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ISSN 2292-9754

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01.31.2016


पिताजी आज भी पैसे बचाते हैं

पिताजी आज भी पैसे बचाते हैं
पुरानी पेंट रफू करा कर
पहनते जाते हैं,
ब्रैण्डेड नई शर्ट
देने पे आँखे दिखाते हैं
टूटे चश्मे से ही
अख़बार पढने का
लुत्फ़ उठाते हैं,
टोपाज़ के ब्लेड से दाढ़ी बनाते हैं
पिताजी आज भी पैसे बचाते हैं ….

कपड़े का पुराना थैला लिये
दूर की मंडी तक जाते हैं,
बहुत मोल-भाव करके
फल-सब्जी लाते हैं
आटा नही खरीदते, गेहूँ पिसवाते हैं..
पिताजी आज भी पैसे बचाते हैं…

स्टेशन से घर
पैदल ही आते हैं
रिक्शा लेने से कतराते हैं
सेहत का हवाला देते जाते हैं
बढती महँगाई पे चिंता जताते हैं
पिताजी आज भी पैसे बचाते हैं ....

पूरी गर्मी पंखे में बिताते हैं,
सर्दियाँ आने पर रजाई में दुबक जाते हैं
एसी/हीटर को
सेहत का दुश्मन बताते हैं,
लाइट खुली छूटने पे
नाराज हो जाते हैं
पिताजी आज भी पैसे बचाते हैं

माँ के हाथ के खाने में
रमते जाते हैं,
बाहर खाने में
आनाकानी मचाते हैं
साफ़-सफाई का हवाला देते जाते हैं,
मिर्च, मसाले और तेल से घबराते हैं
पिताजी आज भी पैसे बचाते हैं…

गुज़रे कल के क़िस्से सुनाते हैं,
कैसे ये सब जोड़ा - गर्व से बताते हैं
पुराने दिनों की याद दिलाते हैं
बचत की अहमियत - समझाते हैं
हमारी हर माँग आज भी,
फ़ौरन पूरी करते जाते हैं
पिताजी हमारे लिए ही पैसे बचाते हैं ...


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