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ISSN 2292-9754

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08.08.2016


प्रधान मंत्री का सन्देश

आकाशवाणी का तब -

भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी हर महीने "मन की बात" शीर्षक के अंतर्गत रेडियो के माध्यम से सम-सामयिक विषयों पर जनता से सीधे बात करते हैं। इस बार के कार्यक्रम में उन्होंने मनुष्य जीवन की सब से छोटी लेकिन सबसे अधिक महत्वपूर्ण "पानी" की समस्या पर बात की। कार्यक्रम के दौरान प्रधान मंत्री जनता के प्रश्नों के उत्तर भी देते हैं। यह वास्तव में रेडियो से प्रसारित होने वाला एक अत्यंत सुन्दर, सराहनीय, अनूठा और आकर्षक कार्यक्रम है। इसे सुनने के लिए गाँव, क़स्बों और शहरों में रेडियो के चारों तरफ बैठे श्रोताओं का उत्साह देख कर हम जैसे पुराने रेडियो कर्मियों का रेडियो के प्रति एक अहम् भाव जागृत हो जाता है। जब एक श्रोता को अपने घर से सीधे प्रधान मंत्री से बात करने का अवसर मिलता है तो उसे कितनी प्रसन्नता होती है – यह वही जानता है।

एक श्रोता कौशिक जी ने पूछा है क्या पहले भी इस तरह का कोई कार्यक्रम हुआ है? इसका सीधा स्पष्ट उत्तर महेंद्र मोदी जी ने दिया है “नहीं” इस तरह धारावाहिक (serial) के रूप में नहीं। आगे मैं महेंद्र मोदी जी से क्षमा माँगते हुए उन्हीं की बात को अलग ढंग से कहूँगा। मोटे तौर पर इसे प्रधान मंत्री का जनता के नाम सन्देश कहा जायेगा। इसे मैं तीन भागों में बाँट कर देखता हूँ –

1. प्रधान मंत्री का जनता के नाम नियमित सन्देश - जैसा कि प्रधान मंत्री हर वर्ष 15 अगस्त के दिन लाल किले की प्राचीर से भाषण देते हैं। इस का प्रारम्भ स्वतंत्रता प्राप्ति के दिन से हुआ। प्रधान मंत्री का लाल किले की प्राचीर से बोलना एक गौरव की बात है। एक समय था जब टीवी नहीं था और लोगों में प्रधान मंत्री को सुनने की तीव्र उत्कंठा होती थी। इस कारण लाल किले के सामने के खुले मैदान में भीड़ जुटती थी। इस में प्रधान मंत्री सामान्यतः जनता के सामने वर्ष भर की गतिविधियों और आगामी वर्ष की योजनाओं का लेखा-जोखा रखते हैं। यह भाषण प्रायः अलिखित होता है और इस की अवधि सामान्यतः 40-45 मिनिट की होती है। कभी-कभी भाषण लम्बा भी हुआ है।

2. विशेष परिस्थितियों में - विशेष परिस्थितियाँ जैसे अक्तूबर 1962 में चीन ने अचानक धावा बोल दिया। पूरा देश सकते में आ गया। उस समय तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित नेहरु की बौखलाहट को जनता ने महसूस किया था। बदहवासी में कहे गए ये शब्द किसी लिखित भाषण के अंश नहीं थे वरन प्रधान मंत्री के ह्रदय के घाव थे…. ”एक…. पड़ोसी. ने….दोस्त बन…. कर.. हमारी पीठ….में छुरा….. घोंपा है।"

- अगस्त 1965 में पाकिस्तान के उस समय के मिलिट्री शासक अय्यूब खान को भ्रम हो गया कि वे लाल किले तक टहल कर आसानी से जा सकते हैं और धोती पहनने वाला प्रधान मंत्री कुछ नहीं कर सकता। इसी भ्रम में उन्होंने अगस्त 1965 में भारत पर आक्रमण कर दिया। वे भूल गए कि धोती पहनने वाला लाल बहादुर शास्त्री नाम का प्रधान मंत्री फौलादी जिगर का आदमी था। युद्ध के समय शास्त्री जी दिल्ली के राम लीला मैदान से देश की जनता को संबोधित करते थे। उन का एक-एक भाषण मुझे अच्छी तरह से याद है। उस युद्ध से जुड़े हिंदी अंग्रेज़ी के अख़बारों के क्लिपिंग्स मेरी स्क्रैप बुक में अभी तक सुरक्षित हैं। उन दिनों ऑफ़िस में काम करने का एक अलग ही जनून था। मैं उन दिनों रक्षा मंत्रालय में ही कनिष्ठ पद पर था।

- इसी तरह 3 दिसंबर 1971 की रात जब पाकिस्तान के शासक याहया खान ने उत्तरी भारत के फ्रंट पर युद्ध छेड़ दिया तो तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने देश के नाम "उत्तिष्ठ जागृत” के अपने सन्देश के साथ जवाबी कार्यवाही भी शुरू कर दी। सन्देश प्रसारण की सूचना आकाशवाणी के सभी केन्द्रों को पहले से दी जा चुकी थी। सन्देश का प्रसारण उसी समय हुआ जब सभी तैय्यारियाँ मुक़म्मल हो चुकी थी। इसे बंगला देश का मुक्ति युद्ध कहा जाता है जिस की परिणिति 16 दिसम्बर के दिन पाकिस्तान के जनरल नियाज़ी द्वारा भारत के जनरल जगजीत सिंह को दिए गए समर्पण से हुई थी। इन तीनों भाषणों की विस्तृत चर्चा मैंने अपनी पुस्तक में की है।

- इसी प्रकार आपातकाल का समय भी विशेष परिस्थिति का समय था।

यहाँ पर दिल्ली केंद्र के उस समय के स्टूडियो नम्बर 8 की चर्चा करना भी प्रासंगिक होगा। लाल रंग यह स्टूडियो VIP स्टूडियो कहलाता था और इस की देख-रेख भी उसी स्तर की होती थी। पंडित नेहरु की रिकॉर्डिंग इस स्टूडियो में होती रही है। पंडित नेहरु ने एक बार बच्चों के सद्य (Live) कार्यक्रम में बड़े स्टूडियो, संगीत के स्टूडियो में भाग लिया था।

3. तीसरी श्रेणी - आज कल प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जो मन की बात रूप में कर रहे हैं। इस में वे जनता से जुड़ी समस्याओं को उठाते हैं और उन का समाधान खोजते हैं। यह एक निर्विवाद सत्य है कि प्रधान मंत्री श्री मोदी जी की भाषा दिल को छूने वाली होती है।

1988 से 1994 तक दिल्ली केंद्र पर मैं VVIP प्रकोष्ठ का इंचार्ज रहा हूँ जिस में प्रधान मंत्री का ऑफ़िस और निवास, राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, लाल किला (15 अगस्त) और जनपथ (26 जनवरी) की रेकार्डिंग और प्रसारण की ज़िम्मेदारी थी। यद्यपि इन स्थानों के हमारे पास स्थायी क़िस्म के विशेष पास होते थे। उस के बाद भी हर बार जाँच पड़ताल होती थी। इस टीम में मेरे साथ इंजिनियर श्री रोबिन दास गुप्ता और आइज़क जॉन थे। हम लोगों की एक सुगठित टीम थी। जॉन मेरे साथ रोहतक में भी रह चुके थे। हमारे वरिष्ठ अधिकारी थे सर्व श्री उमेश दीक्षित (केन्द्र निदेशक), जी सी त्यागी (अधिक्षण अभियन्ता) और पी एम बंसल (केन्द्र अभियन्ता)। इस दौरान हमें राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और तीन प्रधान मंत्री सर्व श्री वी पी सिंह, चन्द्र शेखर और पी वी नरसिंह राव से समीप से मिलने, बात करने और रिकॉर्ड करने के अनेक अवसर मिले।

आज कल तकनीकी तौर हम काफ़ी आगे बढ़ चुके हैं। रिकॉर्डिंग और प्रसारण के नए-नए उपकरण आ गए हैं। रिमोट कंट्रोल की सुविधाएँ मिल रही हैं, उस के बावजूद भी हम पानी जैसी मूलभूत समस्याओं से घिरे हैं। अतः इस सन्दर्भ में प्रधान मंत्री की पानी चर्चा अत्यधिक प्रासंगिक हो जाती है।

रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून –
पानी गए ना उबरे, मोती मानुस चून॥


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