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ISSN 2292-9754

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02.12.2016


परम्पराएँ प्रसारण की

एक समय ऐसा था जब सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से आकाशवाणी के स्टेशन डायरेक्टर को एक सम्मानित उच्च पदासीन अधिकारी माना जाता था। इन का मान-सम्मान था। प्रादेशिक केन्द्रों जैसे लखनऊ, अहमदाबाद, चेन्नई (मद्रास), मुंबई, पटना आदि के निदेशक प्रदेश के सभी सरकारी (राज्यपाल अथवा मुख्य मंत्री द्वारा आयोजित) समारोहों में एक नियम और प्रोटोकोल के अनुसार निमंत्रित किये जाते थे। सभा समारोह में इन के बैठने का स्थान भी निश्चित और लिखा होता था।

उस समय के निदेशक होते भी थे इस योग्य। ऐसे कुछ नाम मुझे इस समय याद आ रहे हैं जैसे करतार सिंह दुग्गल, बलवंत सिंह आनंद, ई एम जोसफ, बी रजनी कान्त राव, सुरेश ठाकोर, गोपाल दास, समर बहादुर सिंह, शेर सिंह शेर, पी सी चटर्जी, गिज्जुभाई व्यास, मधुभाई वैद्य कानेटकर, जी सुब्रमण्यम, जी रघुराम आदि कितने ही ऐसे नाम हैं। ये सब साहित्य, संगीत, कला के मर्मज्ञ होते थे। समाज में इन का सम्मान आकाशवाणी के केंद्र निदेशक होने के कारण नहीं था वरन इन के अपने व्यक्तित्व के कारण था। सौभाग्यवश मुझे उपरोक्त के साथ काम करने अथवा इन से मिलने का अवसर मिला।

इन में कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने समय में ही लीजेंड बन चुके थे। इन लोगों ने अपने काम करने के तरीक़ों से प्रसारण को एक नया आयाम दिया, कुछ नयी परम्पराएँ डालीं। इन के सामने ही इन के बारे में किम्वदंतियां चल पड़ी थीं। इस कारण मेरे मन में इन से मिलने और इन के संस्मरण सुनने की इच्छा रहती थी। अतः जब भी समय मिला मैं इन से मिलता ही रहा। आज बात करते हैं स्व. दुग्गल जी की –

दुग्गल जी उर्दू, हिंदी, पंजाबी और अंग्रेज़ी भाषाओँ के ज्ञाता थे। इन्होंने इन सभी भाषाओँ में कहानी, उपन्यास और नाटक लिखे। वे काफ़ी समय तक आकाशवाणी में केंद्र निदेशक रहे। विभाजन के समय वे लाहौर केंद्र पर थे और अमृतसर भी इन के कार्य क्षेत्र का एक शहर था। दूरी देखें तो मात्र 35 मील अर्थात 56 किलोमीटर। वे बताया करते थे कि हम लाहौर रेडियो की तरफ़ से अमृतसर में प्रायः संगीत और नाटक के मंचीय कार्यक्रम करते रहते थे।

एक प्रोग्राम उन के हृदय में गहरा बैठा शूल की तरह चुभता था। यह विभाजन से कुछ पहले की ही बात है। एक बार अमृतसर में नाटकों का खुले मंच का प्रोग्राम आयोजित किया गया। कार्यक्रम अभी शुरू ही हुआ था की अचानक बहुत तेज़ आँधी-तूफ़ान आ गया। थोड़ी देर तो प्रतीक्षा की कि शायद तूफ़ान थम जाये लेकिन जब देखा की यह रुकने वाला नहीं है तो ये अपना सारा सामान समेट कर और कलाकारों को लेकर अपने स्टूडियो में लाहौर आ गए। इस कार्यक्रम की याद इन्हें इस लिए सालती रही क्योंकि यह एक ऐतिहासिक घटना बन गयी। इस के बाद ही दोनों शहर – अमृतसर और लाहौर – दो अलग-अलग देशों में बँट गए।

दुग्गल जी का जन्म 1 मार्च 1917 के दिन रावलपिंडी (पाकिस्तान) में हुआ था। उस युग में यह एक बहुत बड़ी बात थी जब एक सिख लड़के ने एक मुस्लिम लड़की से शादी की थी। इन की पत्नी का नाम था आयेशा जाफरी। रिटायर होने के बाद नेशनल बुक ट्रस्ट, हिंदी अकादमी, पंजाबी अकादमी आदि अनेक साहित्यिक संस्थाओं के अध्यक्ष रहे। चूँकि ये स्वयं एक लेखक थे और पढ़ते भी खूब थे, ये अपने सहयोगियो से भी पढ़ने-लिखने की आशा करते थे।

दूसरी महत्त्वपूर्ण बात इन्हीं से जुडी है। आकाशवाणी के कार्यक्रम अनुभाग के लोगों के लिए यह आवश्यक माना जाता है कि वे अपने विषय में अद्यतन रहें। आकाशवाणी के हर केंद्र पर प्रारम्भ से ही हर सुबह कार्यक्रम मीटिंग की परंपरा रही है। इस मीटिंग में बीते हुए कल में प्रसारित हो चुके और आगामी एक सप्ताह में प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की समीक्षा की जाती है। 1970 तक यह मीटिंग निदेशक के कक्ष में ही होती थी लेकिन बाद में इस में थोडा परिवर्तन हो गया।

बात दुग्गल जी से ही जुडी है – इन के आदेशानुसार सप्ताह का एक दिन निश्चित था जब मीटिंग में लाइब्रेरी अध्यक्ष को भी आना होता था। हर व्यक्ति को अपनी पसंद की पुस्तक का विवरण लाइब्रेरी अध्यक्ष को देना होता था जिस से वह पुस्तक मँगाई जा सके। पुस्तक कविता की हो अथवा कहानी की, नाटक हो अथवा ग़ज़लें, हिंदी में हो अथवा उर्दू में, आप यह नहीं कह सकते थे की आप की पसंद की पुस्तक बाज़ार में उपलब्ध नहीं थी क्योंकि विकल्प भी आप को ही देना था।

मीटिंग का नियमित काम होने के बाद दुग्गल साब प्रत्येक अधिकारी से पूछते थे की उस ने इस सप्ताह में क्या नया पढ़ा अथवा उन की क्या मुख्य गतिविधि रही। इस का उत्तर देना सब के लिए अनिवार्य था। सब को अपनी अभिरुचि बताना भी आवश्यक था। पुस्तक मिलने के बाद हर व्यक्ति को आगामी मीटिंग में उस पुस्तक – (कहानी, कविता, नाटक अथवा उपन्यास) का संक्षेप देना, उस पर एक कार्यक्रम भी बनाना होता था। क्या इस अवधारणा से असहमत हो सकता है कोई?

इन के मित्रों में सआदत हसन मंटो ख़ास थे। मंटो की एक प्रसिद्ध कहानी थी – टोबा टेक सिंह। मैंने अनेक बार पढ़ी यह कहानी – मैंने उन से चर्चा चलायी। दुग्गल साहब ने बताया कि टोबा टेक सिंह एक वास्तविक स्थान है जो पाकिस्तान में चला गया। पीरदाद की तरह .......
94 वर्ष की आयु में 26 जनवरी 2012 को इन का निधन हुआ – श्रद्धांजलि के रूप में नमन।


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