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ISSN 2292-9754

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03.19.2016


मदहोश

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विवाह के पश्चात चन्नी के दिन ग़मगीन और रातें शोकमयी हो गईं। हर समय आँसू उसकी पलकों का बाँध तोड़कर बाहर आने को होते। इंग्लैंड आकर तो वह कुछ अधिक ही उदास रहने लगी। हर समय वह अपने आप में खोयी-खोयी रहती।

सुख ने सोचा, शायद चन्नी को माता-पिता से जुदा होने का दुख है। विवाह के उपरांत ससुराल घर आई हर लड़की का प्रायः यही दुखांत होता है। इसलिए चन्नी ने तो बाबुल का घर छोड़ने के साथ-साथ अपना देश भी त्यागा था। इसलिए उसका कुछ उदास होना स्वाभाविक था। सुख ने सोचा, रफ़्ता-रफ़्ता सब ठीक हो जाएगा। सुख हर तरह से चन्नी को बहलाने के यत्न करता रहता। उसको विलायत में दर्शनीय स्थलों की सैर करवाता। सिनेमा ले जाता। पार्कों में घुमाता और रेस्टोरेंटों में भोजन करवाता।

पर चन्नी सुख के आगे दिल की कोई बात न खोलती। सुख की कोई हरकत उसको खुशी प्रदान न करती। लाख कोशिशों के बाद भी गगन के ख़यालों को चन्नी अपने से अलग नहीं कर सकी थी। उसके दिल पर गगन की यादों की अमिट छाप अंकित हुई पड़ी थी। चाबी ख़त्म होने पर रुककर खड़ी हो गई घड़ी की सुइयों की तरह चन्नी की सोच गगन पर अटक कर रह गई थी। गगन को न प्राप्त कर सकने का दुख उसको अंदर ही अंदर घुन की भाँति खाये जाता।

जब चन्नी को ख़ुश करने के सुख के सभी यत्न असफल हो गए तो सुख के मन में चन्नी को नौकरी पर लगाने का विचार आया। ख़ुद की अच्छी तनख़्वाह होने के कारण धन-दौलत की सुख को कोई लालसा नहीं थी। वह तो चाहता था कि चन्नी का दिल बहले। इसलिए सुख ने घर के निकट ही विंडमिल स्नैक्स फ़ैक्टरी में चन्नी को उसकी योग्यता के अनुसार काम पर लगवा दिया।

नौकरी में ध्यान बँटने से चन्नी ने कुछ राहत अनुभव की। घर में तो सोच-विचारों का कीड़ा सदैव उसके दिमाग़ को चाटता रहता था। चन्नी जितना अधिक से अधिक ओवरटाइम लगता, लगा लिया करती। उसने अपना तन, मन काम की भट्ठी में झोंक दिया। वह तो चाहती थी कि जितना भी अधिक से अधिक समय हो सके, वह बस काम ही काम करती रहे ताकि उसको घर से दूर रहने का अवसर मिल सके। घर हमेशा चन्नी को क़ैदखाने के समान लगता था। सारा दिन अंदर घुसी वह अजीब सी घुटन और उमस का शिकार हुई रहती थी।

चन्नी को सुख के साथ न नफ़रत थी और न ही प्यार। यदि कुछ था तो इन दोनों के बीच का कोई बेनाम-सा जज़्बा था। चन्नी ने विवाह तो करवा लिया था, पर रिश्ता दिल से नहीं स्वीकारा था। उसके लिए लावों-फेरों के चार मामूली से चक्कर से अधिक कोई महत्व नहीं था। यदि चन्नी की मदमस्त आँखों को देखकर मस्ती में झूमता हुआ सुख कभी जिस्मानी भूख मिटाने की इच्छा प्रकट करता तो चन्नी चुपचाप आत्म समर्पण कर देती। चन्नी ने एक दिन भी सिर दुखने का बहाना करके सुख को तरसाया नहीं था। कभी ‘मूड ठीक नहीं’ जैसा स्त्रियों वाला कोई नखरा नहीं किया था और न ही कभी क्रिया का मज़ा लिया था। काले ताजमहल (शहजादा अपनी कब्र के लिए सफेद के बराबर काला ताजमहल बनवाना चाहता था, पर पुत्र की बगावत के कारण यह तामीर नहीं हो सका था) की तरह गगन के प्यार की भी चन्नी के दिल में नीवें धरी की धरी रह गई थीं। उन नीवों पर किसी अन्य के इश्क का महल कैसे बन सकता था?

ताली दोनों हाथों से ही बजा करती है। एक से तो चुटकी ही बजाई जा सकती है। एकतरफा प्रेम भी चुटकी की तरह होता है। चुटकी! जिसकी थोड़ी सी आवाज़ होती है। सुख रोज़ चुटकियाँ बजाता-बजाता ऊब गया। चन्नी के व्यवहार से सुख ने अंदाज़ा लगाया कि चन्नी उसको पसंद नहीं करती, क्योंकि वह चन्नी के मुकाबले थोड़ा-सा कम सुंदर था। उसको अपने चन्नी के साथ संबंधों में से लुत्फ़ आना बंद हो गया। वह अधिक से अधिक वक़्त चन्नी से दूर रहने का प्रयास करता। बस, कभी-कभार ही उसके क़रीब आता।

चन्नी के जीवन में घुलते ज़हर की मात्रा में दिनों-दिन वृद्धि हो रही थी। वह ज़िन्दगी से बेहद मायूस हो गई थी। किंग-साइज़ पलंग उसको एक वीरान तपता हुआ मरुस्थल लगता जिसमें अपनी प्यास बुझाने के लिए वह सारी रात गगन...गगन... पुकारती भटकती रहती।

हर समय चिंताओं में घिरी रहने के फलस्वरूप चन्नी के चेहरे की चमक गायब हो गई। उसके हुस्न को ग्रहण लग गया प्रतीत होता। चन्नी काम पर भी मौन धारण किए रहती। एक दो स्त्रियाँ, सुपरवाइज़र और परमिंदर के अलावा किसी अन्य के साथ वह बिल्कुल नहीं बोलती थी।

मध्यम कद, सुडौल शरीर, गेहुंये रंग और तीखे नयन-नक्श का मालिक परमिंदर बचपन में ही इंग्लैंड आ गया था। उसका स्वभाव बहुत मिलनसार था। परमिंदर का बातचीत करने का अनूठा ढंग ही अधिकतर लोगों को उसके प्रति आकर्षित करता था। वह ख़ालिस अंग्रेज़ी या ठेठ पंजाबी में हमेशा चिकनी-चुपड़ी बातें करके दूसरे के पेट में घुस जाता। भूरी, गोरी, काली, सब तरह की स्त्रियाँ उस पर मरती थीं। जहाँ जवान लड़कियाँ उसके साथ खड़ी होकर, सटकर दिल बहलातीं, वहीं अधेड़ भी उसके साथ बातचीत में अपनी ठरक की पूर्ति कर लिया करती थीं। पंजाबिनें तो उसके साथ लुच्ची फिकरेबाज़ी तक ही सीमित रहतीं। पर गोरी, काली स्त्रियाँ उसके गले लगकर उसको आलिंगन में भी ले लेतीं। वैसे भारतीय स्त्रियों से वह कुछ झिझकता था। दिलनशीं चेहरे और मज़ाकिया बातों का सुमेल वाला परमिंदर पहले दिन से ही चन्नी के दिल को छू गया था। इसकी एक वज़ह यह भी थी कि परमिंदर की शक्ल बहुत हद तक गगन से मिलती थी।

यदि गगन दाढ़ी-केश हटा दे या परमिंदर दाढ़ी-केश रख ले तो दोनों हू-ब-हू एक-से लगेंगे। मानों जुड़वाँ भाई हों। परमिंदर की आँखों के आगे आते ही चन्नी ऐसा सोचने लग जाती। परमिंदर की चाल ढाल, बोल-बाणी, मज़ाक-मसखरी, हर शोख़ी, हर आदत चन्नी को गगन की याद ताज़ा करवा देती।

नव विवाहित स्त्री के मुँह पर नूर की बजाय पीलापन होना, इसका तो एक ही अर्थ हो सकता है, और परमिंदर उस अर्थ को जानते हुए उसका पूरा-पूरा लाभ उठाना चाहता था। क़रीब से गुज़रते हुए वह हमेशा चन्नी को बुलाकर ही आगे बढ़ता।

एक दिन परमिंदर को चन्नी के पास काम करने का अवसर मिला। उसने इस सुनहरी अवसर का सही इस्तेमाल करने के लिए चन्नी का दिल खंगालना शुरू किया, "सयाने कहते हैं, खुशी बाँटने से बढ़ जाती है और दुख बाँटने से कम हो जाते हैं।"

"मुझे तो कोई दुख नहीं।" चन्नी ने चेहरे पर बनावटी मुस्कान लाते हुए कहा।

"चलो फिर खुशी ही साझी कर लो।" परमिंदर ने मछली पकड़ने के लिए कुंडी फेंकी।

चन्नी ने बात को दबाने के लिए ज़रूरत भर हँसना ही काफी समझा।

बातचीत की लड़ी टूटती देख परमिंदर बोला, "तो फिर इंडिया की याद आती होगी?"

चन्नी चौंक गई। परमिंदर ने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया था। चन्नी परमिंदर की आँखों में झाँकी तो उसको पता चला कि परमिंदर की भी दायीं पुतली पर तिल है। इससे पहले चन्नी आँखों में तिलों वाले दो मर्दों को जानती थी और वे दोनों उसके चेहते थे। एक तो गगन जिसकी वह मुरीद थी और दूसरा हिंदी फिल्म अभिनेता सन्नी दिओल जिसकी वह फैन थी।

आज ग़ौर से देखते हुए चन्नी को परमिंदर सन्नी दिओल जैसा ही प्रतीत हुआ। वह कन्वेयर बैल्ट पर सारा दिन एक साथ खड़े बातें करते रहे। परमिंदर स्नेह और सहानुभूति का मरहम लगाता रहा। ज़िन्दगी के रेगिस्तान में खड़ी चन्नी को वह नखलिस्तान की तरह लगा। जहाँ चन्नी परमिंदर के सुंदर व्यक्तित्व पर बुरी तरह फ़िदा थी, वहीं वह उसकी मीठी-मीठी बातों पर भी वह मोहित थी। शाम तक परमिंदर ने चन्नी को छल्ली के दाने की तरह पूरी तरह उधेड़ लिया। चन्नी ने दिल खोलकर अपनी सारी वेदना परमिंदर को बताई। रोते हुए को हँसाने की कला में निपुण परमिंदर चन्नी के मन के अंदर खंजर की भाँति धँसता चला गया।

परमिंदर की आमद चन्नी के जीवन में अहम परिवर्तन ले आई। अब चन्नी को नींद भी आने लग गई थी और सपने भी। चन्नी को परमिंदर का साथ अच्छा लगता। परमिंदर के साथ बातचीत करके उसकी तबीयत प्रसन्न हो जाती। परंतु एक विवाहित स्त्री का पराये गबरू लड़के के साथ हर समय बातें करते रहना जायज़ नहीं। किसी को शक हो जाने के परिणाम से वे दोनों भलीभाँति परिचित थे। इसलिए उन्होंने फ़ैक्टरी से बाहर मिलने की संभावना खोजी।

चन्नी को सवेरे सात बजे क्लॉक-इन (काम पर आना) करना होता था, पर घर से वह सवा छह बजे ही चल पड़ती। रास्ते में परमिंदर पहले ही प्रतीक्षा कर रहा होता। नुक़्ताचीन आँखों से दूर, मुख्य सड़क पर स्थित लव-बर्ड्स पब के पिछवाड़े बनी कार पार्किंग में कार खड़ी करके वे आधा-पौना घंटा कार में ही बैठे रहते। दिसंबर महीने में ठंड पूरे यौवन पर होने के कारण धुंध पड़ी होती। धुंध में क़रीब खड़े आदमी को देखना भी कठिन होता है। फिर उनकी सड़क से सौ गज़ की दूरी पर खड़ी सलेटी रंग की कैवलीयर का किसी को दिखाई देना तो बिल्कुल ही असंभव था। पब खुलने का समय न होने के कारण कोई पूछताछ होने का भी खतरा नहीं होता था। कार इंजन के बंद होते ही उनके मुँहों से निकलती भापों के कारण शीशे अपारदर्शी बन जाते और वे अपने आप को और भी अधिक सुरक्षित अनुभव करते। यदि कार किसी को दिख भी पड़ती तो देखकर दूसरा सहज ही अनुमान लगा लेता कि कोई व्यक्ति रात में अधिक पी लेने के कारण गाड़ी वहीं छोड़कर चला गया होगा।

रोज़ की गुप्त मुलाक़ातों ने उनके अंदर की दूरी कम कर दी। वे एक-दूसरे के काफ़ी क़रीब आ चुके थे। परमिंदर पूर्ण रूप में चन्नी का विश्वास जीत चुका था और चन्नी भी हर बात उसके साथ बेझिझक होकर करने लग पड़ी थी। एक दिन लोहा गरम देखकर परमिंदर ने चोट करनी चाही। उसने पैसेंजर सीट पर बैठी चन्नी को बाँहों में भर लिया।

चन्नी चौंक उठी। उसने तो अपना ग़मखार मानकर परमिंदर के साथ दोस्ती की थी। उसने परमिंदर को धकेलकर ख़ुद को उसकी जकड़ आज़ाद किया। वह उसकी नीयत ताड़ गई थी।

"परमिंदर आय एम सॉरी... मैं अपने हसबैंड के साथ धोखा नहीं कर सकती," बेचारगी की मूरत बनी बैठी चन्नी ने अपनी बेबसी बताई।

"हूँ! धोखा नहीं कर सकती, बड़ी सति-सावित्री बनती है। यहाँ बैठी क्या करती है फिर? यह धोखा नहीं?" परमिंदर ने मन में उपजे इस विचार को व्यक्त करना मुनासिब न समझा।

"मुझसे तेरी दूरियाँ झेली नहीं जातीं। तेरे बग़ैर मर जाऊँगा चन्नी। मैं तुझे बहुत प्यार करता हूँ," परमिंदर ने चन्नी को हवा देने की कोशिश की।

"अगर तू मुझे प्यार करता है तो मैं भी तुझे बहुत चाहती हूँ। पर जो तू चाहता है, वह नहीं कर सकती," चन्नी ने तर्क दिया।

"एवरीथिंग इज़ फेयर इन लव एंड वार। ये बेकार के औरतों वाले नखरे छोड़," परमिंदर ने उसे बहलाने के लिए आख़िरी हथियार आज़माना चाहा।

"नहीं, मैं नहीं। सॉरी!" चन्नी ने टके-सा जवाब दे दिया।

"लै जाणगें जिन्हां ने दम खरचे, तेरा की ए ज़ोर मितरा!" परमिंदर ने किसी पुराने लोकगीत की पंक्तियाँ गाकर चन्नी के साथ ताने भरी मसखरी की।

"तुम समझते क्यों नहीं।" इस बार चन्नी कराह उठी।

"ओ के भई, ओ के। जैसी तेरी इच्छा," परमिंदर के हाथ खड़े हो गए।

उनके बीच चुप्पी पैदा हो गई। काम का वक़्त होने वाला था। कुछ देर ख़ामोश रहने के बाद बाद वे दोनों अलग-अलग रास्तों से फ़ैक्टरी की ओर रवाना हो गए।

उसके बाद दो तीन दिन परमिंदर चन्नी से नज़रें चुराता रहा। चन्नी उसके साथ बात करने के लिए मछली की भाँति तड़प रही थी। चन्नी को परेशानियों के घेरे में से बाहर निकलने का एकमात्र द्वार नज़र आया था और वह भी अब दृष्टि से ओझल होता जा रहा था। परमिंदर का हाथों से निकल जाने का डर उसके मन को लगा हुआ था। डर था कि परमिंदर कहीं मिलने, दुख-सुख साझा करने से सदैव के लिए ही न हट जाए। चन्नी उसकी आदी हो चुकी थी। आदतन चन्नी रोज़ उसको कार पार्क में देखकर आती। परमिंदर की कार न होती। उसको परमिंदर की तलब हो रही थी। परंतु परमिंदर चन्नी के पास न फटकता।

एक दिन ब्रेक के समय चेजिंग रूम की ओर परमिंदर को अकेला जाता देख चन्नी दौड़कर उसके साथ मिल गई।

"अब मिलता क्यों नहीं? मैं रोज़ तुझे कार पार्क में देखती हूँ," चन्नी के शब्दों में मासूमियत थी।

"बस सवेरे सुबह जल्दी आँख नहीं खुली, अलार्म नहीं चला। लेट हो गया था। मुश्किल से काम पर पहुँचा था," परमिंदर ने घड़े-घड़ाये बहाने सुना दिए।

"प्लीज़, कल ज़रूर मिलना। मुझे बहुत सारी बातें करनी हैं," चन्नी ने मिन्नत की।

परमिंदर ने बग़ैर कुछ बोले ‘हाँ’ में सिर हिला कर रज़ामंदी दी।

"प्लीज़... मैं वेट करूँगी।" चन्नी ने एक बार फिर ताकीद की।

अगली सवेरे परमिंदर की गाड़ी खड़ी देखकर चन्नी का मुरझाया चेहरा ताज़ा गुलाब की तरह खिल उठा। चन्नी ने गाड़ी में बैठकर परमिंदर से हाल-चाल पूछा, मौसम के बारे में दो-चार रस्मी-सी बातें कीं। फिर इधर-उधर की बातों को छोड़कर एकदम गंभीर होते हुए अर्थपूर्ण और गंभीर बात छेड़ दी।

"मुझे इंग्लैंड में आकर यदि कुछ अच्छा लगा है तो वह तू है परमिंदर," चन्नी के शब्दों में तड़प साफ़ थी।

परमिंदर ने चन्नी की तरफ़ देखा। उसको चन्नी का मुखड़ा बहुत ही ख़ूबसूरत लगा, "मेरा भी तेरे बिना कहीं ओर जी नहीं लगता। दिल करता रहता है, तुझे हर समय देखता रहूँ। तेरे साथ बातें करता रहूँ। तेरी समुंदर-सी गहरी आँखों में टाइटैनिक जहाज़ की तरह डूबा रहूँ।"

चन्नी को परमिंदर की आवाज़ किसी सुरीले साज़ में से निकले संगीत जैसी लगी। चन्नी ने परमिंदर के कंधे पर सिर रखते हुए अपने सीने में अवैध हथियार की तरह छिपाकर रखा हुआ गहरा भेद खोला, "अगर तू न होता तो मैं अब तक तो कुछ खाकर मर गई होती।"

परमिंदर ने उसके मुँह पर हाथ रखते हुए कहा, "तुझे मेरी क़सम है, अगर दुबारा मरने-वरने की बात की तो।"

इतना कहकर परमिंदर ने चन्नी को बाँहों में कस लिया। चन्नी को बड़ा सुकून मिला। उसने अपने आपको जन्नत में पहुँचा हुआ अनुभव किया। चन्नी ने भी अपनी बाँहें परमिंदर के इर्दगिर्द लपेट लीं।

उसने परमिंदर की छाती से लगे-लगे पब की चिमनी की तरफ़ देखा। चन्नी को यूँ लगा जैसे लव-बर्ड्स की विशाल इमारत उससे मुख़ातिब होकर कह रही हो - ‘तुम बेख़ौफ़ होकर इश्क फ़रमाओ। मेरे होते तुम्हें कोई नहीं देख सकता। मैं तुम्हारी प्रीत की पहरेदार हूँ।’

तभी परमिंदर ने बाँहों की पकड़ कुछ ढीली की।

"न छोड़ न, मुझे ज़ोर से कस ले अपनी बाँहों में," चन्नी इस आनंदमयी स्थिति का भरपूर आनंद लेना चाहती थी।

परमिंदर ने अपनी बाँहों की जकड़ मज़बूत की।

"ज़ोर से दबा!" चन्नी ने आहिस्ता से परमिंदर के कान में सरगोशी की।

परमिंदर ने सीधा होकर चन्नी का जिस्म और ज़ोर से अपनी बाँहों में कस लिया।

"और कस... और दबा...और...और...और...," कई बार चन्नी के होंठ फड़के।

जब तक चन्नी के मुँह से "और...और..." की आवाज़ें आनी बंद न हो गई, तब तक परमिंदर अपनी बाँहों के घेरे को कसता रहा। ज्यों-ज्यों वह अपने आलिंगन को कसता गया, त्यों-त्यों चन्नी खिसकती गाँठ की तरह खुली चली गई। रौ में बहकर चन्नी को पता ही न चला कि कब वह समाज की खींची मर्यादा की रेखा पार कर गई।

- क्रमशः

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