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04.07.2007

हिम चंद्रिका
अँशु शर्मा

हिम के कणों से सजा धरती का भाल है
पूर्णिमा की चाँदनी में  हिम है नहाई हुई
चंद्रिका के हाथ में  चाँदनी की माल है
धरती पे आज श्वेत चाँदनी है बिछी हुई
हिम के घूँघट से  झुकी हर डाल है।

धरती का आँचल है फैला हुआ आज देखो
बरसता मणि हिम गगन विशाल है
प्रकृति ने बुनी मानो धरती के लिये चादर
इसके ही कोमल श्वेत हस्त का कमाल है
किसी चतुर कारीगर का बुनता है श्वेत पड़ा
फैला आकाश में मेघों का जो जाल है
तुमने तो एक दिन में धरती को भेंट ये दी
वर्णन करो तो अब लगे एक साल है।