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ISSN 2292-9754

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12.07.2015


मेरी घरेलू लाइब्रेरी

आदरणीय भारद्वाज जी

"मैंने अपनी बेटी को बड़े ही नाज़ों से पाला है, घर में सबकी लाड़ली रही है, काम काज में बहुत ही होशियार है, अब आप के घर जा रही है, कृपया इस का ध्यान रखना।" - इसी तरह के शब्द होते हैं जो कन्या की विदाई के समय कन्या के पिता के मुख से प्रायः निकलते हैं। वह वर के पिता से अपनी बेटी के कल्याण के लिए एक मूक आश्वासन चाहता है। इन भावों में आंतरिकता होती है और इन में छिपी होती है एक पिता की संवेदना भी। पिता के हृदय में बेटी से बिछुड़ने का दुःख भी होता है लेकिन एक आंतरिक सुख भी होता है कि उन्होंने अपना एक बड़ा उत्तरदायित्व निबाह दिया।

इसी तरह के भाव आज मेरे मन में भी उमड़ रहे थे जब मैंने अपनी घरेलू लाइब्रेरी के आज के अन्तिम बंडल को आपकी कार में रखा। मैं उस समय भावुक हो गया था लेकिन आश्वस्त भी था।

जी हाँ, मैंने भी बड़ी ही नाज़ो-नज़ाकत से इन्हें प्राप्त किया था या जुटाया था, इन्हें सँभाल कर रखा था, इन के लिए अपने नए फ्लैट के एक कमरे में विशेष प्रकार के शेल्फ बनवाए, शीशे के स्लाईडिंग दरवाज़े लगवाये, पुस्तकों को करीने से लगाया, अपने अनुकूल वर्गीकरण किया। कितना आनंद आता था अपनी इस घरेलू लाइब्रेरी में बैठकर। घूमती कुर्सी पर बैठकर लगता जैसे कि पूरी दुनिया मेरे पास है। आज लग रहा है कि सब बंधन और सीमायें तोड़ कर ये शेल्फ मुझे मुँह चिढ़ा रहे हैं, मेरी बेबसी पर हँस रहे हैं, मज़ाक उड़ा कर कह रहे हैं कि "अब तुम बूढ़े हो चले हो, वानप्रस्थ आश्रम से निकल रहे हो। अब मोह छोड़ो और भगवान का भजन करो।" मैंने भी बात मान ली और अन्य कोई विकल्प भी नहीं था। \

पिछले दो महीने से इसी तैयारी में लगे थे। पहला काम था उचित स्थान यानी सुपात्र लाइब्रेरी की खोज। दृष्टि रुकी प्रवासी भवन पर चूँकि अधिकांश साहित्य डायस्पोरा से सम्बंधित था। स्व० बालेश्वर जी के बाद श्री भारद्वाज ही घनिष्ठ थे अतः उन से ही पूछा। वे तैयार हो गए लेकिन उन्होंने महासचिव श्री परांधे जी की अनुमति लेनी होगी। उन का सुझाव था कि यदि पुस्तकों की एक सूची बन जाये तो ठीक रहेगा। सुझाव ठीक था और हम बैठ गए सूची बनाने। लेकिन यह काम इतना सरल नहीं था। अपने दौहित्र विपुल की मदद से एक सूची बनाई गयी लेकिन उस से मैं स्वयं ही संतुष्ट नहीं था अतः फिर से श्री भारद्वाज जी से निवेदन किया और फिर से उन्होंने पूरी मदद की - अपने लाइब्रेरी सहायक भेज कर। इस तरह काम पूरा हुआ। प्रवासी भवन के पुस्तकालय सहायक श्री सुभाष की सेवा उपलब्ध कराई और वास्तव उस का योगदान अतुलनीय है। वह एक समझदार, होशयार, कर्मठ और दृढ़ निश्चयी व्यक्ति है। साथ में हंसमुख भी।

मेरी अधिकांश पुस्तकों के अंदर के बाँयीं तरफ के कोने पर मेरे हस्ताक्षर और उसे प्राप्त करने की तारीख लिखी है। सूची बनाते समय सुभाष ने देखा की कुछ पुस्तकें 1960 /1962 की हैं और कुछ बिलकुल ताज़ी अर्थात 2015 की हैं। कुछ पर पुस्तक की कीमत भी लिख दी है और उपहार स्वरुप प्राप्त पुस्तकों पर देने वाले के प्रति आभार भी व्यक्त है। \

सुभाष ने आखिर मुझ से पूछ ही लिया सर - आपने पुस्तक खरीदने की शुरुआत कैसे की। मैंने थोड़ा दिमाग पर ज़ोर डाला और सोचा। मुझे 1958 का वह दिन याद आया जब मैं सहारनपुर में इंटरमीडिएट का विद्यार्थी था। मेरा एक घनिष्ठ मित्र था वीरेंद्र शर्मा। हम दोनों मित्र होते हुए भी स्वभाव में दो विरोधी पोल थे। वह एक दम खुराफ़ाती और उद्दंडी और मैं नितांत सीधा सादा। मैं सदा अपनी क्लास के लिए और परीक्षा के लिए चिंतित रहने वाला। हम एक साथ ही स्कूल जाते और एक साथ ही आते। अक्सर उस के उद्दंड से प्रताड़ित व्यक्ति मुझ से उस की शिक़ायत करते और मैं उसे कहता - वीरेंद्र किसी को ज़्यादा तंग नहीं करते। वह सुनता और भूल जाता। प्रायः हम दोनों अपने शहर के रेलवे स्टेशन तक घूमने जाते। अपनी आदत के अनुसार मैँ पन्दरह/बीस दिन के बाद अपनी पाकिट के बचे पैसों से स्टेशन के बुक स्टाल से एक किताब खरीद लेता। उन दिनों पुस्तकों की कीमत ही अधिक से अधिक एक रुपया होती थी। एक दिन वीरेन्द्र ने मेरी इस आदत पर टिप्पणी की कि "देखना एक दिन तुम्हारे पास अपनी एक घरेलू लाइब्रेरी होगी और उस में हर तरह की पुस्तकें होंगी।" इसी तरह की बात होती रही। आज 58 वर्षों के बाद सोचता हूँ कितनी सच थी उस की भविष्यवाणी। मुझे मालूम नहीं वीरेन्द्र आज कहाँ है। जहाँ कहीं भी है उसे मेरा नमन।

मेरे इस पुस्तकालय में काफी उपहार स्वरुप मिली पुस्तकें हैं। त्रिनिदाद में ग्रैंड बाजार में R.K. बुक स्टोर के स्वामी ने मुझे विदाई के समय तंत्र विद्या तथा त्रिनिदाद टोबैगो के इतिहास पर बहुत ही सुन्दर, महँगी और भारी भरकम पुस्तकें भेंट की। इन में एक तो रंगीन प्लेट्स की ही है। युवान तिलकसिंघ ने सोरेस रमेसर की लिखी पुस्तक Survivors of Another Crossing भेंट की जो एक अमूल्य पुस्तक है।

महाकवि प्रोफेसर हरी शंकर आदेश ने संगीत और खेल कूद के माध्यम से त्रिनिदाद - टोबैगो में हिंदी का अलख जगाया था। यह एक प्रकार से सांस्कृतिक क्रांति थी। 1996 में पाँचवा विश्व हिंदी सम्मलेन त्रिनिदाद में आयोजित किया गया था। मेरे ऊपर उस के सम्पूर्ण संयोजन से लेकर आयोजन तक का उत्तरदायित्व था मैंने अपने उद्बोधन में आदेश जी के योगदान की चर्चा की थे तो प्रसन्न हो कर आदेश जी ने अपना संगीत और हिंदी का पूरा खज़ाना मुझे भेंट में दिया था।

लेकिन इन सब में भारी और बहुमूल्य भेंट थी कोटा शहर के उस्मानपुरा में रहने वाले जोधपुर विश्वविदयालय से रिटायर हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. कन्हैया लाल शर्मा की लिखी हिंदी व्याकरण। कोटा (राज०) के आकाशवाणी केंद्र का उद्घाटन 4 जनवरी 1987 को हुआ था। मेरी नियुक्ति दो महीने पहले हो गयी थी जिससे मैं उद्घाटन पूर्व की तैयारियाँ कर सकूँ। इन में एक काम होता है प्रतिभा चयन (talent scouting) का अर्थात अपने केंद्र के कार्यक्षेत्र की प्रतिभा संपन्न व्यक्तियों की खोज और उन की सूची बनाना और उन से मिलना आदि।

इसी सन्दर्भ में मैं एक दिन डॉ. कन्हैया लाल शर्मा से मिलने उन के घर पहुँच गया। अपने बारे में उन्हें बताया की इस शहर में आकाशवाणी केंद्र खुलने जा रहा है और इस में आप का सहयोग भी आवश्यक होगा। भेंट ठीक रही - केंद्र प्रारम्भ हो गया। यह केंद्र अन्य केन्द्रों से अलग तरह का 'स्थानीय' था अर्थात स्थानीय मुद्दों पर विचार-विमर्श और प्रसारण के लिए। देश में इस किस्म का उस समय तक यह दूसरा केंद्र था। 1988 में मेरा ट्रांसफर कोटा से दिल्ली हो गया। मैं चलने से पहले सभी स्थानीय मित्रों से मिला। डॉ. शर्मा से भी मिलने गया। मेरे ट्रांसफर की बात से शर्मा जी थोड़ा विचलित से लगे। तभी जैसे उन्हें कुछ याद आया। वे घर के अंदर गए और एक जीर्ण-शीर्ण सी पुस्तक ले कर आये। कहने लगे "गोयल साब आपने हाड़ोती भाषा के लिए बहुत काम किया है और मैं आप से बहुत अधिक प्रभावित हूँ। मेरे पास और तो कुछ नहीं है देने के लिए - बस काफी पहले लिखी हुयी मेरी यह एक हिंदी - हाड़ोती की व्याकरण हैं। मेरे पास केवल दो ही प्रतियाँ बची हैं - इन में से एक मैं आप को देना चाहता हूँ। ना मत करियेगा।" मैं कुछ नहीं कह सका। पुस्तक ली और प्रणाम कर वापिस आ गया। ये ऐसी कुछ घटनाएँ हैं जो हृदय पर अमिट छाप छोड़ गई हैं।

श्री मद्भगवत्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने मोह माया के बंधन और त्याग की बात की है। देखने में दोनों अवधारणा एक दूसरे विपरीत लगती हैं लेकिन ऐसा नहीं है। दोनों ही परस्पर जुड़ी हैं। सीधे सादे शब्दों में कहूँ की यह मेरा मोह माया का बंधन ही था जो मैं इन्हें हर ट्रांसफर पर अपने साथ लिए घूमता था। इस तरह का पागलपन मैंने अपने विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी स्व० शेर सिंह शेर में देखा था। वे पंजाबी के कवि थे और 'शेर' उन का तख़ल्लुस था। उन के भी ट्रांसफर बहुत हुए। वह एक ऐसा समय था जब ट्रांसफर अत्यधिक कष्टकारी होते थे लेकिन उन्हें नियति माना जाता था। स्व० शेर के पास काफी पुस्तकें थी और वे उन्हें अपने कलेजे से लगाये रखते थे। उन्होंने पुस्तकों के लिए लोहे के बक्से बनवा रखे थे। उनकी देखा-देखी मैंने भी बक्से बनवाए। अब यह मेरा 'उभरता' त्याग है जो मैं इन पुस्तकों को अपने से अलग कर सका।

\इन के अतिरिक्त कुछ पुस्तकें मित्र लोग ले गए। भारतीय विद्या भवन की 6 वॉल्यूम में फैली Indian culture वेदांती श्री देवेश मिश्रा जी को पसंद आ गयी। मिश्रा जी गत 6 वर्षों से हमें रामचरित मानस और उपनिषद् पढ़ा रहे हैं। इसी तरह Book of Knowledge के सात बड़े वॉल्यूम मेरी पुत्रवधु अपर्णा गोयल ने कनाडा मंगा ली। ये मैंने 1978 में कनॉट प्लेस के शंकर मार्किट की पुरानी पुस्तकों की दूकान के स्वामी स्व. शर्मा जी की ज़िद्द पर (अच्छी ज़िद्द) पर उनसे खरीदे थे। वे प्रायः ऐसी पुस्तकें मेरे लिए रखते थे। अपर्णा को श्री मद्भागवत के भारी भरकम दो वॉल्यूम भी साथ में दिए। 13 वॉल्यूम का बड़ा भारी विश्वकोश बड़े भाई साहब श्री प्रेम नाथ गोयल को दिए। इस तरह लगभग 700 पुस्तकें दी जा चुकी हैं।

भारतीय विद्या भवन और Future Point से ज्योतिष की डिग्री ली थी अतः ज्योतिष की पुस्तकें जुड़ गयी। रिटायर होने के बाद से डॉ के.के. अग्रवाल अध्यक्षता में 'गीता ज्ञान गोष्ठी' के संस्थापक सदस्य बने। गत १४ वर्षों से प्रत्येक बृहस्पतिवार को सांय ६ से ८ तक नियमित रूप से गोष्ठी होती है। इसमें गीता का पाठ और उस की व्याख्या होती है। इस कारण गीता के विभिन्न संस्करण एकत्र हो गए हैं। इन दोनों विषयों की पुस्तकें अभी सुरक्षित हैं।

\मुझे विश्वास है कि पुस्तकें प्रवासी भवन के अनुकूल हैं और सभी व्यक्ति उन्हें पसंद करेंगे। प्रवासी भवन के उपरोक्त ही नहीं वरन सभी अधिकारियों का आभारी हूँ।

सादर
बी.एन. गोयल




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