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ISSN 2292-9754

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03.02.2016


परम्पराएँ प्रसारण की (2) – दो छोर

 मुझे श्री बी.एस. आनंद प्रायः याद आते हैं – उन के साथ कभी काम नहीं किया। वे जालंधर में थे और मैं अहमदाबाद में। लेकिन बहुत बार उन से उन के संस्मरण सुने। पहली भेंट उन से हुई जब वे रिटायर हो कर स्टाफ़ ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट में लेक्चर देने के लिए आये थे। चुस्त-दुरुस्त कसी हुई पगड़ी, आकर्षक व्यक्तित्व। उन का लेक्चर एक प्रकार से अनौपचारिक और व्यवहारिक अनुभवों से भरपूर था। लेक्चर में ही उन्होंने बताया कि वे प्रधान मंत्री पंडित नेहरु के साथ ही केम्ब्रिज में पढ़े हैं। हम सब के लिए यह एक बहुत बड़ी बात थी। हम ने पूछा, "क्या आप दोनों क्लास फेलो थे?"

"नहीं, क्लास फ़ेलो तो नहीं, हाँ, कालिज एक ही था क्लास अलग। हम वहाँ इंडियन स्टूडेंट्स एसोसिएशन की मीटिंग में मिलते थे," उन का उत्तर था। हमने निवेदन किया, "इस से जुड़ा कोई संस्मरण सुनाएँ।" आनंद साहब ने बताया।

वे जालंधर आकाशवाणी केंद्र के डायरेक्टर थे। एक दिन सन्देश मिला कि उन्हें अमुक दिन प्रधान मंत्री निवास पर बुलाया गया है। सन्देश पर विश्वास नहीं हुआ, कुछ अजीब सा भी लगा कि उन्हें पी.एम. हाउस पर सीधे इस तरह से बुलाएँ। महा निदेशालय से मालूम किया लेकिन वहाँ भी किसी को कुछ ख़बर नहीं। दिल में धुकधुकी सी हुई। सोचते रहें कि कहीं कोई ग़लती हुई या किसी ने कुछ शिकायत की। जो भी हो नींद उड़ गयी। एक तरह से जान सांसत में और जाना भी ज़रूरी। अपनी तरफ से हमने क़ायदे क़ानून के अनुसार सब को सूचित किया और म० नि० से स्वीकृति भी ले ली।

निश्चित तिथि पर तीन मूर्ति भवन पहुँच गए। रेसप्शन पर अपना नाम दिया। जैसा कि होता है उन के पास भी मेरा नाम था। मुझे बताया गया कि "अभी कोई विशेष मीटिंग चल रही है, थोड़ा इंतज़ार करें, आप का नंबर आएगा तो बुला लेंगे"। हम वहीँ लॉन में बैठ गए। अन्दर दिल ने धुक धुक कि ‘यह पेशी किस लिए है, ऑफिस के प्रोटोकोल में मेरी कहीं गिनती नहीं, व्यक्तिगत रूप से मेरी कोई मित्रता नहीं।’ लगभग एक घंटा के बाद मीटिंग ख़त्म हुई। देखा पंडित नेहरु किसी विदेशी मेहमान को छोड़ने बाहर तक आये थे। उन्हें छोड़ने के बाद जैसे ही अन्दर जाने लगे तो उन्होंने एक नज़र लॉन में इंतज़ार करते हुए लोगों की तरफ़ डाली और अन्दर चले गए।

इन्हीं में मैं भी था और लगा कि उन्होंने मुझे देख लिया है। कुछ समय बाद मुझे सन्देश मिला कि अभी थोड़ी देर में आप को बुलाते हैं। लगभग आधा घंटा के बाद एक व्यक्ति मुझे ले जाने के लिए आया। धड़कते दिल से मैं अन्दर गया, सामने हाथ जोड़ कर नमस्ते की। परन्तु प्रधान मंत्री खड़े होकर गले लगे और ज़ोर से बोले, "अरे बलवंत सिंह कहाँ हो, अभी कुछ दिन पहले पता चला कि आप जालंधर में हो।"

"कुछ बात थी सर?"

"अरे नहीं भाई, आप के पंजाब के गवर्नर की कोई रिपोर्ट आयी थी जिस में बलवंत सिंह आनंद का नाम था। मैंने सोचा यह कोई और नहीं आप ही होंगे।"

मेरी मानसिक स्थिति अभी भी संतुलित नहीं थी। मैंने हिम्मत कर के पूछा – "कैसी रिपोर्ट सर?"

"अरे भाई आप पंजाब गवर्नर के यहाँ किसी मीटिंग में गए थे, रिपोर्ट में मीटिंग में आने वालों के नामों की लिस्ट होती है। उस में आप का नाम था – मैंने पढ़ा तो लगा कि ये वही आनंद हैं जो कभी कैम्ब्रिज में हमारे साथ थे। सोचा बुला कर बात ही की जाये।"

मेरी जान में जान आयी। एक तो पंजाब उस समय बड़ा प्रदेश था – इस में हरियाणा, हिमाचल और चंडीगढ़ भी शामिल थे। उन दिनों राज्य के गवर्नर एक देसी रियासत के पूर्व महाराजा थे इस लिए थोडा तुनुक मिज़ाज भी थे। जालंधर आकाशवाणी केंद्र पंजाब का क्षेत्रीय केंद्र था। उन दिनों आकाशवाणी के क्षेत्रीय केंद्र के निदेशक राज्य स्तर के सभी समारोह तथा मीटिंग में निमंत्रित होते थे। उन के लिए भी एक प्रोटोकोल था। अतः मुझे सरकारी मीटिंग में जाना ही होता था। तसल्ली यह हुई कि इतने वर्षों के बाद भी प्रधान मंत्री को मेरी याद थी। थोड़ी देर बातचीत करने के बाद मैंने उन से विदा ली। उनके यहाँ से निकल कर एक आज़ाद पक्षी की तरह राहत की साँस ली। यह एक तरह से किसी लम्बी डोर के दो छोरों के मिलने जैसा था।" स्टाफ़ ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट के हम सब युवकों के लिए भी यह एक आश्चर्य ही था।

समय बीतता गया। हम दिल्ली विदेश प्रसारण सेवा से होते हुए रोहतक पहुँच गए। एक दिन के. नि. लाल साहब ने बुला कर कहा – आप बी.एस. आनंद जी को जानते हो, वो आज यहाँ हैं – उन के कुछ संस्मरण रिकॉर्ड कर लो। नेकी और पूछ-पूछ। मालूम यह हुआ कि उन का बेटा हरजीत सिंह आनंद आईएएस हो गया है और उन की पहली पोस्टिंग एसडीएम के तौर पर रोहतक हो गयी है। इस का सीधा अर्थ अब आनंद साहब रोहतक आते रहेंगे।

इस तरह अनेक बार उन से मिलना हुआ – बहुत सी बातें हुई। हरजीत सिंह जी ने बाद में पीएच.डी. की, उन के विवाह के अवसर पर आनंद साब ने हमारे ग्रुप को भी आमंत्रित किया था हरजीत सिंह भारत सरकार के सचिव पद से रिटायर हुए हैं।

इसी तरह एक और घटना। एक दिन जब आनंद साहब रोहतक आये हुए थे तो उन्होंने हमारे केंद्र के एक पुराने कर्मचारी श्री सहगल को देखा। वह जलंधर और दिल्ली केंद्र पर काम कर चुका था। चतुर्थ श्रेणी में भी उस का दर्जा एक सुपरवाइज़र जैसा था। अतः वह प्रायः सूट और टाई में आना पसंद करता था।

यहाँ थोड़ी सी बात ऑफिस की व्यवस्था से सम्बंधित - जैसा की प्रत्येक ऑफिस में होता है आकाशवाणी में भी कुछ पद केवल यहीं के लिए विशिष्ठ होते थे। जैसे भारत सरकार के अन्य कार्यालयों में LDC/UDC होते हैं। आकाशवाणी में UDC के समकक्ष प्रोग्राम सेक्रेटरी होता था। उस की पदोन्नति भी आगे उसी केडर में ही होती थी। इसी तरह चतुर्थ श्रेणी पदों में कुछ विशिष्ठ पद थे – स्टूडियो अटेंडेंट, स्टूडियो गार्ड आदि। जिन दिनों की हम बात कर रहे हैं उन दिनों एक पद का नाम स्टूडियो कमिशार होता था। यह चतुर्थ श्रेणी में नीचे से ऊपर दूसरे नंबर पर होता था। इस पद के व्यक्ति का काम स्टूडियो की आवश्यकताओं को देखना, वहाँ की साफ़ सफ़ाई कराना, स्टूडियो में पानी की व्यवस्था कराना, वार्ताकारों, कलाकारों आदि को ठीक से बैठना आदि था।

आनंद साहब ने बताया कि एक बार राज्य सरकार के एक स्थानीय समारोह का निमंत्रण पत्र आया। वे स्वयं अन्यत्र व्यस्त थे अतः उन्होंने खेद का पत्र समय रहते भेज दिया। कुछ दिनों के बाद राज्य सरकार के एक अधिकारी आनंद साब से अचानक मिले तो उन्होंने आनंद साब से समारोह में उन की अनुपस्थिति की चर्चा की। आनंद साब ने कहा कि वे अन्यत्र व्यस्त थे और उन्होंने खेद की सूचना भेज दी थी। अधिकारी महोदय ने बताया कि आप का खेद पत्र भी मिला और आप आये भी नहीं लेकिन आप के कमिश्नर महोदय तो आये थे। कमिश्नर महोदय – आनंद साब ने कहा हमारे यहाँ तो कोई कमिश्नर जैसा व्यक्ति नहीं होता – अधिकारी महोदय ने पूरे विश्वास से कहा, नहीं वे आये और उन्होंने स्वयं को आकाशवाणी का कमिश्नर बताया। आनंद साब ने उन से कुछ नहीं कहा लेकिन इस की जाँच शुरू कर दी।

अंत में पता लगा की हमारे स्टूडियो कमिशार साब कमिश्नर बन कर समारोह में पहुँच गए थे। उन्हें मालूम था कि निदेशक महोदय तो आयेंगे नहीं और इतने बड़े समारोह में किसी को पता भी नहीं चलेगा। आनंद साब ने उसी समय म.नि. से इस पद नाम बदलवा कर स्टूडियो अटेंडेंट कराया। इसी तरह कुछ अन्य पदों के नाम भी बदले गए -

कबिरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोय।
आप ठगे सुख होत है , और ठगे दुख होय॥


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