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04.08.2007

साक्षात्कार - (प्रेम के विभिन्न धरातल)
अनिल प्रभा कुमार


यूँ तो हर पल प्रतीक्षा की थी मैंने
जीवन के हर मोड़ पर
अचानक तुमसे साक्षात्कार होने की।
फिर वही
, जब सच हुआ,
दोनों को मूक कर गया
,
न धड़कनें बढ़ीं
न यादें ही तिरीं
उम्र की रेखाएँ पढ़ते रहे
एक दूसरे के चेहरे पर।

सब्जी का झोला मेरे हाथ में
बच्चा तुम्हारे साथ में
,
और
हम दोनों के बीच में
एक ख़ामोश इतिहास ।

कैसी हैं अ-आप?
ठीक हूँ
बहुत असहज होकर तुमने कहा
,
बच्चे को थपथपा कर
,
संकुचित सी मुस्कराहट
और फिर विदा लेकर
लौट आए
,
हम अपने-अपने वर्तमान पर।