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ISSN 2292-9754

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04.30.2016


परम्पराएँ प्रसारण की (4) आपात काल

इस से पहली कड़ी में आपात काल के दौरान सह सचिव आर एन प्रसाद और चटर्जी साब की बातचीत के अंश थे। इसी पृष्ठ भूमि से -

25 जून 1975 को आपातकाल लागू होने से देश का एक तरह से नक़्शा ही बदल गया था। सत्ता और सुरक्षा की साँठ-गाँठ हो गयी थी। पुलिस की वर्दी में एक छोटा अधिकारी भी एक वरिष्ठ सिविल कर्मचारी से अधिक विश्वसनीय हो गया था क्योंकि उस के हाथ में डंडा था। चटर्जी जैसे पढ़े-लिखे और आत्मविश्वासी व्यक्ति बहुत कम थे। इंदिरा गाँधी ने ग़रीबों और पिछड़े वर्गों के उद्धार के लिए 20 सूत्री कार्यक्रम बनाया। इस से पहले वे बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर चुकी थी और भूतपूर्व देसी रियासतों के राजाओं के प्रिवी पर्स भी समाप्त कर दिए गए थे। यहाँ मुझे याद आते है सर थॉमस मोर। ये 16 वीं शताब्दी में इंग्लैंड में हुए थे और एक विचारक और दार्शनिक थे।

उन ने सन 1516 में एक किताब लिखी – यूटोपिया (Utopia)। उन्होंने इंग्लैंड के सम्राट किंग हेनरी VIII को यह अवधारणा दी – यूटोपियन समाज की। यूटोपियन अर्थात एक पूर्ण परफेक्ट और आदर्श समाज जिस में सब को न्याय मिले, कोई ग़रीब न हो, कोई बेरोज़गार न हो, हर दृष्टि से हर व्यक्ति सुखी और संपन्न हो आदि आदि । यह एक प्रकार से काल्पनिक मानसिक उडान थी। शायद बीस सूत्री योजना इसी से प्रेरित थी। उद्देश्य कितना ही अच्छा हो लेकिन किसी भी योजना को बनाना और उसे क्रियान्वित करना – दोनों में काफ़ी अंतर होता है। यहाँ यह समझा गया कि क्रियान्वयन का काम रेडियो यानी आकाशवाणी का ही है क्योंकि उस समय यह एक मात्र सरकारी मीडिया तंत्र था।

इस तरह हमारी सत्ताधीश सरकार ने गोयबल्स और डॉन क्विक्जोट को भी पीछे छोड़ दिया। एक ब्लॉग में उदाहरण सहित लिखा है कि इंदिरा गाँधी के प्रेरणा स्रोत अडोल्फ़ हिटलर थे। शायद वे ठीक ही हों। गोयबल्स हिटलर का प्रचार मंत्री था। उस का सिद्धांत था की यदि कोई झूठ 100 बार बोला जाये तो वह 101 वीं बार सच मान लिया जायेगा। देश के हर आकाशवाणी केंद्र को 20 सूत्रों पर पूरे ज़ोर-शोर से कार्यक्रम करने के निर्देश ज़ारी कर दिए गए।

सू.प्र. मंत्रालय में श्री आर.एन. प्रसाद IPS की अध्यक्षता में एक कमेटी बनी जिस का काम इस सारे अभियान को मॉनिटर करना था। केन्द्रों को निर्देश दिए गए कि वे इस पर आधारित एक साप्ताहिक रिपोर्ट म.नि. भेजे और म.नि. केन्द्रों की रिपोर्ट पर आधारित एक Consolidated रिपोर्ट मंत्रालय को भेजे। मंत्रालय में एक प्रकोष्ठ बना जिसका काम था। इस रिपोर्ट का टेबुलेशन और उस की एक समीक्षात्मक रिपोर्ट एक चार्ट के रूप में तैयार करना।

इस में ऊपर की पंक्ति में बायें से दायें एक-एक खाने में सूत्र के नाम होते थे और बायीं तरफ़ ऊपर से नीचे केंद्र के नाम होते थे। चार्ट एक बड़ी टेबल टॉप के आकार का होता था। टेबुलेशन और समीक्षा करते थे कमेटी के दूसरे सदस्य डॉ. एन. भास्कर राव। राव साब कम्युनिकेशन रिसर्च के व्यक्ति थे।

तीसरे व्यक्ति होते थे आकाशवाणी के महानिदेशक चटर्जी सा० स्वयं जिनको इन दोनों की टिपण्णी सुननी होती थी। लेकिन वे भी साथ में अपनी टिपण्णी देते रहते थे।


अब आप अपनी कल्पना में वह विडियो देखें (यह वास्तविकता पर आधारित एक उदहारण मात्र है)

बीस सूत्र - महिला कल्याण, बाल श्रम की रोक-थाम श्रमिक कल्याण, अनुसूचित जन जाति कल्याण, किसानों को ऋण, ग्रामीणों के कर्ज़ की माफ़ी, बंधुवा मजदूरी की रोक-थाम, ग्रामीण विकास – आवास व्यवस्था आदि आदि।

मान लीजिये अक्टूबर 1975 - 15 से 21 अक्तूबर की रिपोर्ट पर चर्चा चल रही है -

भास्कर राव:– इस सप्ताह में सूत्र 1 (किसानों को क़र्ज़ की माफ़ी) अहमदाबाद केंद्र ने 40, भुज ने 50, बंगलौर ने 15, दिल्ली ने केवल 4……. प्रोग्राम किये –

प्रसाद सा०:– चटर्जी साब, दिल्ली केंद्र को कसिये – इस तरह से नहीं चलेगा।

चटर्जी सा०:– (होंठो में) Rubbish

भास्कर राव:– सूत्र नंबर 12 अनुसूचित जन जाति कल्याण – जालंधर 30, जयपुर 35, रोहतक 15 ……… आदि आदि कार्यक्रम किये।

प्रसाद सा०:- ये बिलकुल ठीक नहीं है – आप के ये रेडिओ स्टेशन कुछ कर नहीं रहे हैं

चटर्जी सा०:- …..(होठो में) ……Non sense

इस के बाद वह वार्तालाप था जो पूर्णतः सत्य है –

“चटर्जी साहब, आप देख-भाल कर काम कीजिये ऐसा न हो नौकरी से हाथ धो बैठें।”

“प्रसाद साहब, अपनी चिंता करो - आप पुलिस वाले हैं। यहाँ के बाद आप को नौकरी की मुश्किल पड़ेगी। मेरी फ़िक्र मत करो, मेरा इस्तीफा हमेशा मेरी जेब में रहता है, आज भी तीन यूनिवार्सिटी की वाईस चांसलरशिप की ऑफ़र मेरे पास है।” (एक समय चटर्जी साब के पिता लाहौर वि.वि. के वाईस चांसलर रह चुके थे)

"अरे रे आप तो बुरा मान गए – मैं तो मज़ाक कर रहा था," प्रसाद साब फीकी हँसी से बोले।

"परन्तु प्रसाद साब मैं बिलकुल सीरियस हूँ….। मेरे पास तो मेरी किताबों की रायल्टी ही काफ़ी होती है।”

इन के साथ संजय गांधी ने भी अपना पाँच सूत्रीय कार्यक्रम शुरू किया। इन के सूत्र थे - वयस्क शिक्षा, -दहेज प्रथा की समाप्ति, वृक्षारोपण और परिवार नियोजन और जाति प्रथा उन्मूलन।

चटर्जी सा० ने इन दोनों महानुभावों को भरसक समझाने का प्रयत्न किया कि जालंधर और रांची की समस्याएँ अलग-अलग हैं, गुवाहाटी और शिमला में काफ़ी अंतर हैं, पटना और भुज में कोई मेल नहीं है अतः कार्यक्रम भी स्थान विशेष के अनुसार होते हैं। लेकिन कोई समझने को तैयार ही नहीं था। कुछ समय के बाद मंत्रालय ने इस कमेटी द्वारा बनाई गयी एक भारी भरकम रिपोर्ट म.नि. को भेजी थी। चटर्जी सा० ने उस पूरी रिपोर्ट को पढ़ा और उस के हर पृष्ठ के बायीं तरफ़ अपने संक्षिप्त टिपण्णी – Rubbish और Nonsense अथवा Agree लिख कर प्रत्येक केंद्र को भेज दी।

आपात काल में इस तरह के निर्भीक व्यक्ति विरले ही देखने को मिलते थे। ये बी.बी. भोंसले जैसे सीधे और शरीफ़ इंसान थे जो आपात काल की बलि चढ़ गए। भोंसले साब अपने अनूठे मराठी अंदाज़ के व्यक्ति थे। भरी गर्मी में भी अपना काले रंग का कोट और काली टोपी पहन कर आते थे। ग़लत काम तो उनसे हो ही नहीं सकता था क्योंकि ठीक काम करते समय भी वे कई बार सोचते थे। कोई भी काम करने से पहले – यहाँ तक कि – ऑफिस के किसी भी काग़ज़ पर भी हस्ताक्षर करने से पहले अपने नाक का स्वर देखते थे कि वह अनुकूल है अथवा प्रतिकूल। अपनी इसी अनिर्णय के स्वभाव के कारण आपातकाल में उनकी छुट्टी कर दी गयी। यह एक अकेली इस तरह की घटना थी। मुझे बहुत ही क्षोभ हुआ था।


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