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ISSN 2292-9754

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02.20.2015


हिंदी के लिए लिपि - रोमन अथवा देवनागरी

अँग्रेज़ी के एक उदीयमान उपन्यासकार ने हाल ही में प्रकाशित अपने एक लेख में हिंदी भाषा के लिए रोमन लिपि अपनाने का सुझाव दिया है। मैं यह मानता हूँ कि ये लेखक हिंदीभाषी व्यक्ति हैं और हिंदी लिखना-पढ़ना बख़ूबी जानते हैं। इन्होंने अँग्रेज़ी मैं काल सेंटर में एक रात की घटनाओं पर आधारित एक सरल, सहज उपन्यास लिखा था जो युवा पाठकों में काफी प्रसिद्ध हुआ। यह अच्छी बात है। इन से पहले विक्रम सेठ जैसे और भी अनेक प्रसिद्ध हिंदीभाषी अँग्रेज़ी के जाने-माने उपन्यासकार हैं, लेकिन इस तरह लिपि परिवर्तन का सुझाव किसी ने नहीं दिया। यह सुझाव एक तरफ़ा है, बिना माँगा है और इस से हिंदी भाषा अथवा लिपि को कोई अंतर नहीं पड़ा। लेकिन इस बहाने कुछ सोचने का अवसर मिला।

वास्तव में लिपि है क्या? प्रायः लोग लिपि को ही भाषा कह देते हैं। लिपि भाषा नहीं है वरन यह भाषा का प्रतिरूप है। यह भाषा को एक मूर्त रूप देती है। समय काल और परिस्थिति के अनुसार भाषा में जैसे-जैसे परिवर्तन अथवा 'सुधार' होते हैं वे सब लिपि से ही परिलक्षित होते हैं। भाषाविदों ने प्रत्येक लिपि के सामर्थ्य और असामर्थ्य के दो लक्षण माने हैं। यहाँ इन की चर्चा करना आवश्यक नहीं है। हम यहाँ बात करेंगे - हिंदी तथा देवनागरी और रोमन लिपि की।

प्रायः कहा जाता है कि देवनागरी लिपि अत्यधिक समर्थ, दृढ़ और वैज्ञानिक लिपि है। इसे कंप्यूटर के लिए अत्यंत उपयुक्त माना गया है। दूसरी ओर यह भी एक सत्यता है कि आज अधिकांश व्यक्ति कम्प्यूटर के कारण ही अपनी भाषा भूल कर अँग्रेज़ीदाँ हो गए हैं और वह भी गलत रूप में। इस कम्प्यूटर क्रांति के कारण लोग गलत अँग्रेज़ी का प्रयोग करने लगे हैं और उसे ही शुद्ध अँग्रेज़ी मानने लगे हैं। इस क्रांति का एक परिणाम यह हुआ है की अँग्रेज़ी शब्दों की तुरत-फुरत एक नयी वर्तनी सामने आने लगी। इसे 'वर्तनी में सुधार' का नाम दिया गया। परिणाम स्वरूप अँग्रेज़ी के गढ़ इंग्लैण्ड में ही अँग्रेज़ी में अकस्मात आयी इस वर्तनी 'सुधार' की हवा से खलबली मच गयी है। वर्तनी 'सुधार' की यह हवा उच्चारण/ध्वनि के कारण है।

वर्तनी का सीधा सम्बन्ध उच्चारण से है। हिंदी ही नहीं सभी एशियाई भाषाओं में शुद्ध उच्चारण को महत्वपूर्ण माना जाता है। यही कारण है कि अब कुछ समय से अँग्रेज़ी की वर्तनी को भी उच्चारण आधारित बनाने के प्रयास शुरू हुए हैं। एक समय था जब अँग्रेज़ी भाषा को 'किंग्स और क़्वींस इंग्लिश' के नाम से प्रसिद्ध पुण्य सलिला माना जाता था। ऑक्सफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज में पढ़े व्यक्ति को सर्वज्ञ और वंदनीय माना जाता था। यही बताया जाता था कि अँग्रेज़ी ही सर्वोपरि भाषा/लिपि है। समय ने करवट बदली और अँग्रेज़ी के ऊपर से अँग्रेज़ों का प्रभुत्व कम होने लगा और उस का स्थान अमेरिकी अँग्रेज़ी लेने लगी। अमेरिका ने अँग्रेज़ी की वर्तनी को अपनी सुविधा और अपनी निजता दिखाने के लिए बदल दिया जैसे की programme जैसे अन्य शब्दों से एक m और e अक्षरों को हटा दिया। Labour शब्द से u अक्षर हटा दिया। cheque को बदल कर check कर दिया आदि। किंग और क़्वीन अँग्रेज़ी से पूर्णतया अलग करने तथा इसे अमेरिकी चोला पहनाने के कारण इस में बहुत से परिवर्तन किये गए और धीरे-धीरे इन्हें मान्यता मिलने लगी। कम्प्यूटर के आने से जहाँ इस अभियान को गति मिली, इसे सुविधाजनक माना जाने लगा वहीँ king और queen वाली अँग्रेज़ी की वर्तनी का बिल्कुल सर्वनाश हो गया। सबसे बड़ा परिवर्तन हुआ कि शब्दों का स्थान अब अंकों ने ले लिया। अब to शब्द के लिए 2 और for शब्द के लिए 4 लिखा जाने लगा। yours को yrs बना दिया। इसे मान्यता भी मिलने लगी, यह सुविधाजनक भी लगा और इस से समय की बचत भी होने लगी। पहले शार्टहैंड के लिए भी ऐसा कभी नहीं हुआ था।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि उच्चारण के मूल में लिपि अत्यधिक महत्वपूर्ण है। लिपि में उपरोक्त बदलाव उच्चारण/ध्वनि के कारण ही आये। प्रसिद्ध भाषा शास्त्री डॉ. देवी शंकर द्विवेदी ने अँग्रेज़ी और रूसी भाषा के उदाहरण से इस बात को स्पष्ट किया था। "अँग्रेज़ी भाषा की लिपि रोमन कहलाती है जब कि रूसी भाषा की रोमन लिपि को सीरिलिक कहा जाता है। उन के अनुसार, अँग्रेज़ी का "हैम" शब्द रूसी में 'नात' पढ़ा जायेगा। रूसी नाम 'नताशा' अँग्रेज़ी में 'हमावा' पढ़ा जायेगा। दोनों भाषाओं में प्रचलित लिपि के इन अक्षरों में परस्पर आकृति साम्य है लेकिन दोनों भाषाओं में ध्वनि भिन्न-भिन्न है। रूसी भाषा के लिए रोमन को अनुकूलित और प्रचलित करने वाले विद्वान का नाम सिरिल था अतः उसी के नाम पर इस को सिरिलिक कर दिया गया। कुछ विद्वानों का कहना है कि इसे नया नाम देने की कोई आवश्यकता नहीं थी - इसे रूसी रोमन कहा जा सकता था।

देवनागरी की बात करते समय हिंदी के साथ मराठी की चर्चा भी करनी आवश्यक है। दोनों की लिपि का नाम देवनागरी ही है और दोनों की आकृति अधिकांशतः समान है। इस के अतिरिक्त कुछ और भी ऐसी भाषाएँ हैं जिन की लिपि देवनागरी है।" (देवनागरी और हिंदी - देवी शंकर द्विवेदी - हरियाणा भाषा विभाग, चंडीगढ़ द्वारा १९७६- ७७ में आयोजित वार्षिक लेखक गोष्ठी में पढ़ा गया शोध लेख और उनके द्वारा ही प्रकाशित)

अब हम अँग्रेज़ी और फ्रेंच भाषा की लिपि की बात करते हैं क्योंकि दोनों की लिपि रोमन है लेकिन अँग्रेज़ी का ट्रेन फ्रेंच में त्रेन पढ़ा जायेगा। इन दोनों भाषा की लिपि में आकृति साम्यता है लेकिन ध्वनि साम्यता नहीं है। उदाहरण के लिए यहाँ दो वाक्य फ्रेंच के देता हूँ -

Je veux dire, je ne comprends pas votre "oups!!!... ". Est-ce que vous
allez quitter la France?/ Vivre en France?...
Etes-vous étudiant(e) de hindi? ourdou?

रोमन लिपि में होने के बाद भी क्या आप इन्हें सरलता से पढ़ सकते हैं? इंग्लैण्ड और फ्रांस - दोनों ही पड़ोसी देश हैं लेकिन भाषा के नाम पर दोनों में कट्टरता है। मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव पर कह सकता हूँ की फ्रांस का एक शिक्षित व्यक्ति ही नहीं वरन फ्रांस का तथाकथित अशिक्षित अथवा छोटे से छोटा व्यक्ति भी अँग्रेज़ी भाषा के प्रति दुराग्रह रखता है। पेरिस में सड़क किनारे बैठे फल विक्रेता ने भी मुझ से अँग्रेज़ी में बात करने से मना कर दिया। उस के अनुसार यदि मैं फ्रेंच नहीं जानता तो मैं अपनी ही भाषा में बात करूँ। पेरिस में किसी से भी बात करने से पहले यह कहना पड़ता था की मैं फ्रेंच नहीं जानता, मात्र अँग्रेज़ी अथवा अपनी भाषा ही जानता हूँ।

अब हिंदी के वाक्य रोमन में दे रहा हूँ -

Aakhir maine yeh “Hindi” page banayi kyon? Iska hona zaroori tha. Is liye kyonki mere Angl bhasa ke prayog se meri ek aisi chhavi banti hai ki mano mein keval pashchatya sanskriti se hi prabhavit hoon aur Bharatvarsh ki sanskriti mere liye koyi mayne nahin rakhti. Lekin aisa bilkul nahin.

क्या इन्हें आप सरलता या रवानगी से पढ़ सकते हैं?

यदि नहीं तो हम किस रोमन को हिंदी की लिपि के रूप में अपनाने की बात करते हैं? अब देवनागरी लिपि की बात करें।

- देवनागरी अक्षरों की तालिका को वर्णमाला कहा जाता है। क्योंकि इस लिपि का प्रत्येक अक्षर एक वर्ण (सिलेबिल) होता है। प्रत्येक व्यंजनाक्षर में 'अ' वर्ण अनिवार्य रूप से होता है। इसी लिए इसे वर्णमूलक लिपि कहा जाता है। यही इस की वैज्ञानिकता है।

- उच्चारण-योग्य लिपि - भारतीय भाषाओं के किसी भी शब्द या ध्वनि को देवनागरी लिपि में ज्यों का त्यों लिखा जा सकता है और फिर लिखे पाठ को लगभग 'हू-ब-हू' उच्चारण से पढ़ा जा सकता है यह रोमन लिपि और अन्य कई लिपियों में सम्भव नहीं है, जब तक कि उनका विशेष मानकीकरण न किया जाये।

अँग्रेज़ी के सन्दर्भ में उच्चारण अथवा ध्वनि की बात करें। यह एक सत्यता है कि अँग्रेज़ी भाषी दो विभिन्न देशों के व्यक्तियों का उच्चारण एक दूसरे से अलग होगा। उदाहरण के लिए अमरीका और कनाडा को ले सकते हैं। अमरीका और कैरिबियन देशों को ले सकते हैं। अर्थात अँग्रेज़ी भाषी जितने भी देश अथवा क्षेत्र हैं उन में भी उच्चारण की साम्यता नहीं है।

- देवनागरी में कुल ५२ अक्षर हैं, जिसमें १४ स्वर और ३८ व्यंजन हैं। अक्षरों की क्रम व्यवस्था (विन्यास) भी बहुत ही वैज्ञानिक है। स्वर-व्यंजन, कोमल-कठोर, अल्पप्राण-महाप्राण, अनुनासिक्य -अन्तस्थ-उष्म इत्यादि वर्गीकरण भी वैज्ञानिक हैं।

- देवनागरी लिपि में अनेक भारतीय भाषा तथा कुछ विदेशी भाषाएँ लिखी जाती हैं जैसे संस्कृत, पालि, हिन्दी, मराठी, कोंकणी, सिन्धी, कश्मीरी, डोगरी, नेपाली, नेपाल भाषा (तथा अन्य नेपाली उपभाषाएँ), गढ़वाली, बोडो, अंगिका, मगही, भोजपुरी, संथाली आदि भाषाएँ देवनागरी में लिखी जाती हैं। भारत की कई लिपियाँ देवनागरी से बहुत अधिक मिलती-जुलती हैं जैसे- बांग्ला, गुजराती, गुरुमुखी आदि।

- कम्प्यूटर प्रोग्रामों की सहायता से भारतीय लिपियों में परस्पर परिवर्तन बहुत आसान हो गया है।

- 'सुधार' के नाम से देवनागरी लिपि में समय-समय पर कुछ परिवर्तन करने के प्रयत्न किये गए लेकिन वे सब विफल रहे। जैसे पाँचवें दशक के अंत में अन्य परिवर्तनों के साथ छोटी 'इ' और बड़ी 'ई' दोनों की मात्रा को दीर्घ में लिख कर आकार में छोटा बड़ा कर दिया गया। लेकिन ये सब परिवर्तन उच्चारण में अव्यावहारिक सिद्ध हुये और अंततः लिपि का वर्तमान रूप ही स्वीकार किया गया।

- डॉ. द्विवेदी के अनुसार देवनागरी की वर्णमाला की एक उल्लेखनीय वैज्ञानिकता उस के अक्षरों की संयोजना है। सब से पहले स्पर्श व्यंजन दिए गए हैं जो उच्चारण स्थान की दृष्टि से क्रमशः पीछे से आगे की ओर आते हैं। प्रत्येक वर्ग में (कवर्ग, चवर्ग आदि) घोष और प्राण की दृष्टि से व्यंजनों का स्थान निर्धारित है। वर्गों के अंत में वर्ग - नासिक्य का स्थान है इसी प्रकार अंतःस्थ और उष्म व्यंजन आते हैं। इस संयोजन मैं कुछ जटिलता हो सकती है लेकिन अवैज्ञानिकता नहीं है।

- अनुकूलन और स्वीकार्यता - प्रत्येक भाषा में समय-समय पर काल और परिस्थिति के अनुसार नयी ध्वनियों का समावेश, विच्छेद अथवा परिवर्तन होता रहता है। मुस्लिम शासन काल में अरबी लिपि और उस पर आधारित उर्दू भाषा का आगमन हुआ, अँग्रेज़ी शासनकाल में अँग्रेज़ी आयी और इसी दौरान रोमानी हिंदी आयी। इन्हीं भाषाओँ के ध्वन्यात्मक शब्द देवनागरी में लिखे जाने लगे और इस में आत्मसात हो गए जैसे नुक्ते वाले अक्षर ख़ ग़ ज़। कुछ अक्षर विभिन्न बोलियों से आ गए जैसे ड़, ढ़, फ़, ळ क़ आदि।

महात्मा गांधी गुजराती भाषी थे और उन्होंने सरल हिंदी - हिंदुस्तानी की बात कही थी। उन्होंने अपनी बात सूरत में हुए हिंदी साहित्य सम्मेलन के वार्षिक समारोह में कही थी और काका कालेलकर ने उसे पूरी निष्ठा से अपनाया। गुजरात प्रदेश में आज भी इस का प्रचलन है। इस में इ ई उ ऊ के लिए अ अक्षर पर इन की मात्राएँ लगाना ही काफी है।

अंत में यही कहूँगा कि हिंदी भाषा को किसी अन्य लिपि की आवश्यकता नहीं है। हिंदी की लिपि देवनागरी है जो शाश्वत है, सनातन है और देश की प्रगति के लिए सर्वथा उपयुक्त है।


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