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ISSN 2292-9754

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01.28.2016


वो बल्ख न बुखारे

मंगलवार शाम को बहन शकुन जी का फ़ोन आया कि कल सुबह 9 बजे हमारी चौबारा की मीटिंग है अगर आप आ सकें तो अच्छा लगेगा। मैंने कहा कि चौबारा शब्द तो एक सन्दर्भ से हमारा यानी उत्तर भारत का शब्द है लेकिन मैंने उन से आने का वायदा कर दिया। उन्होंने स्थान का पता और फ़ोन नंबर दे दिया। बुधवार की सुबह नियत समय और स्थान पर हम पहुँच गए। यह वरिष्ठ सदस्यों के मिलने और अपने विचारों के आदान-प्रदान का स्थान है। यह जान कर प्रसन्नता हुई कि इस मंच का नाम छज्जू का चौबारा रखा गया है। इस में संगीत भी होता है और संस्मरण भी होते है। कला और साहित्य पर बातचीत होती है, कहानी और कविता पाठ होता है, कुछ बातें ज्ञान प्रदायक होती हैं तो कुछ मनोरंजक। इस में औपचारिकता भी है अनुशासन भी है।

हज़र अली की दरगाह - बल्ख, अफ़गानिस्तान
अनारकली बाज़ार - लाहौर, पाकिस्तान
आर्क किला - बुखारा (५वीं श्ताब्दी - १९२०)
बुखारा में पुरानी मस्जिद के खंडहर

इस बार की मेरे अमेरिका प्रवास की पहली उपलब्धि है – अमेरिका में हिंदी की लेखिका, कवियत्री और विदुषी बहन शकुंतला बहादुर से भेंट और लम्बी बातचीत। इन से भेंट भाई डॉ. मधुसूदन जी, (मेसाचुसेट्स यूनिवर्सिटी में निर्माण अभियांत्रिकी के प्रोफेसर) के माध्यम से हुई। मैंने उन्हें लिखा की अभी मैं कनाडा में हूँ और शीघ्र ही 5 दिस. 2015 को आप के शहर सेन होज़े/ कूपरटिनो आने वाला हूँ – आने के तुरंत बाद ही मैंने उन्हें सूचित कर दिया। उन्होंने ही चौबारा की बैठक में आने का निमंत्रण भी दिया.

चौबारे की बात पर मुझे अपने बचपन की याद आ गयी जब हमारे पिताजी यह कहावत सुनाया करते थे – बल्ख न बुखारे, जो बात छज्जू के चौबारे। इस का अर्थ बताते समय कहते थे कि पुराने ज़माने में बल्ख और बुखारा दो बहुत ही ख़ूबसूरत शहर होते थे. उधर लाहौर के अनारकली बाज़ार में छज्जू भगत का चौबारा था जहाँ दिन भर बड़े बुज़ुर्ग लोगों की गप्प-गोष्ठी जुडती थी, कहकहे लगते थे, हँसी ठठ्ठा होता था। दूध और लस्सी के गिलास चलते रहते थे। यहाँ आने वाले सभी एक आंतरिक तार से जुड़े हुए थे। इन में एक थे सूरज मल। उन का एक बार बलख – बुखारे घूमने जाने का मन हुआ और वे गए भी। गए थे तो कम से कम एक महीना तो लगा कर आयेंगे, सब ने यही सोचा। लेकिन वे आठ दिन के बाद ही वापिस आ गए। मित्रों ने कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि बुखारा तो वे जा नहीं सके। बल्ख से ही लौट आये। वहाँ उन का दिल नहीं लगा। बुखारा बल्ख से लगभग 400 किलो मीटर दूर था। इस लिए उन्होंने यह पंक्ति कही – "वो बल्ख ना बुखारे – जो बात छज्जू के चौबारे" और यह कहावत के रूप में प्रसिद्ध हो गयी। इस का सीधा अर्थ था कि दूसरी जगह कितनी ही सुन्दर अथवा आकर्षक क्यों न हो, अपना चौबारा/ अपनी झोंपड़ी ही सबसे अच्छी होती है। आख़िर जौक ने अपना बिस्तर बाँधने के बाद भी अपना इरादा बदल दिया था – ‘कौन जाये जोक दिल्ली की गलियां छोड़ कर’।

इस की ऐतिहासिकता के बारे में अधिक तो कहीं नहीं मिलता। एक ब्लॉग में लिखा मिला है कि ‘इतिहासकार सुरेंद्र कोछड़ के अनुसार छज्जू भगत का असली नाम छज्जू भाटिया था। वे लाहौर के रहने वाले थे। मुग़ल बादशाह जहांगीर के समय वे सोने का व्यापार किया करते थे। 1640 में उनके निधन के बाद उनके अनुयायियों ने लाहौर के पुरानी अनारकली स्थित डेरे में उनकी समाधि बना दी’। इस का अर्थ यह है कि उन का समय जहाँगीर का समय था।

पहले हम अपने पिता जी से पूछते थे – बल्ख और बुखारा कहाँ हैं – अब हमारे बच्चों के बच्चे हम से पूछते हैं – दादा यह चौबारा क्या होता है? क्योंकि अब चौबारे नहीं होते। अब फ्लैट होते हैं, कोंडो होते हैं – बालकनी होती है जिस में घर का फ़ालतू सामान भर दिया जाता है।

मैं उन्हें बताता हूँ - ‘चौबारा घर के एक विशेष स्थान को कहते हैं। प्रायः यह घर के मुख्य द्वार के ऊपर / दहलीज़ के ऊपर पहली मंज़िल पर बने एक छोटे कमरे का नाम होता है। इस के एक दरवाज़े अथवा खिड़की का रुख सड़क की तरफ होना चाहिए। इस का उपयोग भी अलग तरह से होता है। इस में घर के युवा और उन की मित्र मंडली की बैठक जमती है। हँसी-मज़ाक चलता है, ताश की बाज़ी भी लगती है। कभी चौपड़ भी बिछती। हाँ इस में अभद्रता अथवा अश्लीलता का कोई स्थान नहीं होता बल्कि इस के सदस्यों में मोहल्ले अथवा इलाक़े की सुरक्षा का उत्तरदायित्व भी होता। कमरे की पूरी कार्यवाही एक अनौपचारिक वातावरण में होती है। इस कमरे में कोई ताला आदि नहीं लगता।

बल्ख और बुखारे की कहावत से लगता था कि जैसे ये दो शहर पास पास ही हैं और युग्म शब्द बन गए हैं। जैसे उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ – सुलतानपुर, राजस्थान के कोटा – बूंदी, अथवा आंध्र के हैदराबाद – सिकंदराबाद। दो शहरों के इस तरह जुड़वां नाम से इन की भौगोलिक पहचान बनती है। लेकिन बल्ख – बुखारा शहरों की दूरी में काफी अंतर है. 400 किलोमीटर यानी 250 मील का फ़र्क है दोनों में और अब तो ये दो शहर दो अलग देशों में है। बल्ख अफगानिस्तान में है और बुखारा उज़्बेकिस्तान में – जो पहले सोवियत रूस का एक भाग था। हाँ दोनों ही सिल्क मार्ग पर हैं। यह एक बड़ी बात थी कि एक चौबारे के तुलना दूर दराज के दो शहरों से की जाये।

गहराई से देखने पर मालूम होता है कि भारतीय लोक संस्कृति में कुछ ऐसे शब्द हैं जो न केवल एक स्थान विशेष के द्योतक हैं वरन इन में उन के शहरों की आतंरिक भावनात्मक पहचान भी है- जैसे लखनऊ का चौक, मेरठ का बेगम पुल, देहरादून का घंटाघर, सहारनपुर का रानी बाज़ार चौक, अमदाबाद का भद्र काली चौराहा, वड़ोदरा का लहरी पूरा, बुढाना गेट चौपला, हैदराबाद के चार मीनार पर पानवाले की दूकान, मथुरा का होली गेट, नुक्कड़, घंटाघर, अड्डा, आदि। हर पुराने शहर में इस तरह के स्थान होते थे। अब यह सब पुराने ज़माने की बातें लगती हैं। सूचना क्रांति के परिणाम स्वरूप अब हम डिजिटल हो गए हैं, चिठ्ठी पत्री का युग बीत गया।

ई-मेल भी जाने की तैय्यारी में है, SMS समाप्ति के क़गार पर है, अब तो ऐप्प्स पर इशारों में बातें होने लगी है। अंगूठा ऊपर कर दो- इस का मतलब – हाँ हो गयी। फेस बुक ने एक नयी संस्कृति को जन्म दिया है। एक ही स्थान पर एक ही पंक्ति से एक ही समय में 50/ 60 व्यक्तियों से से जुड़ सकते हो.. अब किसी के पास मिलने की फ़ुर्सत नहीं है और न ही आवश्यकता है। अब हमारी संस्कृति ipod/ ipad/ smartphone में सिमट गयी है। देखना यह है कि अगला पड़ाव कहाँ होगा। अंत में इसी सन्दर्भ में शकुन जी की लिखी दो पंक्तियाँ –

“सारी दुनिया घूमी मैंने, देखा बल्ख़ बुख़ारे में।
पर वह बात नहीं पाई, जो छज्जू के चौबारे में॥"


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