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ISSN 2292-9754

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08.25.2016


ट्रेन का वो पुराना डब्बा

दिसम्बर का महीना था। मैं दिल्ली से अपने घर सहरसा जा रहा था। ट्रेन में एक एक्स्ट्रा कम्बल लेने के बावजूद ठण्ड कम नहीं हो रही थी। अचानक ट्रेन बरौनी स्टेशन पर रुकी। रात के क़रीब 9 बज रहे थे। ठण्ड के मौसम में 7-8 बजे ही बाज़ार बंद होने लगता है। और लोग सोने की तैयारी करने लगते है। तभी प्लेटफ़ॉर्म पर एक औरत दिखाई दी। उसके साथ 2-3 बच्चे भी थे। इतनी कड़ाके की ठण्ड में उन लोगों के पास तन ढंकने के लिए भी पर्याप्त कपड़े नहीं थे। बेचारी पूरी रात कैसे गुज़ारेगी? यही विचार दिमाग में बार-बार आ रहे थे। बाहर किसी से पूछने पर पता चला की ट्रेन अभी कम से कम दस मिनट और रुकेगी। राजधानी से क्रासिंग थी। मैं ट्रेन से उतरकर उस औरत के पास गया, और मदद के लिए 100 रु. देने लगा। रुपये देखकर वह औरत बोली, "उधर ट्रेन के उस पुराने डब्बे में चलो साहब, उधर कोई नहीं आता!"


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