। शहज़ादी की कामपुतली के तौर पर हुई प्रसिद्धि या दुर्भाग्य कह लो कि किसी भी शाही या उच्च घराने में उसका रिश्ता करना असंभव हो गया। बड़ी जद्दोजहद के उपरांत शहज़ादी के लिए बड़ा ही नेक और धार्मिक ख़यालों का अमीर व्यक्ति तलाश लिया गया।

कपूरथला रंग महल में रंग-रलियों का आनन्द उठाने की आदी हो जाने के कारण शहज़ादी ने विवाह के लिए राज़ी होने के समय एक शर्त रख दी कि विवाह के बाद वह कपूरथला में ही रहेगी और अपने ससुराल करतारपुर में नहीं जाएगी, जो कि कपूरथला से दस मील की दूरी पर है।

शहज़ादी की ससुराल की ओर से उसकी शर्त मान ली गई। महाराजा ने बेटी-दामाद को गोलखाना (शाही महल) के क़रीब ही एक अन्य महल बनवा दिया। महाराजा ने शहज़ादी की वासनाओं को नथ डालने के लिए इस छह मंज़िले महल के अंदर जाने और आने के लिए केवल एक ही दरवाज़ा लगवाया। उस दरवाज़े पर भी सख़्त पहरा। इस महल की पहली मंज़िल पर शाह-नशीन (बालकोनी) थी। जिसके चारों ओर विशेष पर्दे लगवाये गए, जिनमें से अंदर से बाहर देखा जा सकता था, पर बाहर से अंदर कुछ भी नज़र नहीं आता।

शहज़ादी अक्सर दिन भर इस शाहनशीन में बैठी आते-जाते लोगों को देखती रहती थी। शहज़ादी का मन अपने पति से पहले दिन से ही न भीजा। दोनों के विचारों में ज़मीन-आसमान का अंतर था। शहज़ादी हद दर्जे की लुच्ची और बेहया थी। उसका पति धार्मिक विचारधारा का मालिक और संकोची स्वभाव का था। किसी न किसी बात को लेकर उनके बीच अक्सर अनबन रहने लगती थी।

शहज़ादी के महल में उसके पति के सिवाय अन्य किसी मर्द को जाने की आज्ञा नहीं थी। शहज़ादी दिनभर महल में बिना कोई वस्त्र पहने टहलती रहती थी। एक दिन शहज़ादी के पति ने उसको खीझकर कह ही दिया, "यह क्या बेहूदा हरकतें हैं? सारा दिन नंगी घूमती फिरती हो, कपड़े तो पहन लिया कर।"

"कपड़ों के अंदर भी तो हम नंगे ही होते हैं! आपको मुझे इस तरह देखना अच्छा नहीं लगता तो आँखों पर पट्टी बाँध लो या इधर मत आया करो," शहज़ादी गरजकर बोली।

बस, उस दिन से शहज़ादी का पति नाराज़ हो गया और उसी दिन से उनके शारीरिक संबंध ख़त्म हो गए। उसका पति शहज़ादी का महल छोड़ कर बारांदरी महल में रहने लग पड़ा। कभी-कभार वह शहज़ादी से मिलने दिखावे के तौर पर चला जाता। पर शहज़ादी उसकी ओर विशेष दिलचस्पी न लेती। आहिस्ता-आहिस्ता पति का शहज़ादी के पास जाना कम होता गया। शहज़ादी का पति तो अपने हाल पर संतुष्ट था। उसको शाही परिवार का दामाद होने के कारण मान-सम्मान मिल रहा था, वह उसी हाल में खुश था। लेकिन शहज़ादी अपनी ही आग में जलती-सुलगती रहती थी।

शहज़ादी के महल के क़रीब बने दीवानखाने में प्रधानमंत्री ग़ुलाम गिलानी मंत्रीमंडल की बैठकें लगाया करता था। ग़ुलाम गिलानी अरबी मूल के मुसलमानों के अंश में से था, जो हिंदुस्तान पर हुए हमलों के समय भारत में बस गए थे।

महल की छत पर बाल सुखाते हुए एक दिन हिज़ एक्सलेंसी ग़ुलाम गिलानी और शहज़ादी की आँखें चार हो गईं। शहज़ादी उसको देखकर मुस्करा पड़ी। यद्यपि ग़ुलाम गिलानी विवाहित था और उसके पास अपनी बेगमों का एक अलग हरम भी था, पर शहज़ादी की सुन्दरता के डंक से वह बच न सका।

ग़ुलाम गिलानी उसी दिन से शहज़ादी को मिलने की योजनाएँ बनाने लग पड़ा। शहज़ादी के महल के इर्दगिर्द लगे सख़्त पहरे के कारण उसका कोई वश नहीं चल पा रहा था। कई दिन शहज़ादी और ग़ुलाम गिलानी की इशारेबाज़ी चलती रही। ग़ुलाम गिलानी शहज़ादी की खूबसूरती और दिलकशी की ओर अधिक खिंचने लगा। आखि़र, बड़ी सोच-विचार के बाद ग़ुलाम गिलानी ने दीवानखाने के पास से शहज़ादी के महल को जाती एक सुरंग ख़ुदवानी प्रारंभ कर दी। सुरंग का नक्शा तैयार करने में ग़ुलाम गिलानी को थोड़ा-सा भ्रम लग गया। सुरंग महल के उस कमरे में निकल गई जो हिज़ हाईनेस रणधीर सिंह की दासियों का हरम था। सुरंग खोदने वाले पकड़े गए। पर ग़ुलाम गिलानी के डर से उन्होंने उसका नाम नहीं बताया और ख़ुद सजायें भुगत लीं।

इस घटना के बाद ग़ुलाम गिलानी शहज़ादी को मिलने के लिए और अधिक उतावला हो उठा। सुरंग खोदे जाने के कारणों की छानबीन रियासत के ही उच्च वज़ीर रामजस दास ("महाराजा" पुस्तक के रचयिता दीवान जर्मनी दास का पड़पौता और दीवान मथरा दास का पिता) को सौंप दी गई। सुरंग क्योंकि दीवानखाने के साथ निकलती थी, इसलिए रामजस दास के शक़ की सुई ग़ुलाम गिलानी पर आकर रुक गई। उसने ग़ुलाम गिलानी की गतिविधियों पर पूरी नज़र रखनी शुरू कर दी। शहज़ादी की नौकरानी मूलो का शाही खानसामे अमंत खान से इश्क़ चलता था। अमंत खान की रामजस दास के वफ़ादार और घरेलू नौकर अली मुहम्मद के साथ गहरी दोस्ती थी। अमंत खान के माध्यम से रामजस दास ने शहज़ादी पर नज़र रखने की जिम्मेदारी मूलो की लगा दी।

दिन अच्छे-भले गुज़रने लगे। शहज़ादी को मिलने के लिए ग़ुलाम गिलानी तो मछली की भाँति तड़प ही रहा था, उधर शहज़ादी भी मर्दाना स्पर्श के लिए बेताब हुई पड़ी थी। वह अपनी नौकरानी मूलो के हाथ संदेशे भेजकर ग़ुलाम गिलानी को मिलने के लिए कोई जुगत बनाने के लिए ज़ोर डालती थी।

ग़ुलाम गिलानी ने काफ़ी सोच-विचार के बाद एक तरक़ीब निकाल ली। उसने मूलो के हाथ संदेशा भेजकर अपनी सारी जुगत शहज़ादी तक पहुँचा दी। शहज़ादी को ग़ुलाम गिलानी का मंसूबा जंच गया और उसका पालन करने की शहज़ादी ने अपनी सहमति प्रकट कर दी। मूलो ने ग़ुलाम गिलानी और शहज़ादी की मिलने के लिए बनाई योजना अमंत खान के माध्यम से वज़ीर रामजस दास तक पहुँचा दी।

तय योजना के अनुसार ग़ुलाम गिलानी की दो घोडि़यों से खींची जाने वाली बग्घी शहज़ादी के महल के पास जा खड़ी हुई। बग्घी की पिछली सीट के नीचे एक लकड़ी का बड़ा-सा बक्सा बना हुआ था। इसमें घोड़ियों के लिए चारा रखा जाता था इसलिए इसे चारा पेटी कहते थे। शहज़ादी ने नौकरानी मूलो के साथ अपने कपड़े बदले और नौकरानी के भेष में महल से बाहर निकल आई। बाहर आकर शहज़ादी बग्घी की चारापेटी में घुस गई। पेटी का ढक्कन बंद करके बग्घी वहाँ से चल पड़ी।

जब बिना किसी रोक-टोक के बग्घी शाही महल की सीमा से बाहर आ गई तो ग़ुलाम गिलानी के दिल में गुदगुदी उठने लगी। उसने अफ़ीम की मोटी गोली और संखिये से तैयार की गई औषधियों की एक खुराक शराब के प्याले के साथ गले से नीचे उतार ली। बग्घी शहर से बाहर निकलकर जलंधर की ओर जाते मार्ग पर पड़ गई। वहाँ से बारह मील दूर जलंधर जाने को पूरे दो घंटे लगते थे। ग़ुलाम गिलानी ने इस यात्रा को तेज़ करने के लिए रास्ते में दो जगह घोड़े बदलने का प्रबंध किया हुआ था।

पहले पड़ाव पर जब घोड़े बदले गए तो ग़ुलाम गिलानी ने चारापेटी में से शहज़ादी को बाहर निकालकर बग्घी में अपने संग बिठा लिया। बग्घी के चलते ही शहज़ादी पर रौब डालने के लिए ग़ुलाम गिलानी ने शहज़ादी को अपना ताज़ा सोने का बना हुक्का पेश किया जिसमें लखनऊ से मँगवाया विशेष सुगंधित तम्बाकू भरा हुआ था। शहज़ादी ने हुक्का पीने से कोरा जवाब दे दिया और पास में पड़ी शराब देखकर शराब पीने की इच्छा प्रकट की। यह सुनकर ग़ुलाम गिलानी गदगद हो गया और उसने शहज़ादी से अपने और शहज़ादी के लिए दो जाम बनाने की फ़रमाइश की। शहज़ादी ने दो जाम बनाये और एक ग़ुलाम गिलानी को दिया और उसके जाम से अपना जाम टकराकर गटागट एक ही साँस में पैमाना खाली करके रख दिया। यह देखकर ग़ुलाम गिलानी ने भी फ़ुर्ती से अपनी शराब पी और बाँह से पकड़कर शहज़ादी को अपनी गोद में बिठा लिया। शहज़ादी की माथे पर बिखरी लटों को सँवारता हुआ ग़ुलाम गिलानी बोला, "राजकुमारी जी, जिस भी पीर-मुहम्मद को याद करना है, अब कर लो।"

"क्यों?"

"क्योंकि आज ग़ुलाम गिलानी आपकी चीखें निकाल देगा।"

यह सुनकर शहज़ादी खिलखिलाकर हँसती हुई कहने लगी, "यह तो वक़्त ही बतायेगा महामंत्री साहिब। कहीं यह न हो, मैं प्यार में आपको मार ही दूँ। आप तमाम ज़िन्दगी आह भरने योग्य भी न रहो।"

"अच्छा? देखते हैं फिर," ग़ुलाम गिलानी ने शहज़ादी को कसकर बाँहों में भर लिया और उसके होंठ चूसने लग पड़ा।

इतने में घोड़े बदलने का दूसरा पड़ाव आ गया और बग्घी रुक गई। घोड़े फुर्ती से बदले गए। बग्घी अभी चलने ही लगी थी कि वज़ीर रामजस दास और दस-बारह मिलेट्री वालों ने बग्घी को आ घेर लिया। ग़ुलाम गिलानी बाहर निकलकर वज़ीर रामजस दास से मिला। रामजस दास कोई आवश्यक काम बताकर ग़ुलाम गिलानी को संग ले गया। ग़ुलाम गिलानी ने अपने ताबेदारों को बग्घी पहले से तय की गई मंज़िल पर ले जाने के लिए कहा।

बग्घी शहज़ादी को लेकर जलंधर के लिए अपना सफ़र प्रारंभ कर दिया। ग़ुलाम गिलानी, वज़ीर रामजस दास और मिलेट्री वालों के साथ चला गया।

बग्घी में अकेली बैठी शहज़ादी हुक्का और शराब पीती हुई जलंधर के उस बंगले में पहुँच गयी, जो ग़ुलाम गिलानी ने शहज़ादी के जोबन का आनन्द लेने के लिए पहले से सुरक्षित कर रखा था। उधर वज़ीर रामजस दास बिना मतलब ग़ुलाम गिलानी के तीन-चार घंटे ख़राब करवाकर उसको भेज दिया।

ग़ुलाम गिलानी गोली की भाँति शहज़ादी के पास पहुँचा। शहज़ादी और ग़ुलाम गिलानी उतावले होकर कपड़े उतारकर अभी एक-दूसरे से लिपटे ही थे कि राजा-ए-राजगान रणधीर सिंह, वज़ीर रामदस दास और दस-बारह मिलेट्री वाले ग़ुलाम गिलानी का पीछा करते हुए वहाँ आ धमके।

शहज़ादी और ग़ुलाम गिलानी को गिरफ्तार कर लिया गया। महाराजा रणधीर सिंह के बायें हाथ में रायफल थी। बाजू पर बँधे नादिर शाह द्वारा भेंट किए गए पुखराज हीरे वाली दायीं बाँह के उलटे हाथ से उसने ग़ुलाम गिलानी को एक ज़ोरदार थप्पड़ मारा। ग़ुलाम गिलानी की हीरे मोतियों से जड़ी सुनहरी ब्रितानवी राज जैसी टोपी उछलकर दूर जा गिरी। मिलेट्री वालों ने ग़ुलाम गिलानी को गिराकर पीटते हुए रुई की तरह धुन दिया। ग़ुलाम गिलानी को जलावतन करने का आदेश देकर हिज़ हाईनेस रणधीर सिंह, शहज़ादी को पीटता हुआ घसीटकर कपूरथला ले आया।

शहज़ादी के महल से बाहर पैर रखने पर पाबंदी लग गई। पीट-पीटकर पिलपिली की हुई शहज़ादी की जब चीखें निकलीं तो उसको शाही ज्योतिषी का कहा हुआ कथन स्मरण हो आया, "ईश्वर हर प्राणी के अंदर बसता है। चैबीस घंटों में एक ऐसा पल आता था जब मनुष्य के मुँह से निकली हुई हर बात सच हो जाती है।"

इस बात को याद करते हुए शहज़ादी को बग्घी में ग़ुलाम गिलानी के साथ हुई वार्ता वाले वचन स्मरण हो आये, "...आज ग़ुलाम गिलानी आपकी चीखें निकलवा कर छोड़ेगा। ... कहीं यह न हो कि मैं आपको मार ही दूँ। आप तमाम ज़िन्दगी आह भरने योग्य न रहो।..."

ठीक वैसा ही हुआ। शहज़ादी की चीखें भी निकलीं और ग़ुलाम गिलानी आह भरने योग्य भी न रहा।... कुछ दिन शहज़ादी न कुछ खाती थी और न ही कुछ पीती थी। बस, दिन रात ग़ुलाम गिलानी को याद करके रोती रहती थी। फिर, ख़ुद ही वह ग़ुलाम गिलानी को भूल जाती थी, क्योंकि ग़ुलाम गिलानी से उसका प्यार नहीं था। केवल शारीरिक आकर्षण ही था। कुछ दिनों के बाद सब कुछ पहले की भाँति हो गया। शहज़ादी अपनी दासियों के साथ अपना मन बहलाकर ही संतोष करने लगी थी।

कर्नल वरियाम सिंह रियासत की शाही फौज का उच्च अधिकारी था। उसके पूर्वजों ने रियासत के हाकिमों की कई पीढ़ियों से ख़िदमत की थी। शाही महल पर तैनात मिलेट्री की सारी ज़िम्मेदारी और शाही परिवार की सुरक्षा का सारा प्रबंध उसी के हाथ में था।

एक दिन शहज़ादी हिज़ हाईनेस की आज्ञा से किसी आवश्यक काम के लिए बग्घी में बैठकर जाने लगी तो उसका घोड़ा बिगड़ गया। रथवान उसे नियंत्रित नहीं कर पाया और घोड़ा अपने आप बग्घी को किसी दूसरी दिशा में खींचकर ले जाने लगा। रथवान और शहज़ादी शोर मचाने लगे। वरियाम सिंह उस वक़्त शहज़ादी के महल पर तैनात सुरक्षा का जायज़ा लेने के लिए पहुँचा हुआ था। उसने तुरंत बग्घी के पीछे घोड़ा दौड़ाया और शहज़ादी को बचा लिया। वरियाम सिंह ने रथवान को काफ़ी डाँटा-फटकारा। उस पल से शहज़ादी वरियाम सिंह पर आशिक़ हो गयी।

अगले दिन वरियाम सिंह को गुप्त मुलाकात के लिए शहज़ादी ने आमंत्रित किया तो वरियाम सिंह अपने आप पर नियंत्रण रखने में असमर्थ हो गया। वह शाही घराने का दामाद बनने के सपने देखने लगा। कई दिन दासियों के माध्यम से वरियाम सिंह और शहज़ादी के बीच पत्र-व्यवहार और संदेशों का आदान-प्रदान का सिलसिला चलता रहा। पर मिलने का कोई बहाना नहीं बना। दिन-रात शहज़ादी के ख़त पढ़-पढ़ कर वरियाम सिंह मचल उठता था। शहज़ादी के महल के इर्दगिर्द सख़्त पहरा था और वरियाम सिंह को अंदर प्रवेश करने की आज्ञा नहीं थी। ग़ुलाम गिलानी वाले क़िस्से के बाद शहज़ादी के बाहर जाने पर भी सख़्त पाबंदी लगी हुई थी। शहज़ादी और वरियाम सिंह दोनों ही एक दूसरे को बाँहों में भर लेने के लिए व्याकुल हो रहे थे।

एक दिन शहज़ादी की नौकरानी बसंती ने राह निकाली और सारा मंसूबा वरियाम सिंह को समझा दिया। शहज़ादी के महल के पिछवाड़े एक कुआँ था जो महल की चार-दीवारी से लगता था। वरियाम सिंह ने रात में दीवार में सेंध लगा ली जो कुएँ में जाकर निकलती थी। शहज़ादी ने वरियाम सिंह के सीटी बजाने पर एक रस्सी कुएँ में लटका दी जिसे पकड़कर वरियाम सिंह डोल में खड़ा हो गया और शहज़ादी ने अपनी भरोसेमंद दासियों की मदद से उसको ऊपर खींच लिया।

दबे पाँव वरियाम सिंह को अपने निजी कमरे में ले जाकर शहज़ादी ने सारी रात अपनी वासनापूर्ति की और तड़के मुँह अँधेरे ही उसी तरह कुएँ में उसको वापस उतार दिया। वरियाम सिंह ने सेंध की ईंटें उसी तरह चिन दीं और बाहरी दीवार पर गिली मिट्टी पोत दी। यूँ शहज़ादी और वरियाम सिंह के मिलने का सिलसिला हर रात चलने लग पड़ा।

वरियाम सिंह नित्य सूर्य ढलने की प्रतीक्षा करता रहता। रात गहरी होते ही वह शहज़ादी के कमरे में जा उपस्थित होता। वहाँ शहज़ादी दिन भर इत्र वाले जलकुंड में नहाने के लिए निकलती और बदन पोंछकर वरियाम सिंह के स्वागत के लिए झिलमिलाती कामोत्तेजक पारदर्शी पोशाक पहने सजी धजी बैठी होती। राजस्थानी कढ़ाई वाले सिरहाने और सिल्की चादरें गोल घूमने वाले इतालवी पलंग पर बिछी होंती। खूबसूरत फ्रांसिसी अगरबत्ती सुलग रही होंती।

वरियाम सिंह के उपस्थित होते ही दासियों द्वारा रूहकेवड़ा छिड़ककर गुलाब और चमेली के फूल सेज-मल्हार पर बिखेर दिए जाते। शहज़ादी वरियाम सिंह के एक-एक कर वस्त्र उतार देती। वरियाम सिंह अपनी बाँहों में उठाकर शहज़ादी को सेज पर लिटाता और उसे चूमने चाटने लग पड़ता। वरियाम सिंह को ख़ुद अपने कपड़े उतारने की मनाही होती। शहज़ादी भी वरियाम सिंह का तन-बदन दाँत गड़ा-गड़ाकर काटने लग जाती। यह क्रिया तब तक चलती रहती जब तक शहज़ादी अपने आप पर नियंत्रण रख सकती। जब शहज़ादी की कामाग्नि पूरी तरह भड़क उठती और उससे और अधिक सब्र नहीं होता तो शहज़ादी वरियाम सिंह के वस्त्र फाड़कर तार-तार कर देती। वहशीयाना ढंग से वह वरियाम सिंह को नीचे लिटाकर पूरी रात भोगती रहती।

पौ फूटते ही दासियाँ वरियाम सिंह को महल में से निकाल देतीं। शहज़ादी मृत-सी निढाल हुई दोपहर तक सोती रहती। पूरे दो वर्ष यह सिलसिला चलता रहा। दुर्भाग्य से सावन की ऋतु में कई दिनों तक पानी बरसता रहा। सेंध में चिनी हुई ईंटों पर नित्य पोती हुई मिट्टी पानी में गलकर उतर जाती। कपूरथला सरकार के गृह मंत्री सरदार दानिशमंद ने उस सेंध को देख लिया और उसको शक़ हो गया। उसने उस पर अपनी नज़र रखना प्रारंभ कर दिया। एक रात उसने वरियाम सिंह को महल के अंदर जाते देख लिया। वरियाम सिंह से उसकी पहले ही लगती थी। उसने तुरंत जाकर यह बात महाराजा रणधीर सिंह को जा बताई। अपनी बहन की बदचलनी के क़िस्से सुन-सुनकर महाराजा रणधीर सिंह ऊब चुका था। कहाँ वो है जिसने अँग्रेज़ सरकार से अनेक तमगे और पदवियाँ प्राप्त करके खानदान का नाम रोशन किया है और कहाँ गोबिंद कौर है जिसने आहलूवालियों के वंश के सुनहरी इतिहास को मिट्टी में मिलाने की ठान रखी है।

क्रोध में आकर महाराजा रणधीर सिंह वो तलवार उठायी जो नादिरशाह ने उसके दादा फतह सिंह को दोस्ती के नज़राने के तौर पर भेंट की थी। शहज़ादी और वरियाम सिंह को रंगे-हाथों पकड़ने के लिए कुछ सिपाहियों के साथ महाराजा रणधीर सिंह शहज़ादी के महल की ओर चल पड़ा। शहज़ादी की दासी को इस बारे में पहले ही पता चल गया और उसने एक गुप्त ज़मीदोज़ सुरंग के रास्ते शहज़ादी और वरियाम सिंह को पहले ही महल में से बाहर भगा दिया।

वरियाम सिंह और गोबिंद कौर पैदल चलते हुए बीस कोस का राह तय करके सुल्तानपुर के निकट कल्याण नाम के एक गाँव में पहुँच गए। यह गाँव अँग्रेज़ सरकार के इलाक़े में पड़ने के कारण उन्हें कपूरथला सरकार के सिपाहियों द्वारा पकड़े जाने का भय न रहा।

यहाँ एक घर में शरण लेकर वरियाम सिंह ने अपने घर वालों से सम्पर्क किया। पर कपूरथला सरकार के भय के कारण उन्होंने साथ देने से इन्कार कर दिया। उधर कपूरथला सरकार द्वारा शहज़ादी को बेदख़ल करके उसको धन, जेवरात, अलाउंस आदि और अन्य सुख-सुविधाओं से महरूम कर दिया गया। अब उनके पास गुज़ारे के लिए कोई कानी-कौड़ी भी नहीं थी। उन्होंने कल्याण के एक जुलाहे के घर शरण ले ली।

गाँव में हीरा सिंह नाम के एक धनाढ्य व्यक्ति का अस्तबल था। वरियाम सिंह, हीरा सिंह के पास नौकरी माँगने गया। संयोगवश हीरा सिंह ने मैसूर से एक चितकबरा घोड़ा खरीदा था। इस नये घोड़े की सवारी करना तो दूर की बात, कोई काठी डालने में भी सफल नहीं हुआ था। हीरा सिंह से इजाज़त लेकर वरियाम सिंह ने घोड़े पर काठी डालने का यत्न किया। कुछ देर की मशक्कत के बाद घोड़ा वरियाम सिंह के क़ाबू में आ गया। यह देखकर हीरा सिंह ख़ुश हो गया और प्रसन्न होकर उसने न केवल वरियाम सिंह को अपने अस्तबल में नौकरी दे दी, बल्कि वह चितकबरा घोड़ा भी इनाम के तौर पर वरियाम सिंह को यह कहकर दे दिया, "बरखुरदार, जी-जान लगाकर हमारी सेवा कर। सयाने कहा करते हैं, रन्न (औरत), घोड़ा और तलवार, जिसके हों पास उसके ही होते यार... हमें यह अड़ियल घोड़ा क्या करना है, ले जा तुझे दे दिया।"

वरियाम सिंह और शहज़ादी कल्याण गाँव में एक कच्चे मकान में खेती और अस्तबल की नौकरी करके गुज़ारा करने लगे। शहज़ादी को महल के सुख, आराम छिन जाने से कोई अधिक अंतर नहीं पड़ा। उसके लिए तो "कुल्ली यार दी सुरग (स्वर्ग) दा झूटा, अग्ग लावां महलां नूं" (यार की झोंपडी, स्वर्ग के झूले के समान, आग लगाऊँ महलों को) वाली बात थी। वरियाम सिंह शहज़ादी की शारीरिक भूख शांत करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ता।

एक दिन वरियाम सिंह लुधियाना रियासत की ओर पड़ने वाले जंगल में हीरा सिंह के साथ शिकार खेलने गया और जंगल में उसको बेहोश हुआ एक नौजवान मिला। वरियाम सिंह उसकी नब्ज़ टटोलकर देखी जो अभी चल रही थी। वह नौजवान को अपने संग घर ले आया और वैद्य बुलाकर उसका इलाज करवाया। नौजवान की कमर के साथ बँधी अँग्रेज़ी तलवार देखते ही गोबिंद कौर पहचान गयी कि यह रियासत राजगढ़ का वारिस राजकुमार हसरतराज सिंह है। शहज़ादी भी उसकी तीमारदारी में जुट गई। आधी रात होने पर शहजादा हसरतरात सिंह को होश आ गया।

अगली सुबह हुई। वरियाम सिंह की लाश में सुनहरी मूठ वाली अँग्रेज़ी तलवार घुपी हुई थी और दूर उड़ती धूल में चितकबरे घोड़े पर सवार शहज़ादी गोबिंद कौर और कुँवर हसरतराज सिंह किसी अज्ञात मंज़िल की ओर जाते हुए दिखाई दिये।


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