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ISSN 2292-9754

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06.13.2016


परम्पराएँ प्रसारण की (5): रोहतक केंद्र

आपात काल की एक और घटना - उस समय के देश के प्रमुख नेता श्री बंसी लाल रक्षा मंत्री हरियाणा से थे लेकिन हरियाणा का उस समय तक कोई क्षेत्रीय आकाशवाणी केंद्र नहीं था क्योंकि तब तक प्रदेश की राजधानी पर कोई निर्णय नहीं हुआ था। कुछ शहरों के नाम पर रस्साकशी चल रही थी लेकिन वे सब राजनैतिक थी। अतः रोहतक को ही हरियाणा का केंद्र मान कर वहीँ आकाशवाणी केंद्र निर्माण का काम शुरू किया गया था। अब 1975 में वह लगभग पूरा हो गया था। 1975 में प्रोग्राम स्टाफ़ की नियुक्ति का काम शुरू हो गया। निर्देश हुए कि केंद्र जल्दी शुरू किया जाये।

सब से पहले दिल्ली से अलग-अलग केडर के हम पाँच व्यक्तिओं का ‘जत्था’ (हँसी में हम अपने को जत्थेदार ही कहते थे) जनवरी 1976 में वहाँ पोस्ट कर दिया गया। केंद्र निदेशक के रूप में श्री बी.एम. लाल की नियुक्ति हुई लेकिन वे अभी दिल्ली से ही काम करेंगे; ऐसा निर्देश दिया गया। अन्य कार्यक्रम अधिकारी के रूप में स्व. जगदीश बत्रा, श्रीमती पुष्पा अग्निहोत्री, भरत सिंह देसवाल और मैं स्वयं दिल्ली से पोस्ट हुए। शिमला से जय भगवान गुप्ता और श्याम गुप्ता आये। अहमदाबाद से गुरमीत रामल को बुलाया। सब की पोस्टिंग उन की सहमति लेकर की गयी। धीरे-धीरे और लोग भी जुड़ते गए। इसी तरह इंजीनियरिंग और प्रशासन अनुभाग में भी पोस्टिंग हुई। जनवरी 1976 तक सब लोग अपने-अपने स्थान पर आ गये क्योंकि इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए मार्च तक का बजट भी मिला था।

8 मई 1976 को रोहतक केंद्र का उद्घाटन निश्चित हो गया। उद्घाटन सूचना प्रसारण मंत्री श्री विद्या चरण शुक्ल की उपस्थिति में रक्षा मंत्री श्री बंसी लाल करेंगे। केंद्र निदेशक बी.एम. लाल मिलिट्री से निकले व्यक्ति थे। वे पैनी नज़र वाले, दूरदर्शी, मंजे हुए और सुलझे हुए व्यक्ति थे। वे उद्घाटन समारोह को एक सर्वश्रेष्ठ, रंग-बिरंगे और अनुशासित ढंग से प्रस्तुत करना चाहते थे। इस की तैय्यारी में पूरी तरह जुट गए. मंच कार्यक्रम में सूक्ष्म से सूक्ष्म बिंदु को वे नज़र अंदाज़ नहीं होने देते थे। कलाकारों के चयन के लिए वे प्रदेश के गाँव-गाँव घूमते जो भी उन्हें अच्छा लगता उसे रोहतक बुलाते, स्टूडियो में रिहर्सल देखते। यदि किसी में कोई कमी दिखाई देती, उसे वहीँ छोड़ आगे बढ़ जाते। अन्ततः उद्घाटन से एक दिन पहले यानी 7 मई की शाम को यद्यपि पूरा कार्यक्रम फाइनल कर दिया गया, फिर भी सब को कह दिया गया कि फाइनल स्टेज रिहर्सल 8 मई को सुबह् 9 बजे महानिदेशक श्री चटर्जी की उपस्थिति में होगी – यदि म.नि. को किसी की प्रस्तुति पसंद नहीं आयी तो उसे बाहर होना होगा।

सुबह 9 बजे म.नि. महोदय आ गये। लाल सा० ने उन से फाइनल फुल ड्रेस रिहर्सल देखने का निवेदन किया लेकिन चटर्जी सा० ने सपाट मना कर दिया। उन्होंने कहा कि आज मैं एक दर्शक हूँ। पूरे कार्यक्रम की अच्छाई और ख़राबी सब आप के ज़िम्मे। कार्यक्रम ठीक समय सांय चार बजे शुरू हो गया। उद्घोषणा के लिए दिल्ली से वरिष्ठतम उद्घोषक श्री उमेश अग्निहोत्री आये थे। (उमेश और पुष्प जी रेडियो की एक सर्वश्रेष्ठ जोड़ी मानी जाती रही है बाद में ये वोयस ऑफ़ अमेरिका चले गए और वहीं से रिटायर हुए। आज भी मेरे घनिष्ठ मित्र हैं – दो दिन पहले ही उन से फोन पर बात हुई)। सब कुछ सधे ढंग से चल रहा था। मंच पर एक पार्टी अपना प्रोग्राम समाप्त करती और उसी समय अगले की घोषणा शुरू होती तब तक स्टेज पर अगली पार्टी क्रमबद्ध हो जाती। कहीं कोई अन्तराल नहीं। आधा प्रोग्राम हुआ कि रक्षा मंत्री की तरफ़ से माइक पर घोषणा हुई कि एक आइटम उनका अपना एक कलाकार भी प्रस्तुत करेगा। यह भी स्पष्ट कर दिया कि उस कलाकार को किसी रिहर्सल की आवश्यकता नहीं है। लाल सा० थोड़ा सहमे कि कहीं उनकी मेहनत व्यर्थ न जाये लेकिन किस का साहस कि इसे मना कर दे। उनके कलाकार का कार्यक्रम हुआ और पूरा प्रोग्राम सहज रूप से संपन्न हो गया। किसी प्रकार की कोई अव्यवस्था नहीं हुई। ये कलाकार थे चौ० हरध्यान सिंह। ये प्रादेशिक जन संपर्क विभाग में कलाकार थे।

उद्घाटन से पहले कुछ दिन टेस्ट ट्रांसमिशन चलाया 8 मई से केंद्र ने नियमित प्रसारण शुरू कर दिया। कुछ लोग ट्रान्सफर पर आये जैसे रांची से चौहान इन्दर मोहन सिंह, कुछ नयी नियुक्तियाँ हुईं जैसे स्व० श्रीमती रूप चांदनी खुराना, लोचनी अस्थाना, गोपाल कृष्ण, हरि संधू, राजेश्वर वशिष्ठ। राम कुमार शर्मा, अवतार पराशर, आशा शुक्ला। एक दिन - रविवार को शाम के 4 बजे अचानक लाल सा० ने हम सब को बुलाया। आदेश हुआ कि कहीं से भी चौ० हरध्यान सिंह को बुला कर लाओ। हम सब पसोपेश में क्योंकि न उद्घाटन से पहले और न ही बाद में उन से कोई सम्पर्क हुआ था।

कोई उन्हें जानता भी नहीं था। लाल सा० ने बताया कि कल यानी सोमवार से उन्हें बुला कर अपने केंद्र पर नियुक्ति देनी है। नियमानुसार किसी भी राजपत्रित पोस्ट पर नियुक्ति का अधिकार के.नि. को नहीं होता। यह नियुक्ति म.नि. ही कर सकता है। लेकिन आदेश आदेश है "आज के हालात में वही नियम और क़ानून है जो ऊपर वाला चाहे"। अतः सोमवार को श्री हरध्यान सिंह जी को केंद्र का राजपत्रित अधिकारी बना दिया गया। उन के सारे काग़ज़ात तैयार कर म.नि. भेज दिए गए।

यहाँ यह कहना भी आवश्यक है श्री सिंह एक बहुत ही विनम्र, हँसमुख और मिलनसार व्यक्ति निकले। किसी को नहीं लगा कि उन की पीठ पर वरद हस्त है। आपातकाल समाप्त होने पर उन्होंने स्वयं ही वापस जाने की बात कही और वे सब से मिल कर विदा हुए। इसी तर्ज़ पर एक और नियुक्ति केंद्र पर लादी गयी थी लेकिन वह फलीभूत नहीं हो सकी क्योंकि अचानक आपातकाल समाप्त हो गया।

आपातकाल समाप्त होने पर गाड़ी का पहिया उल्टा चलाने का प्रयास किया गया। जाने अनजाने लोगों ने प्रतिशोध लेने शुरू किये। किसी ने मंत्रालय में शिकायत की कि लाल सा० इमरजेंसी के पक्के समर्थक थे। सबूत में शिकायतकर्ता ने चौ. हरध्यान सिंह का मामला बताया। परिणाम स्वरूप लाल सा० का ट्रान्सफर गोवा कर दिया गया। कहाँ तो वे यहाँ से सेवा निवृत्त हो कर अपने घर जाना चाह रहे थे और कहाँ यह रोज़े गले पड़ गए। म.नि. चटर्जी भी इस में विवश दिखाई दिए। लेकिन हारिये न हिम्मत बिसारिये न राम वाली उक्ति काम आयी।

जिस दिन चौ० हरध्यान सिंह की नियुक्ति के आदेश फोन पर आये थे और जिस दिन उन्होंने ज्वाइन किया – पूरी गतिविधि और अपनी मानसिक स्थिति का ब्यौरा लाल सा० ने लिख कर अपनी एक फ़ाइल में रखा हुआ था। उन्होंने ट्रान्सफर को रुकवाने के आवेदन के साथ अपनी फ़ाइल का यह पृष्ठ लगा कर म.नि. चटर्जी के पास भेजा। अब इतने वर्षों के बात मुझे कहने में कोई संकोच नहीं कि इस पत्र को दिल्ली ले जाने और सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने का उत्तरदायित्व मेरा ही था। अंततः उन का वह ट्रान्सफर आदेश रद्द हुआ। बाद में उन्हें पदोन्नति पर विदेश प्रसारण सेवा का निदेशक बना कर दिल्ली भेजा गया। परंपराएँ इसी तरह बनती और टूटती हैं।

आकाश पर छा रहे बड़े सितारे की छत्र छाया में स्थानीय प्रद्योत भी निर्द्वंद्व आँख मिचौनी खेल रहे थे। हरियाणा भी इस का अपवाद नहीं था।


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