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ISSN 2292-9754

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04.02.2015


पश्चिम का प्रथम हिंदी तीर्थ - त्रिनिदाद का एरी गाँव

30 मई 1845 का दिन जब भारतीय गिरमिटिया मज़दूरों से भरा फत्तेल रोज़ाक नाम का जहाज़ 16 फरवरी 1845 को कोलकाता से चलकर साढ़े 3 महीने की यात्रा पूरी करके त्रिनिदाद के नेल्सन द्वीप पर पहुँचा। यह यात्रा अत्यंत दुखद, संघर्षपूर्ण और कष्टप्रद थी। किसी को विश्वास नहीं था के वे सही सलामत पहुँचेंगे। इस तीन महीनों में उन के कितने ही संगी-साथी छूट गए थे, कितने ही काल कवलित हो गए थे। द्वीप पर पहुँचने वाले केवल 227 व्यक्ति थे। इन में पुरुष भी थे महिलाएँ भी थीं। छोटे भी थे बड़े भी थे। कुछ में परस्पर जान-पहचान थी और कुछ एक दूसरे से अनजान भी थे। इन लोगों के मन से जाति,धर्म, ऊँच, नीच का भेद-भाव मिट चुका था। पेट की भूख और जीवन जीने की इच्छा प्रबल थी। सभी धार्मिक और सामाजिक वर्जना समाप्त सी हो गयी थी। सभी के मन में एक अजाना भय था। कॉन्ट्रैक्टर की मीठी और लच्छेदार बातों का विश्वास भी अब समाप्त हो रहा था।

जहाज़ रवाना होने से पहले कांट्रेक्टर ने इन मज़दूरों को भरती करते समय कहा था "जल्दी जल्दी अपना नाम लिखवाओ, भरती हो जाओ, तुम्हें ऐसी जगह ले जायेंगे जहाँ सोना ही सोना बिखरा पड़ा है, काम ही काम है, कोई खाली नहीं रहेगा, सब को पैसा मिलेगा, ज़मीन मिलेगी, सब का जीवन सुधर जायेगा, जो भर्ती हो जायेगा उस का भविष्य बन जायेगा।" साथ में लालच दिया – "यदि वे चाहें तो पाँच वर्ष के बाद वापिस आ सकते हैं।" ये भरती बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से अधिक हुई, कुछ लोग ओडिसा से भी थे और कुछ दक्षिण भारत से भी थे। ये सब वायदे तीन महीने की जहाज़ी यात्रा के दौरान निर्मूल लगने लगे क्योंकि जहाज़ी यात्रा ने उन्हें ऐसा ही अनुभव दिया। नेल्सन द्वीप पर जब 30 मई 1845 को जहाज़ पहुँचा तो वहाँ घटाटोप अन्धकार, चारों तरफ कीचड़ और जंगली कीड़े-मकोड़े थे। कहीं रहने का स्थान नहीं, पीने को पानी नहीं और खाने को कुछ नहीं। भाग्यवादी होकर काम नहीं चलने वाला था। अतः सभी ने फावड़ा कुदाल लेकर काम शुरू कर दिया।

रहते-रहते लोग रमने लगे और जीवन चल पड़ा। 1867 तक गिरमिटियों की संख्या 20000 तक हो गयी थी जब रेवरेंड जॉन मोर्टन दृश्य पर आया।

कनाडा के नोव स्कोशिया के प्रेस्बिटेरियन चर्च का एक पादरी रेवरेंड जॉन मोर्टन एक लम्बी बीमारी के बाद स्वास्थ्य लाभ के लिए 1867 में त्रिनिदाद आया था। आते ही वह यहाँ के दक्षिणी नगर सेन फर्नांडो में रहा लेकिन बाद में वह प्रिंसेस टाउन होते हुए एरी गाँव पहुँचा। उसे यह स्थान पसंद आया। अनुमान लगा सकते हैं कि त्रिनिदाद उस समय कितना अधिक खुला और विस्तृत, लहलहाते खेतों और शांत और सुरम्य वातावरण वाला स्थान था। 30 मई 1845 से प्रारम्भ होकर 1867 तक त्रिनिदाद में लगभग 20,000 भारतीय आ चुके थे। मोर्टन दिन भर गन्ने के खेतों में घूमता, खेतों में काम करते भारतीय मज़दूरों से बात करता और नयी-नयी योजनाएँ बनाता। उस का मस्तिष्क इसी उधेड़-बुन में रहता की इन लोगों को किस तरह से अपने में मिलाया जाये अर्थात इन को प्रेस्बिटेरियन मतावलम्बी बनाया जाये। अंततः वह मन ही मन परेशान हो गया और कनाडा वापिस आ गया। आते ही उसने अपने चर्च के मुख्य पादरी से अपने दिल की बात कही कि किस तरह उन लोगों को प्रेस्बिटेरियन ईसाई बनाया जा सकता है। इस काम के लिए उसने अपनी सेवा भी अर्पित की। चर्च के अधिकारी उस के इस प्रस्ताव से प्रसन्न हो गए और उन्होंने मोर्टन को काम करने की अनुमति दे दी। इस तरह से मोर्टन अपनी पूरी तैयारी के साथ, पत्नी सारा और अपनी अकेली नन्हीं बेटी के साथ अपने मिशन पर 6 जनवरी 1868 को त्रिनिदाद पहुँच गया। उन ने सबसे पहला काम किया - प्रिंसेस टाउन के एरी गाँव में एक प्रेस्बिटेरियन चर्च की स्थापना। भारतीय गिरमिटिया के इस गाँव में मुस्लिम संप्रदाय के लोग भी काफी थे। इस गाँव में सन् 1830 से पहले से ही स्कॉटलैंड (अमेरिकी) का एक यूनाइटेड प्रेस्बिटेरियन चर्च था लेकिन यह जीर्ण शीर्ण अवस्था में था और कभी भी गिर सकता था। रेवरेंड मोर्टन के उत्साह को देख कर इस के अमेरिकी मालिकों ने मोर्टन को इस चर्च के पुनरुद्धार की अनुमति दे दी। इसी प्रकार यह चर्च नए प्रेस्बिटेरियन ईसाई बने भारतीयों का चर्च बन गया। इसी वर्ष चर्च से प्रेरणा लेकर भारतीय प्रवासी मुस्लिम समूह ने भी एक मस्जिद की स्थापना की। इस प्रकार यह गाँव एक तरह से सांप्रदायिक सद्भाव और धार्मिक सहिष्णुता का केंद्र बन गया। यह सन् 1868 की बात है।

इस से पहले 1854 में भारत के सत्ताधारी अंग्रेज़ों ने कुछ मिशनरियों को हिन्दू संस्कृति, सभ्यता, दर्शन, इतिहास और भारतीय जीवन पद्धति सीखने के लिए भारत भेजा था। इसी दौरान रेव० मोर्टन ने भारत से हिंदी पढ़ने-पढ़ाने की सामग्री मँगाई। उस ने अपनी पत्नी और दोनों बच्चों को हिंदी सीखने के लिए प्रेरित किया। टूनापुना में हिंदी मुद्रण के लिए एक प्रेस भी लगाई। उन की पत्नी सारा ने हिंदी में एक भजनावली मुद्रित की और उसे सभी भारतीयों को बाँटी। उन के दोनों बच्चे - बेटी अग्नेस मोर्टन और बेटा हार्वे मोर्टन कुछ दिनों बाद ही न केवल अच्छी हिंदी बोलने लगे वरन स्थानीय भारतियों को हिंदी सीखाने भी लगे।

धीरे-धीरे मोर्टन ने अपना प्रचार के काम को बढ़ाना शुरू कर दिया। एरी गाँव से बाहर निकल कर त्रिनिदाद के दक्षिण में विभिन्न स्थानों पर उन ने चर्च बनाये, वहाँ हिंदी भजनों का गायन वादन शुरू किया इन भजनों के माध्यम से वे हिंदी के प्रचारक बन गए। उन ने स्वयं हिंदी सीखी, अपनी पत्नी और अपने दोनों बच्चों को सिखाया। इस के साथ ही बच्चों के लिए स्कूल भी खोलने शुरू किये। 1871 से लेकर 1881 तक - एक दशक में उन ने दक्षिणी त्रिनिदाद के दूर-दूर स्थानों पर प्राइमरी स्कूल खोल दिए। लेकिन इस सब के पीछे उद्देश्य एक ही था। सब को प्रेस्बिटेरियन ईसाई बनाना। देखने और सुनने में इन के भजन हिंदी में थे लेकिन ये प्रभु यीशु को समर्पित होते थे। कुछ भजनों के बोल इस प्रकार थे -

"करो मेरी सहाय, प्रभु।"
यीशु ने कहा था, "मैं ही तुम्हारा सहायक हूँ।
येशु, मेरे प्राण बचाओ", आदि।

इन नव स्थापित चर्चों के नाम भी हिंदी में रखे गए जैसे फैज़ाबाद के चर्च का नाम रखा - भोर का तारा (Morning Star Presbyterian Church), सिपरीया के चर्च का नाम रखा - जगत का प्रकाश (Light of the World Church) . रुज़िलेक चर्च का नाम था धर्म का सूरज (Sun of Righteousness)।

कनाडा स्थित प्रेस्बिटेरियन अधिकारियों ने मोर्टन के काम की सफलता को देख कर नोव स्कोशिया के ही दूसरे मिशनरी डॉ. केन ग्रांट को भी त्रिनिदाद भेज दिया। ग्रांट ने मोर्टन के काम को आगे बढ़ाया। चर्च के स्थापना के साथ इन ने अपना ध्यान कालिज और सेकंडरी स्कूल खोलने पर लगाया। काफी स्ट्रीट पर बने चर्च का नाम ग्रांट ने 'सुसमाचार चर्च' रखा। इन ने अपना कार्य क्षेत्र बदला अर्थात इन ने लोगों के रहन सहन को बदलने का काम शुरू किया। भारतीयों में संस्कार वंश आगे बढ़ने, प्रगति करने, अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने और अपना स्तर सुधारने की इच्छा होती है।

ग्रांट ने इस का लाभ उठाया और इस काम में गिरमिटियों की मदद करनी शुरू की। धीरे-धीरे अपनी भी शर्तें जोड़ने लगे। जैसे थोड़ा सा अपना नाम बदलना होगा, थोड़ा सा अपना दृष्टिकोण बदलना होगा, प्रभु यीशु की प्रार्थना करनी होगी, अर्थात सीधे-सच्चे तौर पर प्रेस्बिटेरियन बनना होगा। लालच दिया कि ऐसा करने पर उन्हें अनेक सुविधाएँ मिलेंगी, शिक्षा मिलेगी, नौकरियाँ मिलेंगी, उन के रहन-सहन का स्तर ऊँचा हो जायेगा। इस का ज्वलंत उदाहरण बने - लाल बिहारी जो ग्रांट और मोर्टन के सुझाये रास्ते पर चलकर एक सम्मानित और शिक्षित व्यक्ति बने और अंत में अपने स्थानीय प्रेस्बिट्रेरियन चर्च के उच्च अधिकारी बने। इसी तरह के समाज में उच्च स्थान प्राप्त करने वाले थे रेवरेंड विंस्टन गोपाल। रेव० गोपाल ने जॉन मोर्टन के बारे में लिखा है की "उन की सफलता का रहस्य उन की अपने काम के प्रति निष्ठा, आत्मविश्वास, लग्न और जनून था। उन का लक्ष्य था ग्रामीण समुदाय का उत्थान और इस के लिए उन ने स्थान चुना शांत और सरल 'एरी' गाँव और लक्ष्य रखा प्रेस्बिटेरियन मिशन।

परिणाम स्वरूप इस गाँव को त्रिनिदाद के इतिहास में स्थान मिला - एक वैविध्य पूर्ण गाँव होने का। इसी गाँव से सूत्रपात हुआ स्कूली शिक्षा का और यहीं बना देश का सबसे पहला प्रेस्बेट्रियन चर्च। दक्षिणी त्रिनिदाद के शहर प्रिंसेस टाउन के उत्तर पश्चिम में बसे एरी गाँव को सौभाग्य मिला सबसे पहले हिंदी पठन-पाठन शुरू करने का। क्या किसी ने कभी सोचा था कि भारत से हज़ारों मील दूर ग्लोब के दूसरी तरफ बसे त्रिनिदाद के इस छोटे से गाँव 'एरी' को पश्चिम में हिंदी का प्रथम पौधा लगाने का श्रेय प्राप्त होगा। कारण अथवा उद्देश्य कुछ भी रहा हो लेकिन यह एक सूत्रपात था। इस गाँव को पश्चिम का प्रथम हिंदी तीर्थ कहा जा सकता है।


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